Explainer: पेलेट गन के इस्तेमाल पर क्या कहते हैं संयुक्त राष्ट्र, मानवाधिकार संगठन, भारतीय कानून और सुप्रीम कोर्ट?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन के बाद पेलेट गन एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है. चलिए जानते हैं इसके बारे में क्या कहते हैं मानवाधिकार संगठन, भारतीय कानून, सुप्रीम कोर्ट और संयुक्त राष्ट्र संघ.
लोकसभा में मंगलवार को एंटी पेपर लीक बिल पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने सरकार को घेरते हुए इसे लेकर सवाल पूछा कि प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन चलाए जाने का आदेश किसने दिया था. हालांकि दिल्ली पुलिस शुरू में प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन चलाए जाने के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि उसके पास ऐसे हथियार हैं ही नहीं. लेकिन कुछ दिनों बाद सूत्रों के मुताबिक रैपिड एक्शन फोर्स की आंतरिक जांच में सामने आया कि एक जवान ने प्रदर्शन के दौरान पेलेट गन से सात राउंड फायर किए थे, जिनमें पांच प्रदर्शनकारी घायल हुए. अब यह जांच हो रही है कि क्या बल प्रयोग तय स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रॉसिजर के अनुरूप था और क्या परिस्थितियां वास्तव में इतनी गंभीर थीं कि पेलेट गन का इस्तेमाल जरूरी हो गया था?
दिल्ली की इस घटना ने एक पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया है. आखिर पेलेट गन है क्या? इसे इतना विवादित क्यों माना जाता है? क्या भारतीय कानून इसकी अनुमति देता है? संयुक्त राष्ट्र, मानवाधिकार संगठन और सुप्रीम कोर्ट का इस पर क्या नजरिया है?

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कश्मीर से शुरू हुआ सबसे बड़ा विवाद
भारत में पेलेट गन का सबसे चर्चित इस्तेमाल 2016 में जम्मू-कश्मीर में हुआ था. आतंकी कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन हुए. प्रदर्शनकारियों ने लगातार पत्थरबाजी जैसी घटना को अंजाम दिया. ऐसे में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों ने पेलेट गन का इस्तेमाल किया. उस दौरान कुछ लोगों की आंखों में छर्रे लगे. कई लोगों की एक या दोनों आंखों की रोशनी चली गई, जबकि कई अन्य घायल हुए. इन्हीं घटनाओं के बाद पेलेट गन अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बन गई और मानवाधिकार संगठनों ने इसकी आलोचना शुरू कर दी.
उससे पहले भी 2010 में कश्मीर में अशांति के दौरान सुरक्षा बलों ने इसका इस्तेमाल किया था जिससे 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी.

पेलेट गन
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पेलेट गन क्या है?
पेलेट गन एक ऐसा हथियार है, जिससे छोटे-छोटे धातु, रबर या प्लास्टिक के छर्रे (पेलेट) दागे जाते हैं. इसका इस्तेमाल आमतौर पर भीड़ को नियंत्रित करने और लोगों को तितर-बितर करने के लिए किया जाता है. क्राउड कंट्रोल के लिए सुरक्षा बल जिस पेलेट गन का इस्तेमाल करते हैं, वह आमतौर पर 12 गेज की पंप-एक्शन शॉटगन होती है. इसमें ऐसे कारतूस लगाए जाते हैं, जिनमें एक साथ कई छोटे-छोटे छर्रे भरे होते हैं. ट्रिगर दबाते ही ये सभी छर्रे तेज रफ्तार से बाहर निकलते हैं और फैल जाते हैं.
इसे जान लेने के लिए नहीं, बल्कि भीड़ को नियंत्रित करने के मकसद से बनाया गया है. इसलिए इसे कम घातक हथियार माना जाता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह पूरी तरह सुरक्षित है.
अगर ये छर्रे आंख, सिर या गर्दन जैसे संवेदनशील हिस्सों पर लग जाएं, तो गंभीर चोट लग सकती है. कई मामलों में आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली जाती है. छर्रे शरीर के मुलायम हिस्सों में घुस सकते हैं और अंदरूनी चोट भी पहुंचा सकते हैं.
पेलेट गन करीब 500 गज तक असर कर सकती है. हालांकि, अगर इसे बहुत कम दूरी से चलाया जाए, तो यह जानलेवा भी साबित हो सकती है. इसलिए मानवाधिकार संगठनों और कई विशेषज्ञों का मानना है कि भीड़ नियंत्रण के दौरान इसका इस्तेमाल बेहद सावधानी और तय नियमों के तहत ही होना चाहिए.
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संयुक्त राष्ट्र संघ
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संयुक्त राष्ट्र संघ क्या कहता है?
संयुक्त राष्ट्र पेलेट गन को भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाले सबसे खतरनाक हथियारों में गिनता है. इससे स्थायी अंधापन, गंभीर आंखों की चोट और बच्चों सहित आम नागरिकों को नुकसान पहुंचा है. भीड़ नियंत्रण के दौरान बल का प्रयोग केवल उतना ही होना चाहिए जितना बिल्कुल आवश्यक हो. हालांकि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें भारत पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं, लेकिन वे वैश्विक मानवाधिकार मानकों का महत्वपूर्ण संदर्भ मानी जाती हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल
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मानवाधिकार संगठन क्या कहते हैं?
मानवाधिकार संगठन का कहना है कि पेलेट गन स्वभाव से ही बिना भेदभाव के चोट पहुंचाने वाला हथियार है क्योंकि इसके छर्रे कई दिशाओं में फैलते हैं. ऐसे में प्रदर्शनकारी, राहगीर और बच्चे भी इसकी चपेट में आ सकते हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि पेलेट गन से आंखों की स्थायी क्षति और आजीवन विकलांगता के अनेक मामले सामने आए हैं. इसलिए इसे भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

भारत सरकार का पक्ष क्या है?
भारत सरकार का कहना है कि पेलेट गन जान लेने के लिए नहीं बल्कि हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल की जाती है.
गृह मंत्रालय के अनुसार, यह आखिरी विकल्प होता है. इससे पहले आंसू गैस, शेल, वॉटर कैनन और अन्य उपाय अपनाए जाते हैं. जवानों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है. एसओपी के तहत कम से कम बल प्रयोग करने और अनावश्यक चोट से बचने के निर्देश दिए जाते हैं. सरकार का तर्क है कि कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है जहां अगर पेलेट गन का इस्तेमाल न किया जाए तो जीवित गोलियां चलानी पड़ सकती हैं, जिससे कहीं अधिक जानें जा सकती हैं.

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भारतीय कानून क्या कहता है?
भारत में ऐसा कोई अलग कानून नहीं है जो पेलेट गन को सीधे वैध या अवैध घोषित करता हो. इसका इस्तेमाल पुलिस और अर्धसैनिक बलों के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर, कानून-व्यवस्था बनाए रखने से जुड़े प्रावधानों और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के तहत किया जाता है.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अनुसार किसी भी सरकारी बल प्रयोग में आवश्यकता, अनुपातिकता और न्यूनतम आवश्यक बल का सिद्धांत लागू होता है.

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सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख है?
सुप्रीम कोर्ट ने अब तक पेलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है. जम्मू-कश्मीर से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा था कि सुरक्षा बलों को पेलेट गन का अंधाधुंध इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. अदालत ने सरकार से अधिक सुरक्षित विकल्प तलाशने और एसओपी का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत को भी स्वीकार किया.
जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने क्या कहा?
जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने भी पेलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार किया था. अदालत ने माना कि हिंसक भीड़ और आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को प्रभावी साधनों की जरूरत होती है. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर कार्रवाई तय एसओपी और कानून के अनुसार ही होनी चाहिए.
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दिल्ली के मामले में नया सवाल क्या है?
दिल्ली की घटना ने बहस को नया मोड़ दे दिया है. पहले दिल्ली पुलिस ने कहा कि उसने पेलेट गन का इस्तेमाल नहीं किया. बाद में RAF की जांच में एक जवान द्वारा सात राउंड फायर किए जाने की पुष्टि सामने आई. इसके बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या भीड़ नियंत्रण के दौरान बल का प्रयोग "आवश्यक" और "अनुपातिक" था, जैसा कि कानून और SOP की मांग है. जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कहीं किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं.
पेलेट गन पर विवाद केवल एक हथियार का नहीं, बल्कि दो संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन का है. एक तरफ राज्य की जिम्मेदारी है कि वह हिंसक भीड़, पुलिस और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे. दूसरी तरफ हर नागरिक के जीवन, गरिमा और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है.
दिल्ली की हालिया घटना ने यह बहस फिर तेज कर दी है कि क्या भारत को पेलेट गन जैसे हथियारों पर पुनर्विचार करना चाहिए या फिर इनके इस्तेमाल को और अधिक सख्त नियमों और जवाबदेही के दायरे में लाने की जरूरत है. जांच के निष्कर्ष चाहे जो हों, यह मामला आने वाले समय में भी भीड़ नियंत्रण की नीति और मानवाधिकारों पर राष्ट्रीय बहस का महत्वपूर्ण विषय बना रहेगा.

दुनिया में कहां कहां हुआ पेलेट गन का इस्तेमाल
दुनिया के कई देशों में भीड़ नियंत्रण के लिए पेलेट या शॉटगन से दागे जाने वाले छर्रों का इस्तेमाल हुआ है, लेकिन लगभग हर जगह यह गंभीर विवाद का कारण बना. 2011 के अरब स्प्रिंग के दौरान बहरीन और मिस्र में प्रदर्शनकारियों पर पेलेट शॉटगन चलाने के आरोप लगे, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की आंखों में गंभीर चोटें आईं. ट्यूनीशिया में भी ऐसे हथियारों के इस्तेमाल की आलोचना हुई.
2019 में चिली में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान रबर-कोटेड धातु के पेलेट से हजारों लोग घायल हुए, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा और इनके इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए. वहीं स्पेन के कैटालोनिया क्षेत्र ने 2014 में एक प्रदर्शनकारी की आंख की रोशनी जाने के बाद रबर बुलेट और ऐसे शॉटगन हथियारों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी.
इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि भीड़ नियंत्रण के लिए पेलेट आधारित हथियारों का इस्तेमाल केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, लेकिन जहां-जहां इनका प्रयोग हुआ, वहां मानवाधिकार, अनुपातिक बल प्रयोग और नागरिक सुरक्षा को लेकर गंभीर बहस खड़ी हुई.
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