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असम के भूपेन बोरा ही नहीं, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भी कांग्रेस को अपनों से खतरा

असम, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले कांग्रेस अंदरूनी कलह और सहयोगी दलों से तनाव का सामना कर रही है, जिससे पार्टी की राह मुश्किल होती दिख रही है.

असम के भूपेन बोरा ही नहीं, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भी कांग्रेस को अपनों से खतरा
अंदरूनी कलह से घिरी कांग्रेस, चुनावी राज्यों में बढ़ी मुश्किलें
  • इस साल असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन कांग्रेस की कलह बनी परेशानी
  • असम में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा ने इस्तीफा दिया लेकिन बाद में कांग्रेस नेतृत्व की बात सुनकर मान गए हैं
  • तमिलनाडु में कांग्रेस के नेताओं की बयानबाजी से डीएमके नाराज है, आलाकमान ने मामले की जांच के लिए कमिटी बनाई है
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इसी साल कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं जिसमें असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी है. कांग्रेस इनमें से केरल में बहुत अच्छा करने की उम्मीद कर रही है, तमिलनाडु और पुडुचेरी में डीएमके के साथ उसको लगता है कि उनकी नैया पार हो जाएगी, असम में एक युवा गौरव गोगोई को कमान सौंपी है कि शायद वो कुछ आश्चर्यजनक परिणाम ले आएं जबकि पश्चिम बंगाल में इस बार कांग्रेस एकला चलो रे की नीति अपनाई है, वहां ममता बनर्जी के सामने बीजेपी की लड़ाई है.

असम: भूपेन बोरा का इस्तीफा और सुलह की कोशिश

कांग्रेस में सबसे नई कलह असम में मची हुई है, जहां पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा ने इस्तीफा दे दिया. भूपेन बोरा पिछले तीस सालों से कांग्रेस में हैं और दो बार विधायक भी रह चुके हैं. असम में बोरा की रकिबुल हुसैन नहीं बन रही है जिसकी वजह से उन्होंने इस्तीफा दे दिया, बाद में गौरव गोगोई, कांग्रेस प्रभारी जितेंद्र सिंह और राहुल गांधी के फोन की वजह से फिलहाल मान गए हैं मगर क्या भूपेन बोरा कांग्रेस में बने रहेंगे यह वक्त ही बताएगा क्योंकि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा ने उनके लिए बीजेपी के दरवाजे खोल रखे हैं. प्रियंका गांधी 19–20 फरवरी को असम में रहेंगी, उम्मीद की जानी चाहिए कि कांग्रेस इस संकट से उबर जाएगी.

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तमिलनाडु: डीएमके पर दबाव की बयानबाज़ी से नाराजगी

अब तमिलनाडु की बात करते हैं, वहां पर कांग्रेस के कुछ नेता डीएमके पर दबाव बनाने के लिए पिछले कई दिनों से बयान दे रहे हैं जिसमें बार-बार सत्ता में भागीदारी की बात कही जा रही है. इससे डीएमके नेतृत्व काफी खफा बताया जा रहा है. डीएमके के एक नेता ने कहा कि जब तक कांग्रेस मणिकम टौगोर और प्रवीण चक्रवर्ती के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती, डीएमके नेतृत्व कांग्रेस से बात नहीं करेगी. डीएमके को लगता है कि बिना आलाकमान की मूक सहमति के ये नेता इस तरह की बयानबाजी नहीं कर सकते हैं. इसके बाद तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष के. सेलवापूरनथगई ने कहा कि इन नेताओं की बयानबाजी के पीछे एआईसीसी यानी कांग्रेस नेतृत्व का कोई शह नहीं है और उन्होंने एक कमिटी बना दी है जो डीएमके नेताओं के साथ शुरूआती दौर की बातचीत करेंगे और अंतिम फैसला स्टालिन, मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी करेंगे.

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केरल: सब ठीक-ठाक, पर सीएम रेस बनी हुई

अब केरल की बात करते हैं, वहां सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है, शशि थरूर को भी मना लिया गया है, स्थानीय निकाय चुनाव में भी कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया है मगर अभी भी वहां मुख्यमंत्री के कई दावेदार हैं. हाल में ही शशि थरूर को कांग्रेस आलाकमान ने कैंपेन कमिटी का सह-चेयरमैन नियुक्त किया है जबकि चेयरमैन रमेश चेन्निथला हैं. अब कहा जा रहा है कि इस नियुक्ति के बाद शशि थरूर भी मुख्यमंत्री के रेस में शामिल हो गए हैं. कुल मिलाकर मुख्यमंत्री पद पर उलझन को देखकर कांग्रेस आलाकमान ने कहा है कि कांग्रेस सामूहिक नेतृत्व में लड़ेगा और मुख्यमंत्री का फैसला बाद में होगा.

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पश्चिम बंगाल: नया अध्यक्ष और ‘अकेले लड़ने' की रणनीति

अब बात करते हैं पश्चिम बंगाल का जहां कांग्रेस ने अभी हाल में ही अधीर रंजन चौधरी को हटा कर नया अध्यक्ष बनाया है जिनका नाम है शुभंकर सरकार. अधीर रंजन चौधरी ममता बनर्जी के हमेशा खिलाफ रहे और वामदलों के साथ मिलकर तृणमूल से लड़ते रहे, मगर इस बार कांग्रेस ने तय किया है कि वो पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ेगी. वैसे भी वहां कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, उसके पास एक भी विधायक नहीं है.

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पिछले अनुभव: अंदरूनी कलह का खामियाजा

कहने का मतलब है हर वो राज्य जहां विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, कांग्रेस के अंदर अंदरूनी कलह है. कहीं पार्टी के अंदर तो कहीं सहयोगी दल से. सबको मालूम है कि हरियाणा में भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा की लड़ाई में पार्टी का क्या हुआ. यही हाल छत्तीसगढ़ का रहा जहां भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव एक दूसरे को ही हराने में लगे रहे और राजस्थान में गहलोत और पायलट की जंग तो ऐतिहासिक है, और इस सब का खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा, हर जगह कांग्रेस हार गई.

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