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4300 साल पुरानी पशुपति सील पर छिड़ी बहस! संस्कृति मंत्रालय के दावे पर विदेशी इतिहासकार बोला झूठ, भारतीय लेखक ने लगा दी क्लास

4300 साल पुरानी पशुपति सील को लेकर विवाद गहराया गया है. दरअसल संस्कृति मंत्रालय ने इसे आदि-शिव का प्रतीक बताते हुए X पर एक पोस्ट किया. इसके बाद अमेरिकी इतिहासकार ने भारत के दावे को नकारते हुए इसे प्रोटो-एलामाइट बताया. अब इसे लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावे और तर्क सामने आ रहे हैं.

4300 साल पुरानी पशुपति सील पर छिड़ी बहस! संस्कृति मंत्रालय के दावे पर विदेशी इतिहासकार बोला झूठ, भारतीय लेखक ने लगा दी क्लास
संस्कृति मंत्रालय की इस पोस्ट पर छिड़ा विवाद.
X/@MinOfCultureGoI
नई दिल्ली:

मोहनजो-दारो से मिली 4300 साल पुरानी हड़प्पाकालीन ‘पशुपति सील' को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने इसे भारतीय सभ्यता की निरंतरता और आदि-शिव का प्रतीक बताया, जबकि अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के ने इस व्याख्या को चुनौती दे दी है.

क्या है पूरा मामला?

संस्कृति मंत्रालय ने हाल ही में इस प्राचीन सील की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए लिखा कि इसमें योग मुद्रा में बैठी आकृति भगवान शिव के आदि स्वरूप ‘पशुपति' को दर्शाती है. मंत्रालय के मुताबिक यह सिर्फ एक मुहर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की अटूट सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है, जो आज भी योग, मंदिरों और धार्मिक परंपराओं में जीवित है.

ऑड्रे ट्रुश्के का विरोध, ‘यह शिव नहीं'

अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि यह आकृति शिव की नहीं है. उनका तर्क है कि यह संभवतः प्रोटो-एलामाइट सभ्यता की कला शैली से प्रभावित एक 'Lord of Animals” (पशुओं के स्वामी) देवता का चित्रण हो सकता है. उनकी इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई और संस्कृति मंत्रालय की पोस्ट वायरल हो गई.

क्या है प्रोटो-एलामाइट सिद्धांत?

दरअसल प्रोटो-एलामाइट सभ्यता का विकास लगभग 3200–2700 ईसा पूर्व के बीच आज के दक्षिण-पश्चिमी ईरान में हुआ था. इस सभ्यता की कला में पशु आकृतियां, धार्मिक प्रतीक और मिश्रित मानव-पशु चित्रण आम थे. ऑड्रे के मुताबिक, इसी शैली का प्रभाव इस सील में दिखता है.

अमीश त्रिपाठी का पलटवार- ‘क्या योग भी एलामाइट हो गया?'

प्रसिद्ध लेखक अमीश त्रिपाठी ने ऑड्रे के दावे को खारिज करते हुए X पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, 'सील पर हाथी, भैंस और गैंडा जैसे जानवर हैं, जो एलाम (ईरान) में नहीं पाए जाते. ये सभी जानवर भारतीय उपमहाद्वीप के मूल निवासी हैं. आकृति स्पष्ट रूप से योग मुद्रा में बैठी है.' अमीश ने तंज कसते हुए पूछा, 'क्या अब योग भी एलामाइट संस्कृति का हिस्सा हो गया है?'

दूसरे विशेषज्ञ भी विरोध में

प्रोफेसर लावण्या वेमसानी ने भी ऑड्रे ट्रुश्के के दावे को खारिज किया. उन्होंने कहा कि एलामाइट और सिंधु-सरस्वती सभ्यता की सील में जमीन-आसमान का अंतर है और दोनों में 1% भी समानता नहीं है. उनके अनुसार, इस सील में दिख रही मुद्रा ‘मूलबंधासन' है, जो उन्नत योग साधना से जुड़ी है.

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पाकिस्तान से भी उठे सवाल

विवाद में एक और एंगल तब जुड़ गया जब कुछ पाकिस्तानी यूजर्स ने यह सवाल उठाया कि मोहनजो-दारो आज पाकिस्तान में स्थित है, ऐसे में भारत इस विरासत पर दावा कैसे कर सकता है. इस पर संस्कृति मंत्रालय ने कहा कि भले ही स्थल आधुनिक सीमाओं के बाहर हों, लेकिन इस विरासत की सांस्कृतिक निरंतरता भारत में जीवित है.

बहस का असली मुद्दा

गौरतलब है कि यह विवाद सिर्फ एक मुहर की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बड़े सवाल से जुड़ा है कि प्राचीन इतिहास को देखने का नजरिया क्या होना चाहिए. एक पक्ष इसे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता का प्रमाण मानता है. दूसरा पक्ष ठोस पुरातात्विक और तुलनात्मक साक्ष्यों पर आधारित व्याख्या की मांग करता है.

क्यों अहम है ‘पशुपति सील'?

इसे ‘Seal 420/DK-G' के नाम से जाना जाता है. यह सिंधु घाटी सभ्यता की प्रमुख खोजों में शामिल है. दशकों से इसे ‘प्रोटो-शिव' या ‘पशुपति' माना जाता रहा है. योग और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के शुरुआती संकेत के रूप में देखा जाता है.

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