- SC ने कांचीपुरम के मंदिर में अनुष्ठानों के विवाद को सुलझाने के लिए पूर्व जस्टिस को मुख्य मध्यस्थ नियुक्त किया
- वादकलाई और थेंकलाई वैष्णव संप्रदायों के बीच 120 साल पुराना विवाद मंदिर के गर्भगृह में प्रार्थना को लेकर है
- मद्रास HC ने वादकलाई संप्रदाय को गर्भगृह में पूजा की अनुमति देने से इनकार किया था, जिसे SC में चुनौती दी गई
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित ऐतिहासिक श्री देवराजस्वामी मंदिर में अनुष्ठानों के निष्पादन को लेकर श्री वैष्णवों के दो संप्रदायों के बीच 120 साल पुराने विवाद को सुलझाने के लिए बुधवार को पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल को बुधवार को मुख्य मध्यस्थ नियुक्त किया.सीजेआी जस्टि सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की एक पीठ ने एस. नारायणन की अपील पर सुनवाई की. जिसमें वादकलाई संप्रदाय को मंदिर के गर्भगृह में प्रार्थना की अनुमति देने की याचिका खारिज करने के मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी.
मंदिर के अंदर अनुष्ठानों से जुड़ा क्या है विवाद?
यह विवाद मंदिर के अंदर अनुष्ठानों से जुड़ा है, जहां ऐतिहासिक रूप से थेंकलाई संप्रदाय पूजा-अर्चना कर रहा है. याचिकाकर्ताओं की दलील है कि वादकलाई संप्रदाय के सदस्यों को अनुष्ठानों में भाग लेने का अधिकार नहीं दिया जा रहा है, जबकि उन्हें एक धार्मिक संप्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त है.
मुख्य मध्यस्थ होंगे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश
चीफ जस्टिस ने आदेश में कहा, “वरिष्ठ वकीलों ने दैनिक अनुष्ठानों को सौहार्दपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए मध्यस्थता पर सहमति जता दी है. इस संबंध में हम सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और मद्रास हई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे श्री संजय किशन कौल से अनुरोध करते हैं कि वह मुख्य मध्यस्थ के रूप में कार्य करें.”
जल्द सुलझ सकता है 120 साल पुराना विवाद
दोनों पक्षों की ओर से मध्यस्थता के जरिए विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान को लेकर सहमति जताए जाने के बाद पीठ ने कहा, “न्यायाधीश कौल अपनी पसंद के दो और ऐसे व्यक्तियों को साथ ले सकते हैं जो तमिल और संस्कृत भाषाओं, अनुष्ठानों व मंदिर के धार्मिक इतिहास के बारे में पर्याप्त जानकारी रखते हों.” पीठ ने अब इस याचिका पर विस्तृत सुनवाई के लिए 13 मार्च की तारीख तय की है.
इनपुट- भाषा
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