देश में हर दिन करोड़ों घरों में खाना एलपीजी सिलेंडर से पकता है. लेकिन एलपीजी सुचारू रूप से देश की जनता तक पहुंच सके इसे लेकर भारत विदेश पर निर्भर है. अब पुणे की सीएसआईआर-नेशनल केमिकल लैबोरेटरी में वैज्ञानिक ऐसी देसी तकनीक पर काम कर रहे हैं, जो आने वाले समय में LPG का बड़ा विकल्प बन सकती है. इस नई तकनीक का नाम है डाइमेथाइल ईथर (DME). इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे भारत में मौजूद संसाधनों जैसे कोयला, बायोमास और मेथनॉल से तैयार किया जा सकता है. यानी अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है तो भारत की विदेशी LPG पर निर्भरता काफी कम हो सकती है.
शुरू शुरू में LPG में 20% DME मिलाया जाएगा
प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. टी राजा के मुताबिक DME और LPG के इस्तेमाल में काफी समानता है. इसे आसानी से प्रोपेन और ब्यूटेन के साथ मिलाया जा सकता है और घरेलू गैस या इंडस्ट्रियल फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. अच्छी बात यह है कि शुरुआती चरण में 20 प्रतिशत डीएमई और 80 प्रतिशत एलपीजी के मिश्रण को इस्तेमाल करने की योजना है, जिससे लोगों को अपने मौजूदा गैस चूल्हे या सिलेंडर बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
वैज्ञानिकों का कहना है कि डीएमई सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहेगा. इसका इस्तेमाल एलपीजी से चलने वाले ऑटो रिक्शा के विकल्प के रूप में भी किया जा सकता है. यानी यह तकनीक घरेलू गैस से लेकर ट्रांसपोर्ट तक बड़ा असर डाल सकती है.

20% डीएमई से 63 लाख टन एलपीजी का आयात कम
रिपोर्ट के मुताबिक अगर भारत घरेलू एलपीजी में 20 प्रतिशत डीएमई ब्लेंडिंग शुरू करता है, तो हर साल करीब 63 लाख टन एलपीजी आयात कम हो सकता है.
इससे देश को लगभग 4.04 अरब डॉलर यानी करीब 34,200 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिल सकती है. यह ऐसे समय में बेहद अहम माना जा रहा है जब पश्चिम एशिया में युद्ध और वैश्विक तनावों के कारण LPG सप्लाई और कीमतों पर दबाव बना हुआ है.

कैसे बनाई जाती है डीएमई?
DME को बनाने की प्रक्रिया भी खास है. कोल गैसीफिकेशन तकनीक के जरिए कोयले को सिंथेटिक गैस में बदला जाता है, जिसे आगे DME में परिवर्तित किया जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार DME जलने पर पारंपरिक हाइड्रोकार्बन ईंधन के मुकाबले कम प्रदूषण पैदा करता है, इसलिए इसे क्लीन फ्यूल विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ट्स पहले ही भारत में 20 प्रतिशत DME-LPG ब्लेंडिंग के मानकों को मंजूरी दे चुका है. हालांकि फिलहाल भारत में DME का उत्पादन पायलट स्तर पर ही है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि साफ नीति और निवेश मिलने पर यह सेक्टर तेजी से बढ़ सकता है.
दिलचस्प बात यह भी है कि दुनिया में DME उत्पादन में चीन सबसे आगे है और वैश्विक क्षमता का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा उसके पास है. ऐसे में भारत इस तकनीक के जरिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठाने की कोशिश कर रहा है.
पुणे की लैब में काम कर रहे युवा वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सिर्फ रिसर्च प्रोजेक्ट नहीं बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा मिशन है. उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में DME भारत के लिए वही भूमिका निभा सकता है, जो कभी LPG ने निभाई थी.
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