Shankaracharya Jayanti 2026: पंचांग के अनुसार आज वैशाख मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि है, जिसे सनातन परंपरा में आदि शंकराचार्य की जयंती के रूप में जाना जता है. भगवान शिव का अवतार माने जाने वाले आचार्य शंकर बहुत कम उम्र में वेद, पुराण आदि धर्म शास्त्रों का अध्ययन करके सनातनी लोगों को एक सूत्र में जोड़ने का कार्य किया था. आदि शंकराचार्य के द्वारा लिखे गये धर्मग्रंथ और भक्ति स्तोत्र आज भी सनातन परंपरा से जुड़े लोगों को धर्म की सही राह दिखाने का कार्य कर रहे हैं. आइए आदि शंकराचार्य से जुड़ी 7 महत्वपूर्ण बातों के बारे में विस्तार से जानते हैं.
1. आदि शंकर का जन्म 788 ई. में वैशाख मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि पर केरल के कलादी गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम विशिष्ठा देवी था. मान्यता है कि लंबे समय तक नि:संतान रहने वाले इस दंपत्ति ने जब कठिन शिव साधना की तो महादेव ने प्रसन्न होकर उनके घर में जन्म लेने का आशीर्वाद प्रदान किया.
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2. आदि शंकराचार्य ने अपने जीवनकाल में लंबी दूरी की यात्राओं को करते हुए भारत को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया. उन्होंने दक्षिण दिशा में श्रृंगेरी मठ, पूर्व दिशा में गोवर्धन मठ, पश्चिम दिशा में शारदा मठ और उत्तर दिशा में ज्योतिर्मठ को स्थापित किया. आचार्य शंकर से जुड़े ये मठ आज भी सनातनी लोगों को एक सूत्र से जोड़े हुए है.
3. आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित इन्हीं चार पावन पीठों में उनकी परंपरा से जुड़े आचार्य आज भी पीठासीन हैं, जिन्हें सनातनी लोग परम पूज्य शंकराचार्य जी के नाम से संबोधित करते हैं. वर्तमान में पूर्व में गोवर्धन मठ, पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती, दक्षिण में शृंगेरी शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ जी, पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती और उत्तर में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हैं.

4. आदि शंकराचार्य देश के चार कोनों में (पुरी, श्रृंगेरी, द्वारका और जोशीमठ) चार मठों की स्थापना करके न सिर्फ धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से बल्कि भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से एकजुट किया है. आज अलग-अलग भाषा, पहनावे और संस्कृतियों वाले लोग एक सनातन सूत्र से जुड़े हुए इन चारों मठों पर जाकर दर्शन और पूजन करते हैं.
5. आदि शंकराचार्य ने सनातन की रक्षा के लिए अखाड़े बनाए, जिससे जुड़े साधु न सिर्फ धर्म-अध्यात्म का ज्ञान देते हैं, बल्कि सनातन की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने को तैयार रहते हैं. वन, अरण्य, पुरी, आश्रम, भारती, गिरि आदि नाम के नागा साधुओं की टोली को शंकराचार्य की सेना कहा जाता है.
6. आदि शंकराचार्य ने सनातन परंपरा से जुड़े लोगों की आस्था में पनपे मतभेद को दूर करने के लिए 'पंचायतन पूजा' की व्यवस्था दी. पंचायतन पूजा प्रणाली का संबंध स्मार्त संप्रदाय से है, जिसमें पांच देवता (शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश और सूर्य) की एक साथ पूजा की जाती है.
7. आदि शंकराचार्य ने बहुत 32 वर्ष की अल्पायु में पूरे देश का भ्रमण और लोगों को सद्ज्ञान देते हुए अपने जीवन का उद्देश्य पूरा कर लिया था. महज 8 वर्ष की आयु में वेद-पुराण आदि शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने वाले आदि शंकर ने भारत में वैदिक परंपरा को मजबूत करने का काम किया.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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