- दावा किया जा रहा है कि E20 से गाड़ियों के इंजनों को नुकसान पहुंच रहा है, माइलेज पर भी असर पड़ रहा है.
- सरकार ने माना कि माइलेज पर असर पड़ता है. पूरे मामले को बताया मनगढंत क्योंकि ब्लेंडिंग पहले से चल रही है.
- सरकार ने विस्तार से बताया कि कैसे धीरे-धीरे बढ़ाया गया इथेनॉल ब्लेंडिंग का प्रतिशत.
बीते कुछ दिनों से ईथेनॉल पूरे देश में पेट्रोल से गाड़ी चलाने वालों के लिए खलनायक बना हुआ है. जो लोग अपनी बाइक या कार में इथेनॉल युक्त पेट्रोवो डलवा रहे हैं और इससे जुड़ी सोशल मीडिया पर खबरों को देखकर परेशान हो रहे हैं, उनके लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर इथेनॉल है क्या और E20 पर सवाल क्यों उठ रहे हैं. सरकार इसे आगे क्यों बढ़ाना चाहती है? कुल मिलाकर इससे किसे नफा और किसे होगा नुकसान?
सबसे पहले जानते हैं कि केंद्रीय मंत्रियों का इस पर क्या है कहना?
बीते कुछ हफ्तों से पूरे देश में E20 को खलनायक के रूप में देखा जा रहा है. दावा किया जा रहा है कि इससे गाड़ियों के इंजनों को नुकसान पहुंच रहा है, साथ ही माइलेज पर भी असर पड़ रहा है. हालांकि इसी बीच केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने यह माना है कि गाड़ियों का माइलेज इससे कम होता है, पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि माइलेज ट्रैफिक की स्थिति पर निर्भर करती है. वहीं केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने कहा है कि E20 फ्यूल को लेकर उठे हंगामे को मनगढ़ंत विवाद बता कर खारिज कर दिया.
उन्होंने इसकी तुलना कुछ ही हफ्ते पहले एलपीजी सिलेंडर की कमी को लेकर पैदा हुए इसी तरह के भयावह माहौल से की. पुरी का कहना है कि E20 की बिक्री तब से ही चुपचाप जारी है. लेकिन इंजन के घिसने या माइलेज के घटने की शिकायतें 5 जून को E85 फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों के लॉन्च होने के बाद ही सामने आईं. इस बीच विपक्ष ने सरकार पर ग्राहकों के साथ अनधिकृत प्रयोग करने का आरोप मढ़ते हुए ब्राजील की तर्ज पर पेट्रोल पंपों पर ईंधन के विकल्प मुहैया कराने की मांग की है. साथ ही रविवार को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेट्रोल में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी को अनिवार्य रूप से लागू करने के विरोध में एक्टिविस्ट तहसीन पूनावाला और अन्य लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया.

20% इथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी के विरोध में तहसीन पूनावाला समेत अन्य लोगों का विरोध प्रदर्शन
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आखिर E20 है क्या?
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मुताबिक E20 ईंधन का मतलब 20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल होता है. यानी बगैर इथेनॉल वाले तेल में पेट्रोल की मात्रा पूरे 100 फीसद होती है जबकि E20 में पेट्रोल 80 फीसद जबकि इथेनॉल 20 फीसद होता है. दरअसल, भारत सरकार ने पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है ताकि पेट्रोलियम आयात कम हो, कार्बन उत्सर्जन घटे और किसानों को अतिरिक्त बाजार मिले. इथेनॉल का उत्पादन गन्ने और मक्के से किया जाता है. इसका कोई रंग नहीं होता, यह पारदर्शी होता है.
पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंड का इतिहास
बता दें कि भारत में इथेनॉल ब्लेंड यानी पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की शुरुआत सबसे पहले 2005 में की गई थी. लक्ष्य था कि साल 2030 तक इथेनॉल की 20% मात्रा पेट्रोल में ब्लेंड की जाएगी. 2013-14 तक पेट्रोल में केवल 1.5 फीसद इथेनॉल ब्लेंड किया जा रहा था. लेकिन 2025 की शुरुआत में ही 20 फीसद का लक्ष्य हासिल कर लिया गया.

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इथेनॉल को केंद्र क्यों मानता है गेमचेंजर?
E20 को सरकार ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम मानती है. सरकार का तर्क है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी. विदेशी मुद्रा की बचत होगी. ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने में मदद भी मिलेगी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2013-14 में इथेनॉल की सरकारी खरीद 38 करोड़ लीटर होती थी, जो 2025-26 में बढ़ कर 1200 करोड़ लीटर पहुंच गई है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को इसका सीधा लाभ भी हासिल हो रहा है. इससे जून 2026 तक देश भर के गन्ना और मक्का किसानों ने इससे 1.58 लाख करोड़ रुपये की कमाई हुई है.
सरकार को इससे कितना लाभ हुआ है?
पेट्रोलियम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार ने 2014-15 से अब तक 1.84 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा का बचत किया है. इससे 302 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल की कम खरीद करनी पड़ी. इसकी वजह से 909 मीट्रिक टन कॉर्बन डायआक्साइड का उत्सर्जन भी कम हुआ है. और इसका सबसे बड़ा नतीजा ये निकला कि किसानों की इससे 1.58 लाख करोड़ की आमदनी बढ़ी है. इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम से चीनी उद्योग के बकाया भुगतान में भी मदद मिली है.
ब्राजील जैसे देशों को इथेनॉल मिश्रण के लक्ष्यों को हासिल करने में दशकों लग गए, तो भारत ने ऐसा करने में जल्दबाजी क्यों दिखाई?
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि इथेनॉल कोई नया ईंधन नहीं है. भारत ने इथेनॉल का आविष्कार नहीं किया है. हेनरी फोर्ड ने मॉडल टी को इथेनॉल पर चलने के लिए डिजाइन किया था. ब्राजील और अमेरिका समेत कई देश दशकों से इथेनॉल ब्लेंड कर रहे हैं.

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कैसे-कैसे बढ़ाया गया इथेनॉल ब्लेंडिंग का प्रतिशत?
भारत में इथेनॉल ब्लेंड वर्तमान सरकार के कार्यकाल में शुरू नहीं हुआ है. 2001 में इसे प्रयोग के तौर पर ब्लेंड करने के कार्यक्रम की शुरुआत हुई. जिसकी औपचारिक घोषणा 2004 में की गई. 2006 तक कई राज्यों में E5 (5% इथेनॉल ब्लेंड) को लागू किया गया था. इसकी जानकारी यूपीए सरकार ने 2013 में आधिकारिक तौर पर दी.
हालांकि तब 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 5% इथेनॉल ब्लेंड का लक्ष्य तय किया गया था पर 2014 तक यह 1.5% पर ही अटका रहा.
ईंधन के रूप में इथेनॉल पर सवाल नहीं उठाया गया था. वैश्विक स्तर पर इसे स्वीकार किया जा चुका था. भारत में ये चुनौती थी कि इसकी पर्याप्त मात्रा का उत्पादन कैसे किया जाए. तब हम इसके लिए पूरी तरह गन्ने पर निर्भर थे, जो एक मौसमी फसल है. गन्ने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 400 करोड़ लीटर ही थी. जो कि मामूली ब्लेंड टारगेट के लिए भी काफी नहीं था.
सरकार ने 2018 में जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति की शुरुआत की. इसके लिए इको सिस्टम विकसित किया गया. इथेनॉल पर जीएसटी 18% से घटा कर 5% किया गया. तेल कंपनियों के साथ तेल संयंत्र तैयार किए गए. इनके अपनी पूरी क्षमता से काम करने में दो वर्षों का समय लगा. फिर जून 2021 में इथेनॉल ब्लेंड को लेकर रोडमैप लाया गया. तब 10% इथेनॉल ब्लेंडिंग की जरूरत के लिए 500-600 करोड़ लीटर इथेनॉल हर साल चाहिए थे. जैसे-जैसे निवेश आए यह स्पष्ट हो गया कि देश जल्द ही 1,200 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन करने में सक्षम हो जाएगा.
एक बार आपूर्ति सुनिश्चित हो गई तो 20% ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखना संभव हो गया. तो ऐसे में यह कहना कि भारत ने जल्दबाजी की, यह तथ्यों के विपरीत है. इसे शुरू करने से पहले ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों, विभिन्न जांच एजेंसियों समेत सभी स्टेकहोल्डर्स से सलाह ली गई थी.
तथ्य यह भी है कि ब्राजील को इसमें दशकों लग गए क्योंकि वह दुनिया का पहला बड़े पैमाने पर इथेनॉल इकोसिस्टम बना रहा था. भारत में इथेनॉल की सफलता के पीछे की असली कहानी एक सावधानीपूर्वक नियोजित, चरणबद्ध, क्रमिक और चरणबद्ध लाया गया बदलाव है, न कि जल्दबाजी में या रातोंरात लिया गया फैसला.

E10 लिखे पुराने वाहनों का क्या होगा?
सरकार का दावा है कि E20 का पुराने वाहनों में भी बड़े पैमाने पर कोई असामान्य नुकसान नहीं मिला है. मारुति और हीरो जैसे निर्माताओं ने सर्विस डेटा में E20 से जुड़ी बड़ी समस्या नहीं बताई है. वाहन मैनुअल में E10 का उल्लेख उस समय के मानक के अनुसार था, लेकिन यह ये प्रमाण नहीं है कि ये E20 के लिए असुरक्षित हैं. फिर भी, वाहन निर्माता की सलाह और वारंटी शर्तें देखना उचित रहेगा.
E20 सस्ता क्यों नहीं है?
इथेनॉल किसानों से तय कीमत पर खरीदा जाता है, इसलिए इसकी लागत हमेशा कम नहीं होती. सरकार का कहना है कि मकसद पेट्रोल सस्ता करना नहीं, बल्कि आयातित तेल पर निर्भरता कम करना है. E20 से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों का असर कुछ हद तक कम होता है.
E20 के फायदे (सरकार के अनुसार)
कम कार्बन उत्सर्जन. बेहतर ऑक्टेन और एंटी-नॉकिंग गुण. कच्चे तेल के आयात में कमी. किसानों को अतिरिक्त आय और ऊर्जा सुरक्षा में बढ़ोतरी.
क्या पुराने वाहन मालिकों को चिंता करनी चाहिए?
सरकार का जवाब है नहीं, क्योंकि E20 को वर्षों की टेस्टिंग और फील्ड ट्रायल के बाद लागू किया गया है. हालांकि, अगर किसी खास मॉडल के लिए निर्माता अलग सलाह देता है, तो उसी का पालन करना चाहिए.
100% पेट्रोल या E10 का विकल्प क्यों नहीं है?
सरकार का कहना है कि E20 वैज्ञानिक परीक्षण और उद्योग की सहमति के बाद लागू किया गया. अलग-अलग ईंधन (शुद्ध, E10, E20) रखने से सप्लाई चेन जटिल और महंगी हो जाएगी. E20 से कच्चे तेल का आयात घटाने, प्रदूषण कम करने और किसानों की आय बढ़ाने का लक्ष्य है. इथेनॉल इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े निवेश हो चुके हैं, इसलिए पीछे लौटना व्यावहारिक नहीं माना गया.
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