
मुंबई क्राइम ब्रांच ने हाल ही में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए देश के सबसे बड़े एजेंट्स को गिरफ्तार किया है, जो लोगों को नकली वीजा और डंकी रूट के जरिए विदेश भेजते थे. इस मामले में अजित पूरी समेत 5 एजेंट्स को गिरफ्तार किया गया है. पुलिस सूत्रों के अनुसार, यह गैंग पिछले 3 सालों में 80 भारतीय युवाओं को अलग-अलग रास्तों से अमेरिका भेज चुका है.
अजीत नामक एक व्यक्ति ने कई युवाओं को अमेरिका जाने का सपना दिखाया और डंकी रूट के माध्यम से अमेरिका भेजने के लिए लाखों रुपये लिए. अजीत पर अब तक 14 मामले दर्ज हो चुके हैं. डीसीपी क्राइम ब्रांच दत्ता नलावड़े ने बताया कि एक गुप्त जानकारी के आधार पर एक एजेंट को डिटेन किया गया था, जिससे यह बात सामने आई कि यह एक क्राइम सिंडिकेट है जो लोगों को गैरकानूनी तरीके से विदेश भेजने का काम करता है.
जीत पर 14 मामले दर्ज
यह गैंग लोगों से 30 से 35 लाख रुपये लेती थी और आरोपी अजीत इस गैंग का लीडर है. अजीत पर 14 मामले दर्ज हैं और 2006 में क्राइम ब्रांच ने पहले भी उसे गिरफ्तार किया था. अजीत के साथ काम करने वाले लोगों का भी क्राइम रिकॉर्ड है और यह लोग अपने काम में माहिर हो चुके हैं. यह गैंग फर्जी डॉक्यूमेंट्स बनाने में भी शामिल थी और अपना काम बेहद सफाई से करती थी.
विदेश भेजने के लिए फर्जी डॉक्यूमेंट्स
डीसीपी क्राइम ब्रांच दत्ता नलावड़े ने बताया कि एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश हुआ है, जो लोगों को विदेश भेजने के लिए फर्जी डॉक्यूमेंट्स बनाता था. इस मामले में अब तक 5 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. यह गिरोह देश के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय ट्रैवल एजेंट्स के साथ मिलकर काम करता था. एजेंट्स इस गिरोह को कांटेक्ट करते थे और जिस व्यक्ति को विदेश भेजना होता था, उसके डिटेल्स लिए जाते थे. इसके बाद, गिरोह फर्जी पासपोर्ट, आधार कार्ड और अन्य फर्जी डॉक्यूमेंट्स बनाता था. इसके अलावा, यह गिरोह उन लोगों को एयरपोर्ट पर कैसे व्यवहार करना है और अगर कोई उनसे सवाल पूछता है तो कैसे जवाब देना है, इसके बारे में भी जानकारी देता था.
यह गैंग न केवल अमेरिका में लोगों को भेजती थी, बल्कि उन्हें अलग-अलग देशों में भी भेजती थी. जांच में पता चला है कि यह गैंग लोगों को मैक्सिको, तुर्की और कनाडा जैसे देशों में भेजती थी और फिर उन्हें वहां से बॉर्डर क्रॉस करवाकर अमेरिका में भेजा जाता था. पूरे ऑपरेशन के लिए अलग-अलग देशों में जाने के लिए अलग पैसा लिया जाता था और अमेरिका में बॉर्डर क्रॉस करवाने के लिए भी अलग पैसा लिया जाता था. यह एक बहुत बड़ा और जटिल नेटवर्क था, जिसमें कई लोग शामिल थे.
जांच में पता चला है कि यात्रियों को दो अलग-अलग लिफाफा दिए जाते थे. पहले लिफाफा (A) में उनका खुद का पासपोर्ट, नकली टिकट और कनाडा का नकली वीजा होता था, जबकि दूसरे लिफाफा (B) में PC पासपोर्ट, असली टिकट और असली वीजा होता था. एजेंट्स यात्रियों को एयरपोर्ट में जाने से पहले पूरी तरह से ट्रेनिंग देते थे कि कौनसा लिफाफा पहले निकालना है और कौनसा बाद में. उन्हें यह भी बताया जाता था कि एयरपोर्ट में एंट्री करते समय और किसी भी काउंटर पर पूछे गए सवाल के जवाब कैसे देना है और सबसे महत्वपूर्ण बात, डरना नहीं है.
जब यात्री एयरपोर्ट के एंट्री गेट पर होता था, तो वह लिफाफा(B) हाथ में रखता था, जिसमें PC पासपोर्ट, असली टिकट और असली वीजा होता था. एंट्री गेट पर CISF वाला पासपोर्ट देखता था, जिसपर फोटो यात्री का होता था और उसका टिकट देखता था. पहला लेवल पार करने के बाद, यात्री एयरलाइंस के विंडो पर जाता था, जहां उसे बोर्डिंग पास मिलता था. इसके बाद, वह सिक्योरिटी चेकिंग के लिए आगे बढ़ता था, जहां सिर्फ लगेज स्कैन होता था. इस दौरान, वह अपना दूसरा लिफाफा (A) निकालता था और इंवेलोप (B) बैग में रख देता था.
नकली वीजा लगा होता है. इमिग्रेशन स्टाफ के पास पासपोर्ट की जानकारी होती है. इसलिए जब यात्री का पासपोर्ट स्कैन किया जाता है, तो उसकी जानकारी इमिग्रेशन के अधिकारी के स्क्रीन पर आ जाती है. इसके बाद, इमिग्रेशन का अधिकारी UV लाइट से पासपोर्ट पर लगे वीजा को देखता है और अगर लाइट फ्लोरिश होती है तो वह यह मान लेता है कि वीजा असली है और नकली वीजा पर नकली टिकट पर इमिग्रेशन का स्टैम्प लगाकर दे देता है.
सूत्रों ने आगे दावा किया है कि इमिग्रेशन पर स्टैम्प लगवाने के तुरंत बाद, यात्री टॉयलेट में चला जाता है और वहां वह इंवेलोप (A) को फिर से बैग में रख लेता है और इंवेलोप (B) बाहर निकालता है. इसके बाद, वह अपने बैग से रबर का डब्लिकेट इंक लगा हुआ इमिग्रेशन का स्टैम्प निकालता है और बड़ी सावधानी से वह स्टैम्प PC पासपोर्ट पर लगे असली वीजा पर लगाता है और फिर असली टिकट पर. जब यात्री स्टैम्प लगा रहा होता है, तो एजेंट लगातार उसे फोन पर इंस्ट्रक्शन देते रहते हैं कि वह समय ले और सावधानी रखे कि इंक उसके हाथ में न लगे.
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