- जन्म और मृत्यु के पंजीकरण में 2 साल से अधिक की देरी पर मामला कोर्ट जाएगा.
- नागरिकों के जन्म और मृत्यु रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से जोड़कर एक एकीकृत केंद्रीय डेटाबेस तैयार किया जाएगा.
- इसे आधार, मतदाता सूची, राशन कार्ड और पासपोर्ट प्रणाली से लिंक किया जाएगा.
लोकसभा में आज गृह मंत्री अमित शाह जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश करेंगे. लोकसभा सचिवालय के रिकॉर्ड के मुताबिक, इस विधेयक का लक्ष्य जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को अधिक सटीक, भरोसेमंद और पूरी तरह डिजिटल बनाना है. साथ ही इसके तहत जन्म या मृत्यु का पंजीकरण कुछ वर्षों के बाद कराने की प्रक्रिया को पहले से अधिक सख्त बनाया जाएगा. प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति जन्म या मृत्यु का पंजीकरण तय समय के काफी बाद कराता है, तो उसे सिर्फ आवेदन देकर प्रमाणपत्र नहीं मिल सकेगा. ऐसे में मजिस्ट्रेट या अदालत की मंजूरी लेनी होगी. सरकार का मानना है कि इससे फर्जी रिकॉर्ड, पहचान संबंधी गड़बड़ियों और सरकारी दस्तावेजों में होने वाली विसंगतियों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी.
चलिए जानते हैं कि आखिर जन्म प्रमाणपत्र क्यों इतना महत्वपूर्ण बन गया है? सरकार क्या बदलाव लाने जा रही है? और किन मामलों में कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं?
गृह मंत्रालय और भारत की जनगणना (रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया) से उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, साल 2023 में किए गए संशोधन के बाद जन्म प्रमाणपत्र को नागरिक की कानूनी पहचान के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में शामिल किया गया. इसका उपयोग स्कूल में एडमिशन, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए और सरकारी नौकरियों समेत विभिन्न सरकारी योजनाओं में किया जाना है.
वर्तमान में नियम है कि अगर जन्म या मृत्यु के 21 दिनों के भीतर इसका पंजीकरण कराया गया तो वो पूरी तरह निःशुल्क होता है.

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अब क्या बदलने जा रही है सरकार?
30 दिन से 1 साल की देरी पर: जिला रजिस्ट्रार या अधिकृत अधिकारी से इसके लिए लिखित में अनुमति लेनी होगी. फिर तय शुल्क के साथ ही पंजीकरण कराया जा सकेगा.
1 से 2 साल की देरी पर मजिस्ट्रेट की मंजूरी: लोकसभा सचिवालय के रिकॉर्ड के मुताबिक, यदि जन्म या मृत्यु का पंजीकरण 1 साल से 2 साल की देरी से कराया जाता है, तो संबंधित व्यक्ति को डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट या कार्यकारी मजिस्ट्रेट की मंजूरी लेनी होगी.
2 साल से ज्यादा की देरी पर कोर्ट जाना होगा: वहीं अगर जन्म या मृत्यु का पंजीकरण 2 साल से अधिक देर से कराया जाता है, तो मामला कोर्ट में जाएगा. ऐसे मामलों में प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट यानी फर्स्ट क्लास ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही पंजीकरण किया जा सकेगा. यानी वर्षों बाद प्रमाणपत्र बनवाना अब पहले की तुलना में कहीं अधिक कानूनी प्रक्रिया से गुजरेगा.
देर करने पर जुर्माने का भी प्रावधान
लोकसभा सचिवालय के रिकॉर्ड के मुताबिक, प्रस्तावित संशोधन में नियमों का उल्लंघन करने, गलत जानकारी देने या निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने पर जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है. जुर्माने की राशि और प्रक्रिया विधेयक तथा उसके तहत बनाए जाने वाले नियमों में तय की जाएगी.
केंद्रीय डिजिटल डेटाबेस क्या होगा?
इस विधेयक का सबसे बड़ा बदलाव पूरे देश के जन्म और मृत्यु रिकॉर्ड का एकीकृत केंद्रीय डिजिटल डेटाबेस तैयार करना है. गृह मंत्रालय और भारत की जनगणना से उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, देशभर में दर्ज जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से जोड़कर एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाया जाएगा. इसे आधार, मतदाता सूची यानी वोटर आईडी, राशन कार्ड और पासपोर्ट सिस्टम जैसी सरकारी व्यवस्थाओं से जोड़ा जाएगा ताकि अलग-अलग विभागों में नागरिकों की एक समान और प्रमाणित जानकारी उपलब्ध हो सके.

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सरकार ऐसा क्यों करना चाहती है?
गृह मंत्रालय और भारत की जनगणना से उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, समय पर और सटीक जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण किसी भी देश की नागरिक पंजीकरण प्रणाली की रीढ़ माना जाता है. इसी आधार पर स्वास्थ्य, शिक्षा, जनसंख्या, सामाजिक सुरक्षा, चुनाव और अन्य सरकारी योजनाओं की योजना बनाई जाती है. सरकार का मानना है कि डिजिटल और एकीकृत रिकॉर्ड से प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ेगी और फर्जी दस्तावेजों पर भी रोक लगेगी.
सरकार का कहना है कि इससे अलग-अलग विभागों में एक जैसी जानकारी उपलब्ध होगी और आमलोगों को बार-बार अलग-अलग दस्तावेज जमा नहीं करने पड़ेंगे. यह व्यवस्था पहले से लागू 2023 के संशोधन की डिजिटल पहचान संबंधी सोच को और आगे बढ़ाती है. रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के मुताबिक सटीक और समय पर जन्म-मृत्यु पंजीकरण किसी भी देश की नागरिक पंजीकरण प्रणाली की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है. इसी आधार पर जनसंख्या से जुड़े विश्वसनीय आंकड़े तैयार किए जाते हैं.

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इससे क्या फायदे होंगे?
अगर यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो कई लाभ हो सकते हैं. फर्जी जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्रों पर रोक लगेगी. सरकारी रिकॉर्ड अधिक सटीक होंगे. आधार, पासपोर्ट और अन्य पहचान के डॉक्युमेंट्स में एक तरह के रिकॉर्ड होंगे. सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की सटीक पहचान संभव होगी. डेथ सर्टिफिकेट के रिकॉर्ड को समय पर अपडेट करने से आय दिन होने वाले फर्जीवाड़ा को रोका जा सकेगा. जनसंख्या और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े अधिक विश्वसनीय बनेंगे.
क्या कुछ चुनौतियां भी हैं?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सख्त नियमों के साथ ही इसके पालन में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं. जैसे, ग्रामीण क्षेत्रों या दूर-दराज के इलाकों और प्रवासी मजदूरों के परिवारों में आज भी कई बार जन्म या मृत्यु का पंजीकरण समय पर नहीं हो पाता. ऐसे लोगों के लिए अदालत तक पहुंचना समय और खर्च दोनों के लिहाज से कठिन हो सकता है.
साथ ही, जब जन्म और मृत्यु का डेटा आधार, मतदाता सूची और अन्य सरकारी डेटाबेस से जोड़ा जाएगा, तब डेटा सुरक्षा और प्राइवेसी को लेकर भी पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी. जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 केवल देर से प्रमाणपत्र बनवाने पर सख्ती करने वाला कानून नहीं है. इसका बड़ा उद्देश्य देश की जनता के डेथ और बर्थ दोनों सर्टिफिकेट को डिजिटल, एकीकृत और अधिक विश्वसनीय बनाना है.
अगर यह विधेयक संसद से पास हो जाता है, तो आने वाले समय में जन्म प्रमाणपत्र नागरिक की पहचान का सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती दस्तावेज बन जाएगा. वहीं, वर्षों बाद जन्म या मृत्यु का पंजीकरण कराने वालों को मजिस्ट्रेट और कई मामलों में अदालत की मंजूरी लेनी होगी.
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