मोहनजो-दारो से मिली 4300 साल पुरानी हड़प्पाकालीन ‘पशुपति सील' को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने इसे भारतीय सभ्यता की निरंतरता और आदि-शिव का प्रतीक बताया, जबकि अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के ने इस व्याख्या को चुनौती दे दी है.
क्या है पूरा मामला?
One of the most powerful symbols of India's unbroken civilizational continuity!
— Ministry of Culture (@MinOfCultureGoI) May 27, 2026
Discovered at Mohenjo-daro in undivided India this steatite seal, about 4,300-year-old, shows a seated figure in yogic posture (widely seen as Shiva-Pashupati) seated in Mulabandhasana, surrounded… pic.twitter.com/MxgoEGilxu
संस्कृति मंत्रालय ने हाल ही में इस प्राचीन सील की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए लिखा कि इसमें योग मुद्रा में बैठी आकृति भगवान शिव के आदि स्वरूप ‘पशुपति' को दर्शाती है. मंत्रालय के मुताबिक यह सिर्फ एक मुहर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की अटूट सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है, जो आज भी योग, मंदिरों और धार्मिक परंपराओं में जीवित है.
ऑड्रे ट्रुश्के का विरोध, ‘यह शिव नहीं'
This isn't Shiva. It's more likely adapted from proto-Elamite iconography, showing an Eurasian deity "lord of animals."
— Audrey Truschke (@AudreyTruschke) May 27, 2026
Indian history is amazing, wonderful, and fantastic -- It's well worth getting it right. https://t.co/UJeLh1WjzM
अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि यह आकृति शिव की नहीं है. उनका तर्क है कि यह संभवतः प्रोटो-एलामाइट सभ्यता की कला शैली से प्रभावित एक 'Lord of Animals” (पशुओं के स्वामी) देवता का चित्रण हो सकता है. उनकी इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई और संस्कृति मंत्रालय की पोस्ट वायरल हो गई.
क्या है प्रोटो-एलामाइट सिद्धांत?
दरअसल प्रोटो-एलामाइट सभ्यता का विकास लगभग 3200–2700 ईसा पूर्व के बीच आज के दक्षिण-पश्चिमी ईरान में हुआ था. इस सभ्यता की कला में पशु आकृतियां, धार्मिक प्रतीक और मिश्रित मानव-पशु चित्रण आम थे. ऑड्रे के मुताबिक, इसी शैली का प्रभाव इस सील में दिखता है.
अमीश त्रिपाठी का पलटवार- ‘क्या योग भी एलामाइट हो गया?'
Proto-Elamite?
— Amish Tripathi (@authoramish) May 28, 2026
The Pashupati seal has an elephant, a water buffalo and a rhinoceros. Ancient Elam was centred in southwestern Iran. Elephants, water buffalos and rhinoceroses are not native to ancient Elam. BTW, they are native to India. Also, the figure is seated in a Yogic… https://t.co/UgSJV8uL08
प्रसिद्ध लेखक अमीश त्रिपाठी ने ऑड्रे के दावे को खारिज करते हुए X पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, 'सील पर हाथी, भैंस और गैंडा जैसे जानवर हैं, जो एलाम (ईरान) में नहीं पाए जाते. ये सभी जानवर भारतीय उपमहाद्वीप के मूल निवासी हैं. आकृति स्पष्ट रूप से योग मुद्रा में बैठी है.' अमीश ने तंज कसते हुए पूछा, 'क्या अब योग भी एलामाइट संस्कृति का हिस्सा हो गया है?'
दूसरे विशेषज्ञ भी विरोध में
प्रोफेसर लावण्या वेमसानी ने भी ऑड्रे ट्रुश्के के दावे को खारिज किया. उन्होंने कहा कि एलामाइट और सिंधु-सरस्वती सभ्यता की सील में जमीन-आसमान का अंतर है और दोनों में 1% भी समानता नहीं है. उनके अनुसार, इस सील में दिख रही मुद्रा ‘मूलबंधासन' है, जो उन्नत योग साधना से जुड़ी है.
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पाकिस्तान से भी उठे सवाल
विवाद में एक और एंगल तब जुड़ गया जब कुछ पाकिस्तानी यूजर्स ने यह सवाल उठाया कि मोहनजो-दारो आज पाकिस्तान में स्थित है, ऐसे में भारत इस विरासत पर दावा कैसे कर सकता है. इस पर संस्कृति मंत्रालय ने कहा कि भले ही स्थल आधुनिक सीमाओं के बाहर हों, लेकिन इस विरासत की सांस्कृतिक निरंतरता भारत में जीवित है.
बहस का असली मुद्दा
गौरतलब है कि यह विवाद सिर्फ एक मुहर की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बड़े सवाल से जुड़ा है कि प्राचीन इतिहास को देखने का नजरिया क्या होना चाहिए. एक पक्ष इसे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता का प्रमाण मानता है. दूसरा पक्ष ठोस पुरातात्विक और तुलनात्मक साक्ष्यों पर आधारित व्याख्या की मांग करता है.
क्यों अहम है ‘पशुपति सील'?
इसे ‘Seal 420/DK-G' के नाम से जाना जाता है. यह सिंधु घाटी सभ्यता की प्रमुख खोजों में शामिल है. दशकों से इसे ‘प्रोटो-शिव' या ‘पशुपति' माना जाता रहा है. योग और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के शुरुआती संकेत के रूप में देखा जाता है.
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