नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने एंबेसडर होटल को खाली कराने के लिए जारी 'शो-कॉज नोटिस' के खिलाफ होटल की याचिका पर केंद्र सरकार से उसका पक्ष मांगा है। जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर ने 'सर शोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड' की याचिका पर नोटिस जारी किया और केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया है. इस मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त को होगी.
याचिकाकर्ता के सीनियर वकील ने कहा कि उन्हें आशंका है कि 10 जुलाई को बेदखली का आदेश जारी किया जा सकता है. इस तारीख को एस्टेट ऑफिसर के सामने यह मामला लिस्ट किया गया है. उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि एस्टेट ऑफिसर को निर्देश दिया जाए कि वे मामले में आगे बढ़ने से पहले 'पब्लिक प्रेमिसेस (अनऑथराइज्ड ऑक्यूपेंट्स की बेदखली) एक्ट' के तहत कार्यवाही की स्वीकार्यता के मुद्दे पर फैसला करें.
हालांकि, जस्टिस शंकर ने कार्यवाही के संचालन में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा, "वे वैधानिक प्राधिकारी हैं. वे स्वयं इसका ध्यान रखेंगे" उन्होंने आगे कहा, "मैं उन्हें यह निर्देश नहीं देने जा रहा हूं कि उन्हें अपनी कार्यवाही कैसे संचालित करनी है."

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केंद्र सरकार के वकील आशीष दीक्षित ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की अर्जियों पर जवाब दाखिल करने के लिए यह मामला 10 जुलाई को एस्टेट ऑफिसर के सामने लिस्टेड है. उन्होंने कहा, "कार्यवाही जारी रह सकती है. उनका कहना है कि कल बेदखली का आदेश जारी होने वाला है, लेकिन यह मामला उनकी अर्जियों पर हमारा जवाब दाखिल करने के लिए लिस्टेड है." उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी और एस्टेट ऑफिसर कानून के अनुसार कार्यवाही कर रहे थे.
11 जून को जारी कारण बताओ नोटिस को दी थी चुनौती
याचिका में सर शोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड ने लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस के एस्टेट ऑफिसर द्वारा 11 जून को जारी 'कारण बताओ नोटिस' को चुनौती दी. यह नोटिस 'पब्लिक प्रीमिसेस (अनधिकृत कब्ज़ा करने वालों को बेदखल करना) एक्ट, 1971' के तहत जारी किया गया था और इसमें पूछा गया था कि उन्हें सुजान सिंह पार्क (नॉर्थ) नाम की 7.58 एकड़ जमीन से क्यों न बेदखल किया जाए.
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता के पास 8 अक्टूबर 1945 का एक रजिस्टर्ड "सरकारी अनुदान" है. याचिका में कहा गया है कि 2009 में एक अदालत ने सरकार के उस कदम को "गलत और गैर-कानूनी" करार दिया था, जिसके तहत सरकार ने स्थायी पट्टे को खत्म करने के बाद 1960 में जमीन पर "फिर से कब्ज़ा" करने की कोशिश की थी. याचिका में आगे कहा गया है कि हालांकि, अपीलीय अदालय ने 9 जून को इस फैसले के खिलाफ केंद्र की अपील को मंजूरी दे दी थी, लेकिन याचिकाकर्ता की अगली अपील अभी भी हाईकोर्ट में लंबित है।
याचिका में कहा गया है, "यह विवादित नोटिस एक चाल है, जिसका मकसद लंबित और स्वीकार की गई दूसरी अपील को दरकिनार करना और 66 साल पुराने अदालती सिविल विवाद को 15 दिन में बेदखली की समरी कार्रवाई में बदलना है. यह नोटिस पहले अपीलीय आदेश के लागू होने के दो दिन के भीतर और विस्तृत फैसले के आने से पहले ही जारी कर दिया गया था और यह ऐसे अदालती निर्देश पर आधारित है जो कभी दिया ही नहीं गया था."
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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं