कमजोर या जर्जर इमारतें, सीलन भरे कमरे, गर्मी-उमस-घुटन, न लिफ्ट लगी हैं, न पार्किंग, यहां तक कि साफ हवा-पानी पर भी आफत है और खाने के नाम पर बस पेट भरने लायक भोजन! राजधानी दिल्ली देश के अलग-अलग राज्यों, शहरों से आए लाखों छात्रों का कुछ इसी तरह 'खयाल' रखती है. और ऐसे 'खयाल' रखने के लिए हरेक से हर महीने वसूले जा रहे हैं हजारों रुपये. लाखों छात्रों से वसूले जा रहे हजारों रुपये मिलकर बनते हैं, कई हजार करोड़ रुपये.
सालाना ये आंकड़ा 45,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है. और राजधानी दिल्ली की 13.27 लाख करोड़ की इकोनॉमी में ये बहुत बड़ा हिस्सा है.
लेकिन दिल्ली की इकोनॉमी में 'जान' फूंकने वाले छात्रों की 'जान' सांसत में क्यों है? क्यों PG में सिक्योरिटी के नाम पर तीन गुना पैसे देने के बावजूद उनकी 'सिक्योरिटी' से किसी को कोई मतलब नहीं?
NDTV के अनुरोध पर एक राष्ट्रीय ट्रेड संघ (A National Trade Confederation) ने दिल्ली की PG इकोनॉमी का असेसमेंट किया तो 45,000 करोड़ रुपये का अनुमान सामने आया. यानी पीजी में रहने वाले करीब 7 से 8 लाख छात्र राजधानी में 45 हजार करोड़ रुपये खर्च करते हैं. (इसी खबर में नीचे हमने इंफोग्राफिक्स में समझाया है.)
छात्र केवल छात्र नहीं, बहुत बड़ा उपभोक्ता वर्ग
रियल एस्टेट रिसर्च फर्म नाइट फ्रैंक, QS और डेलॉयट की एक ज्वाइंट रिसर्च रिपोर्ट "India's 155 Million Students Mandate" के अनुसार, देश का हायर एजुकेशन स्टूडेंट्स बेस करीब 15.5 करोड़ का हो गया है. ये 15.5 करोड़ छात्र केवल शिक्षण संस्थानों के छात्र नहीं, बल्कि शहरों में हाउसिंग, फूड, मोबिलिटी, रिटेल और एंटरटेनमेंट जैसे सेक्टर्स के लिए एक बहुत बड़ा कंज्यूमर बेस यानी ग्राहक वर्ग हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय के PGDAV कॉलेज में सहायक प्रोफेसर डॉ प्रकाश उप्रेती कहते हैं, लाखों छात्र अपने घरों से दूर रहकर पढ़ाई करते हैं और उनकी जरूरतों ने शहरों में एक समानांतर स्टूडेंट इकोनॉमी तैयार की है. PG, किराये के कमरे, टिफिन, साइबर कैफे, कोचिंग, ई-कॉमर्स, मेट्रो और कैब से लेकर मोबाइल और इंटरनेट तक, छात्रों का मासिक खर्च कारोबार को मजबूती से सहारा देता है.
दिल्ली में कहां कितना खर्च कर रहे हैं PG वाले छात्र?
NDTV के लिए असेसमेंट करने वाले एक राष्ट्रीय व्यापारिक संगठन के अधिकारी ने पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया कि दिल्ली की पीजी इकोनॉमी का साइज 45 हजार करोड़ रुपये के करीब है. आकलन के मुताबिक,
- दिल्ली में करीब डेढ़ से दो लाख PG आवास होने का अनुमान है.
- इनमें 2 लाख PG मकानों में करीब 7-8 लाख छात्रों के रहने का अनुमान है.
- किराये के तौर पर ये छात्र सालाना करीब 11 से 15 हजार करोड़ रुपये देते हैं.
- रोजमर्रा के FMCG, पर्सनल केयर, स्टेशनरी वगैरह पर खर्च 4-5 हजार करोड़ रुपये है.
- कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स पर खर्च करीब 10 से 12 हजार करोड़ रुपये है.
- और कपड़े, सर्विसेज वगैरह मद में इनका सालाना खर्च 10 से 13 हजार करोड़ होने का अनुमान है.

दिल्ली में छात्र PG में क्यों रहते हैं, मजबूरी या कुछ और भी?
दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या लाखों में है, जबकि हॉस्टल में सीटों की संख्या हजारों में है. वाइस चांसलर प्रो योगेश सिंह के मुताबिक, यूनिवर्सिटी के हॉस्टल्स में 3,422 सीटें, कॉलेजों के हॉस्टल्स में 3,788, जबकि अन्य कुछ हॉस्टल्स में भी सैकड़ों सीटें हैं. कुल मिलाकर 11,995 सीटें हैं. साफ है कि बाकी लाखों छात्र बाहर PG में रहने को मजबूर हैं.

बस मजबूरी ही है? डॉ उप्रेती कहते हैं, नहीं. बहुत-से छात्र और यहां तक कि अभिभावकों की भी प्राथमिकता में हॉस्टल नहीं है. इस साल एडमिशन सेल में ड्यूटी कर चुके डॉ उप्रेती कहते हैं, बहुत से अभिभावकों ने एडमिशन के लिए हॉस्टल की बजाय अच्छी और किफायती PG के बारे में सवाल किया. इसके पीछे की बड़ी वजह वो 'मार्केटिंग' को बताते हैं.
दिल्ली शिक्षा का बड़ा हब, सुविधाएं ज्यादा, इसलिए एक्सपोजर भी
दिल्ली में कमला नगर, विजय नगर, मुखर्जी नगर, किंग्सवे कैंप, हडसन लेन, बेर सराय, सत्य निकेतन जैसे इलाकों में आवासीय मकान, कई वर्षों से PG में तब्दील हो चुके हैं. "India's 155 Million Students Mandate" रिपोर्ट में दिल्ली को हायर एजुकेशन और इंटरनेशनल एजुकेशन के लिए देश के बड़े हब में गिना गया है.
दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों को उच्च शिक्षा, रोजगार, कनेक्टिविटी, सर्विस सेक्टर और इंटरनेशनल एक्सपोजर के चलते महत्वपूर्ण बताया गया है. हॉस्टल वाला मसला किनारे कर दें तो सुविधाओं के नाम पर यहां काफी कुछ है, जिससे बड़ी संख्या में छात्र यहां देशभर से खिंचे चले आते हैं.
दिल्ली यूनिवर्सिटी के खालसा कॉलेज में सहायक प्रोफेसर और आलोचक डॉ अमरेंद्र पांडेय कहते हैं, 'दिल्ली छात्रों के लिए सिर्फ पढ़ाई का शहर नहीं, ये इंटर्नशिप और नौकरी/रोजगार का बड़ा केंद्र है.
वो कहते हैं, 'दिल्ली को दिल्ली बनाए रखने में छात्रों को बड़ा योगदान है. छात्र जिस तरह यहां की इकोनॉमी को बूस्ट करते हैं, दिल्ली को भी चाहिए कि छात्रों की सुरक्षा को सम्मान के साथ बनाए रखे.'
डॉ अमरेंद्र उम्मीद करते हैं कि प्रशासनिक स्तर पर कुछ बड़े कदम उठाए जाएंगे और कार्रवाई के लिए 'सत्य निकेतन' जैसे किसी और हादसे का इंतजार नहीं किया जाएगा.
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