सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाइकोर्ट में जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II की भर्ती परीक्षा से जुड़े मामले में आरक्षण को लेकर अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि ऐसे अभ्यर्थी जो आरक्षित वर्ग के हैं, लेकिन सामान्य (जनरल/ओपन) श्रेणी की कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल करते हैं तो उन्हें शॉर्टलिस्टिंग के चरण में ओपन कैटेगरी में माना जाना चाहिए. उन्हें उनकी आरक्षित श्रेणी तक सीमित नहीं रखा जा सकता है. यह फैसला देश में सरकारी नौकरी करने वाले युवाओं के लिए अहम है.आइए हम आपको बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लेकर युवाओं की राय क्या है.
गफलत की वजह से रुकी हुई है भर्ती
अशोक सैनी ने बताया कि वो ओबीसी कैटेगरी से आते हैं.उन्होंने इस फैसले को अच्छा बताया. उन्होंने बताया कि वो हाईकोर्ट एलडीसी 2022 परीक्षा में अभ्यर्थी थे. उनके साथ यही हुआ, सामान्य श्रेणी से ओबीसी की कट ऑफ ज्यादा गई थी. इसके बाद हाइकोर्ट में इसको लेकर पीटीशन लगाई गई थी. अदालत से कुछ अभ्यर्थियों को राहत मिली. लेकिन इस सबमें पूरी प्रक्रिया जटिल हो गई. यदि यह बात पहले ही स्पष्ट रहती तो अभ्यर्थियों को कोई गफलत नहीं होती. बिना किसी असमंजस के सब होता. भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी और सही ढंग से समय पर पूर्ण हो जाती. लेकिन गफलत की वजह से यह भर्ती लंबित है.
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लोकेश सिंगोदिया ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी केस का हवाला दिया है. जब अभ्यर्थी मेरिट सामान्य श्रेणी की पार कर लेता है तो उन्हें उसी में नियुक्ति देनी चाहिए. यदि ऐसा फिल्टर सभी आरक्षित कैटेगरी में लगा दिया जाएगा तो फिर सामान्य श्रेणी में तो बहुत कम जातियां बचेंगी. क्योंकि सामान्य श्रेणी में आने वाले लोगों की जनसंख्या तो कम है. यदि अभ्यर्थी सामान्य श्रेणी की कट ऑफ ला रहा है तो उसे उसी में देखना चाहिए.यही तो ओपन टू ऑल कैटेगरी का मतलब है.
क्या है एससी वर्ग के अभ्यर्थी की राय
अनुसूचित जाति श्रेणी के विनीत चंद्रावल ने कहा कि वो पटवारी और ग्राम विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं. वो कहते हैं कि जनरल/सामान्य/अनारक्षित/ओपन टू ऑल आप इस श्रेणी को जो भी कहें, इसके नाम में समझ आता है, अनारक्षित यानी किसी के लिए आरक्षित नहीं. इस कैटेगरी में अन्य अभ्यर्थियों को नौकरी से पाने से रोकने का मतलब आप उसे आरक्षित करना चाहते हैं क्या? यह फैसला एक दम ठीक है. आरक्षण की अवधारणा को समझना होगा. वो कहते हैं कि आरक्षण केवल नौकरी देने का मसला नहीं है, यह प्रतिनिधित्व देने की बात है. सामाजिक रूप से कई सालों से हाशिए पर रखे गए लोगों को मुख्यधारा में जगह देने की बात है. इसलिए जो योग्य है, उसे योग्यता के आधार पर नौकरी मिलनी चाहिए. सामान्य श्रेणी किसी के लिए आरक्षित थोड़ी है.
आरक्षित श्रेणी के अधिकारी का बेटा और सामान्य गरीब का बेटा क्या एक जैसे हैं
वहीं सामान्य श्रेणी के विशांत शर्मा ने बताया कि यह फैसला सामान्य श्रेणी के बच्चों पर कुठाराघात है. जब हम आरक्षण की बात करते हैं, जिसमें प्रतिनिधित्व और सामाजिक भेदभाव को आधार माना जाता है. इसमें एक बात यह भी है कि सामाजिक भेदभाव की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की जरूरत है. समय के साथ यह केवल जाति नहीं, बल्कि वर्ग यानी आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करती है. एक आरक्षित श्रेणी के अमीर या किसी अधिकारी और नेता के लड़के को वे सभी फायदे, सामाजिक सम्मान और अन्य विशेषाधिकार मिल सकते हैं, जो किसी भी सामान्य श्रेणी के गरीब या मिडिल क्लास बच्चे के लिए संभव नहीं हैं.ऐसे में उन दोनों की योग्यता और परिस्थितियों को एक आंकना ठीक नहीं है. अब समय के साथ आरक्षण के नियमों, परिभाषाओं और पात्रताओं पर पुनर्विचार करने का समय है.
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