दिल्ली एनसीआर के 35 जिलों में कल यानी 1 अक्टूबर से नो पीयूसी नो फ्यूल पॉलिसी लागू हो जाएगी यानी अगर गाड़ी का प्रदूषण प्रमाणपत्र नहीं है तो आपको पेट्रोल पंप पर तेल नहीं मिलेगा. लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या वैध प्रदूषण प्रमाणपत्र (PUC) होना गाड़ी के प्रदूषण न फैलाने का सबूत है. पीयूसी यानी पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफिकेट का मतलब है कि उस वाहन में प्रदूषण फैलाने वाले तत्व नियंत्रित स्तर पर हैं. लेकिन असल में पीयूसी की जांच में प्रदूषण फैलाने वाले कुछ तत्वों की जांच तो होती ही नहीं. दिल्ली एनसीआर में हाल ही में एक लाख वाहनों की जांच हुई तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई हैं.
पेट्रोल पंप ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन कैमरों से लैस
No PUCC-No Fuel अभियान के लिए अकेले दिल्ली के 500 से ज्यादा पेट्रोल पंप ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरों से लैस किए गए हैं. नियमों का पालन न करने वाले पेट्रोल पंपों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी है. ताकि बिना वैध पॉल्यूशन सर्टिफिकेट के बिना गाड़ियां सड़क पर न चलने पाएं. इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (ICCT) के इंडिया मैनेजिंग डायरेक्टर अमित भट्ट ने बताया कि पीयूसी में क्या जांच होती है और कौन से प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों की जांच नहीं होती.

सीएनजी गाड़ियों में भी मिला प्रदूषण
भट्ट ने कहा कि PUC टेस्ट से पेट्रोल, CNG और LPG गाड़ियों में कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन के स्तर को मापता है. डीजल गाड़ियों में धुएं की अपारदर्शिता की जांच होती है. यानी यह पता चलता है कि एग्जॉस्ट से निकलने वाला धुआं रोशनी को कितना रोकता है.PUC में PM या PN और NOx जैसे प्रदूषण के जिम्मेदार मुख्य तत्वों की जांच नहीं होती. PM का मतलब है पार्टिकुलेट मैटर (particulate matter). PN का मतलब है पार्टिकल नंबर (particle number) और NOx का मतलब है नाइट्रोजन ऑक्साइड्स. ये बारीक कणों वाले प्रदूषण तत्व हैं. दिल्ली एनसीआर में खराब हवा के लिए ये भी जिम्मेदार हैं. लिहाजा वैलिड PUC का मतलब आपकी गाड़ी उन टेस्ट में पास हो गई जो किए गए थे. इसका मतलब यह नहीं है कि एग्जॉस्ट से निकलने वाले हर प्रदूषणकारी तत्व की जांच की गई थी.
क्या कोई गाड़ी PUC पास के बाद भी प्रदूषण फैला सकती है?
भट्ट ने कहा कि कोई वाहन चालकर वैलिड PUC तो हासिल कर सकता है, लेकिन उससे ज्यादा NOx या पॉल्यूशन पार्टिकल निकलते हैं, क्योंकि टेस्ट में ये चीजें नहीं मापी जातीं. सड़क पर गाड़ी से निकलने वाला प्रदूषण उसकी उम्र, माइलेज, रखरखाव, ड्राइविंग की आदतों और लोड के हिसाब से कम ज्यादा होता है. ICCT ने दिल्ली और गुरुग्राम में 20 जगहों पर एक लाख से ज्यादा गाड़ियों की जांच थी. इसमें उत्सर्जन के नए मानकों वाली BS-VI गाड़ियां काफी साफ थीं. कमर्शियल गाड़ियों में हालांकि ऐसा नहीं था.BS-VI टैक्सी और हल्के सामान ढोने वाली गाड़ियों में प्राइवेट कारों के मुकाबले क्रमशः 2.4 गुना और पांच गुना ज़्यादा NOx निकला. कुछ कैटेगरी की CNG गाड़ियों में भी काफी ज्यादा प्रदूषण की बात सामने आई.इससे यह सोच भी गलत साबित हुई कि CNG का मतलब साफ क्वालिटी होती है.
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BS-VI गाड़ियों का क्या होगा?
BS-VI गाड़ियां आम तौर पर कम प्रदूषण फैलाती हैं. उनकी प्रदूषण नियंत्रण तकनीक भी ज्यादा बेहतर होती है. नई डीजल गाड़ियों में कालिख को रोकने के लिए डीजल पार्टिकुलेट फिल्टर (DPF) का इस्तेमाल होता है. लेकिन डीजल PUC टेस्ट में अब भी धुएं के घनत्व को ही आधार माना जाता है. भट्ट ने कहा कि यह टेस्ट सीधे तौर पर प्रदूषण फैलाने वाले पार्टिकल की संख्या या NOx को नहीं मापता है. इससे यह पता नहीं चल पाता कि गाड़ी के एडवांस्ड प्रदूषण नियंत्रण सिस्टम कितने अच्छे से काम कर रहे हैं.
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डीजल वाहन ज्यादा बड़ा सिरदर्द
यूरोपीय आयोग का कहना है कि जिन गाड़ियों में DPF खराब या उससे छेड़छाड़ की गई हो, वे भी ओपैसिटी टेस्ट पास कर सकती हैं और खराबी का पता नहीं चल पाता. आयोग ऐसे फिल्टर वाली नई डीजल गाड़ियों के लिए पॉल्यूटेड पार्टिकल संख्या की टेस्टिंग की सलाह देता है.भट्ट ने कहा कि PUC टेस्टिंग के दौरान खराबी की चेतावनी देने वाली लाइट पर ध्यान दिया जा सकता है.
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