समंदर में नौसेना को अपनी ताकत बढ़ाने के लिये एक नया हथियार मिल गया है जिसे दुश्मन आसानी से देख नही सकता है पर इसके हमले से दुश्मन का बच पाना मुश्किल है.हम बात कर रहे हैं तारागिरी की.इस युद्धपोत को मुंबई के मझगांव डॉकयार्ड ने भारतीय नौसेना को डिलीवरी कर दी.यह नीलगिरी क्लास का अत्याधुनिक चौथा फ्रिगेट है . इस फ्रिगेट को नौसेना के वॉरशिप डिज़ाइन ब्यूरो ने डिज़ाइन किया है .प्रोजेक्ट 17A के तहत मझगांव डॉक शिपबिल्डिंग लिमिटेड ने इसे तैयार किया है.यह उपलब्धि युद्धपोतों के स्वदेशी डिजाइन और निर्माण क्षमता में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

प्रोजेक्ट 17A की फ्रिगेट्स अलग अलग तरह की भूमिका वाली आधुनिक युद्धपोत हैं .6,700 टन वजनी इस युद्धपोत की रफ्तार करीब लगभग 55 किलोमीटर प्रति घंटा है .इसकी लंबाई है 149 मीटर और चौड़ाई 17.8 मीटर है.इनको मौजूदा और भविष्य की समुद्री चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है.यह कहना सही होगा कि प्रोजेक्ट 17A फ्रिगेट्स भारतीय नौसेना की जहाज़ डिजाइन और कॉम्बैट क्षमता में एक पीढ़ीगत प्रगति को दिखाता हैं.तारागिरि अपने पुराने आईएनएस तारागिरी का आधुनिक स्वरूप है,जो एक लीएंडर-क्लास फ्रिगेट थी .

यह 16 मई 1980 से लेकर 27 जून 2013 तक भारतीय नौसेना की शान रही.नई तारागिरि में अत्याधुनिक डिजाइन, बढ़ी हुई स्टेल्थ क्षमता, शक्तिशाली हथियार प्रणालियों, बेहतर ऑटोमेशन लगे है.प्रोजेक्ट P17A फ्रिगेट्स को P 17 (शिवालिक) क्लास की तुलना में आधुनिक हथियार और सेंसर प्रणालियों से लैस किया गया है.
इनमें संयुक्त डीजल या गैस मुख्य प्रणोदन संयंत्रों के साथ कॉन्फ़िगर किया गया है.इसमें एक डीजल इंजन और गैस टरबाइन शामिल है. यह युद्धपोत उन्नत इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम से भी लैस है.इसमें एक से बढ़कर एक खतरनाक हथियार एवं सेंसर पैकेज लगे है.ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल तो है ही.सीधे अर्थों में कहे तो इसमें सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल प्रणाली,मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली,76 मिमी गन और 30 मिमी और 12.7 मिमी रैपिड-फायर क्लोज-इन वेपन सिस्टम की मार से दुश्मन का बच पाना नामुमकिन हैं .

इसके हथियारों के पिटारे में दुश्मन के पनडुब्बी को मार गिराने के लिये रॉकेट और टॉरपीडो शामिल हैं. तारागिरि पिछले 11 महीनों में भारतीय नौसेना को सौंपा गया चौथा प्रोजेक्ट 17A युद्धपोत है.मझगांव डॉकयार्ड को पहले दो जहाजों के निर्माण से मिले अनुभव के वजह से तारागिरी के बनने में महज 81 महीने ही लगे है जबकि इसी क्लास के पहले नीलगिरी को बनने मे 93 महीने लगे थे.यह देश के जहाज बनाने और इंजीनियरिंग की क्षमता को दिखाती है.इसमें 75 फीसदी स्वदेशी उपकरण लगे है .इस परियोजना में 200 से अधिक एमएसएमई की भागीदारी रही.साथ ही देश मे युद्धपोत के बनने से लगभग 4,000 प्रत्यक्ष और 10,000 से अधिक लोगो अप्रत्यक्ष रोजगार मिला .
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