- टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर अमेरिका के साथ सहमति नहीं बनने की वजह से जैवलिन खरीद की पहली कोशिश रुक गई.
- फिर भारत ने इजरायली स्पाइक एटीजीएम को चुना, लेकिन इसकी खरीद प्रक्रिया भी कई अड़चनों के कारण पूरी नहीं हो सकी.
- अब 16 साल बाद बढ़ते भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग और सेना की जरूरतों के बीच जैवलिन मिसाइल फिर भारत की पसंद बनी.
भारत ने अमेरिकी जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल हासिल करने की जिस कोशिश को 2010 में शुरू किया था, वह 16 साल बाद जाकर मुकाम तक पहुंची है. 28 अगस्त को भारतीय सेना ने अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स यानी FMS सिस्टम के तहत जैवलिन की खरीद के लिए लेटर ऑफ ऑफर ऐंड एक्सेप्टेंस पर हस्ताक्षर किए. लेकिन सवाल ये है कि आखिर एक मिसाइल खरीदने में भारत को 16 साल क्यों लग गए? क्या वजह थी कि जिस जैवलिन को कभी भारत अपनी तत्काल जरूरत पूरी करने के लिए खरीदना चाहता था, उसकी जगह इजरायल की स्पाइक मिसाइल को चुन लिया गया? और फिर इतने साल बाद भारत जैवलिन की ओर वापस क्यों लौटा?
इस पूरी कहानी को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि जैवलिन आखिर है क्या और भारतीय सेना के लिए इसकी जरूरत क्यों महसूस की गई.

फायर-एंड-फॉरगेट तकनीक से लैस जैवलिन एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल 4 किलोमीटर की रेंज में हमला करने में सक्षम है
Photo Credit: Lockheed Martin
क्या है जैवलिन मिसाइल?
जैवलिन एक तीसरी पीढ़ी की मैन पोर्टेबल एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM सिस्टम है. इसे अमेरिकी कंपनियों लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन के जॉइंट वेंचर ने विकसित किया है.
इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका 'फायर-ऐंड-फॉरगेट' सिस्टम है. इसका मतलब यह है कि जब लक्ष्य पर मिसाइल लॉक करने के बाद उसे दागा जाता है तो इसके बाद मिसाइल को लगातार निर्देशित करने की जरूरत नहीं पड़ती. मिसाइल अपने गाइडेट सिस्टम की मदद से लक्ष्य को ट्रैक करती है.
जैवलिन टॉप अटैक क्षमता से भी लैस है. इसमें मिसाइल लक्ष्य के ऊपरी हिस्से को निशाना बना सकती है. आम तौर पर टैंक के सामने वाले हिस्से की तुलना में यह अपेक्षाकृत कम सुरक्षित होता है. यही वजह है कि आधुनिक बख्तरबंद वाहनों और टैंकों के खिलाफ जैवलिन को महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है.

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भारतीय सेना को जैवलिन की जरूरत क्यों पड़ी?
जैवलिन की कहानी भारत में 2010 में शुरू हुई थी. उस समय भारतीय सेना के पास फ्रांस की मिलन-2टी और सोवियत संघ से आई कॉनकर्स जैसी पुरानी एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियां थीं. इन प्रणालियों को धीरे-धीरे बदलने की जरूरत थी. दूसरी तरफ भारत की स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल परियोजनाओं में भी अपेक्षित गति नहीं आ पा रही थी. इससे सेना के सामने एंटी टैंक मिसाइल क्षमता में गैप पैदा हो रहा था.
भारत को ऐसी आधुनिक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम की जरूरत थी जो आधुनिक टैंकों के खिलाफ प्रभावी हो. सैनिकों द्वारा आसानी से इस्तेमाल की जा सके. लक्ष्य पर हमला करने के बाद ऑपरेटर को लगातार मिसाइल गाइड न करनी पड़े. मुश्किल युद्धभूमि की परिस्थितियों में भी आसानी से इस्तेमाल की जा सके और भविष्य में भारतीय रक्षा उत्पादन के साथ भी जोड़ी जा सके. जैवलिन इन सभी जरूरतों के काफी करीब बैठती थी.

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2010 में भारत ने पहली बार जैवलिन क्यों चुनी?
अगस्त 2010 में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने संसद में बताया कि भारत अमेरिका से जैवलिन एंटी टैंक गाइडेट मिसाइल खरीदने के लिए लेटर ऑफ रिक्वेस्ट जारी करने की योजना बना रहा है. यह खरीद फॉरेन मिलिट्री सेल्स के रास्ते से होनी थी. भारत के लिए जैवलिन को चुनने के पीछे तत्काल जरूरत तो बड़ी वजह थी, साथ ही तब स्वेदेशी सिस्टम के विकास में देरी हो रही थी. तब अमेरिका के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास के दौरान 2009 में भारत जैवलिन की क्षमता का प्रदर्शन देख चुका था.

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सेना के लिए जैवलिन क्यों अहम?
बेशक जैवलिन एक आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइल है. इसके फीचर्स भारतीय सेना के इस्तेमाल की जरूरतों के मुताबिक हैं.
फायर-ऐंड-फॉरगेट फीचर्स इसे लगातार गाइड करने से रोकता है तो टॉप अटैक कैपेबिलिटी टैंक के ऊपरी हिस्सों को भी निशाना बना कर नष्ट कर सकती है.
सबसे अहम यह है कि इसे बहुत कम लोगों की टीम युद्ध भूमि में इस्तेमाल कर सकती है. यह मिसाइल लक्ष्य की थर्मल इमेज के जरिए उसे ट्रैक करने में सक्षम है.

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फिर क्या हुआ कि जैवलिन की डील रोकनी पड़ी?
भारत केवल जैवलिन मिसाइल खरीदना नहीं चाहता था. उसकी यह भी कोशिश थी कि उसे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी मिले और भविष्य में वह मिसाइल का उत्पादन भारत में ही कर सके.
अमेरिका तब इसके लिए तैयार नहीं हुआ. अमेरिका अपनी गाइडेट मिसाइल की लक्ष्य को लॉक करने की 100 फीसद टेक्नोलॉजी भारत को देने को तैयार नहीं था.
ऐसे में जैवलिन की शुरुआती खरीद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी.
2012 की अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट में भी भारत के जैवलिन मिसाइल को खरीदने के संदर्भ में संयुक्त उत्पादन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे मुद्दों को जिक्र किया गया था.

स्पाइक मिसाइल की फाइल फोटो
फिर जैवलिन की जगह स्पाइक क्यों चुनी?
जैवलिन की खरीद प्रक्रिया अटकने के बाद भारत ने इजरायल की स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल के विकल्प पर काम करना शुरू किया और 2014 में आठ हजार से अधिक स्पाइक मिसाइल खरीदने की मंजूरी भी दे दी गई.
स्पाइक भारत की उस शर्त को मानने की लिए तैयार था जिसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत में ही इसके उत्पादन की बातें थीं. लेकिन स्पाइक के साथ कॉन्ट्रैक्ट पर समझौते की प्रक्रिया काफी लंबी चली और इस दौरान परीक्षण में स्पाइक के प्रदर्शन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और डीआरडीओ के स्वदेशी एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल प्रोग्राम में प्रगति जैसे सवालों की वजह से भी यह देरी हुई.
लंबी बातचीत के बाद 2017 में स्पाइक की खरीद प्रक्रिया को रद्द कर दिया गया. 2018 में इस खरीद प्रक्रिया को फिर बढ़ाने की कोशिश हुई, पर जल्द ही एक बार फिर यह ठंडे बस्ते में चला गया.
स्पाइक की खरीद रुकने के बावजूद भारतीय सेना की एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल की जरूरत खत्म नहीं हुई. 2019 में भारत ने तत्काल जरूरतों के मद्देनजर सीमित संख्या में चौथी पीढ़ी की स्पाइक लंबी दूरी की मिसाइलों की इमरजेंसी खरीद की. तो 2023 में कल्याणी रफाएल एडवांस सिस्टम को रक्षा मंत्रालय से 287.51 करोड़ रुपये का ऑर्डर भी मिला. हालांकि इन प्रयासों के बावजूद भारत की एंटी टैंक गाइडेड मिसाइलों की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं हुई. ऐसे में जैवलिन मिसाइल एक बार फिर तस्वीर में लौटने लगी.

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जैवलिन की वापसी क्यों हुई?
इस बार भारत-अमेरिका के रिश्ते 2010 से काफी अलग थे. पिछले डेढ़ दशक में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग काफी गहरा हुआ है. अब बातचीत अमेरिकी हथियारों की खरीद से आगे बढ़ते हुए रक्षा उत्पादन, सहनिर्माण, और भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर औद्योगिक स्तर पर साझेदारी पर जोर बढ़ा है. इस बदलते माहौल में एक बार फिर जैवलिन की चर्चा हुई.
2025 में अमेरिकी कांग्रेस के रिसर्च सर्विस ने जैवलिन के सह-उत्पादन के जुड़ी बातचीत का जिक्र किया. फरवरी 2025 में जैवलिन जॉइंट वेंचर ने भारत में जैवलिन के को-असेंबली और को-प्रोडक्शन की संभावनाएं तलाशने की बात कही. इसी दौरान भारत डायनामिक्स लिमिटेड के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया.
इससे स्पष्ट संकेत मिला कि बातचीत का मॉडल मिसाइल खरीदने और इस्तेमाल करने पर केवल नहीं था. भारत भविष्य में इसके उत्पादन इकोसिस्टम में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है.
ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्यों बढ़ी अहमियत?
दरअसल, 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद सटीक स्ट्राइक की जरूरत और दुश्मनों के बख्तरबंद वाहनों, टैंकों और युद्ध भूमि में इस्तेमाल की जा रही गाड़ियों को नष्ट करने को लेकर भारत की ऑपरेशनल जरूरतों पर अधिक ध्यान गया. इसी दौर में भारत और अमेरिका के बीच व्यापक रणनीतिक और व्यापारिक बातचीत चल रही थी.
जुलाई 2025 तक यह सामने आ चुका था कि भारत जैवलिन की खरीद पर बातचीत कर रहा है. इसमें तत्काल जरूरत के लिए इमरजेंसी खरीद और लंबी अवधि के लिए एक अलग समझौते की संभावना थी.
अमेरिका ने नवंबर 2025 में बिक्री को मंजूरी दी. फिर 28 अगस्त 2026 को भारतीय सेना ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस तरह 2010 में शुरू हुई जैवलिन की कहानी 16 साल बाद एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंची.

क्या इसका मतलब स्वदेशी ATGM कार्यक्रम नाकाम रहा?
भारत ने विदेशी ATGM की जरूरत पूरी करने के साथ-साथ अपनी स्वदेशी क्षमता विकसित करने पर भी जोर दिया है. डीआरडीओ का मैन पोर्टेबल एटीजीएम कार्यक्रम इसी दिशा में अहम है.
इस साल डीआरडीओ ने महाराष्ट्र के केके रेंज्स में मूविंग टारगेट के खिलाफ टॉप अटैक प्रोफाइल में इसका फ्लाइट टेस्ट किया गया. स्वदेशी मैन पोर्टेबल एटीजीएम में इमेजिंग इन्फ्रारेड होमिंग सीकर, फायर कंट्रोल सिस्टम, टैंडम वारहेड, प्रोपल्शन सिस्टम और एडवांस साइटिंग सिस्टम जैसी तकनीकें शामिल हैं. इसे ट्राइपॉड या मिलिट्री व्हिकल लॉन्चर से भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
यानी अब भारत की रणनीति दो स्तरों पर चल रही है. एक तत्काल इस्तेमाल वाली विदेशी सिस्टम की खरीद और लंबी अवधि के लिए स्वदेशी सिस्टम का निर्माण.
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