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रेवेन्यू रिकॉर्ड में बदलाव से प्रॉपर्टी का मालिकाना नहीं बदलता: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें रेवेन्यू रिकॉर्ड के आधार पर मालिकाना हक के विवाद का फैसला किया गया था.

रेवेन्यू रिकॉर्ड में बदलाव से प्रॉपर्टी का मालिकाना नहीं बदलता: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सिर्फ रेवेन्यू रिकॉर्ड के आधार पर मालिकाना हक का फैसला नहीं हो सकता. (Photo: NDTV)
  • जस्टिस संजय करोल और जस्टिस मसीह की बेंच ने कहा- म्यूटेशन से न मालिकाना हक बनता है, न खत्म होता है.
  • कोर्ट ने मध्य प्रदेश HC का आदेश रद्द किया, कहा मालिकाना हक का फैसला सिर्फ सिविल कोर्ट कर सकता है.
  • रेवेन्यू एंट्री सही होने की धारणा को सबूतों से गलत साबित किया जा सकता है.
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में प्रॉपर्टी के म्यूटेशन यानी नाम बदलने से मालिकाना हक न तो बनता है और न ही खत्म होता है. कोर्ट ने कहा कि प्रॉपर्टी के मालिकाना हक का फैसला सिर्फ रेवेन्यू रिकॉर्ड के आधार पर नहीं किया जा सकता. इसे दूसरे सबूतों के साथ भी देखा जाना चाहिए. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें रेवेन्यू रिकॉर्ड के आधार पर मालिकाना हक के विवाद का फैसला किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी दूसरे शख्स के पक्ष में रेवेन्यू एंट्री होने की वजह से इमूवेबल प्रॉपर्टी यानी अचल संपत्ति पर अपने अधिकार को स्वेच्छा से छोड़ दिया गया, ऐसा नहीं माना जा सकता. जिस पक्ष का इस पर दावा है, उसे इसे स्वतंत्र रूप से साबित करना होगा.

मालिकाना हक कौन तय कर सकता है?

बेंच ने कहा, "यह स्थापित कानून है कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में कोई एंट्री न तो मालिकाना हक बनाती है और न ही खत्म करती है. यह मुख्य रूप से टैक्स या राजस्व से जुड़े कामों के लिए होती है. नायब तहसीलदार का आदेश रेवेन्यू रिकॉर्ड को तो व्यवस्थित कर सकता है, लेकिन सिर्फ एक शख्स की जगह दूसरे का नाम दर्ज करने से यह मालिकाना हक के ट्रांसफर या उसे छोड़ने का काम नहीं कर सकता. मालिकाना हक तय करने का अधिकार पूरी तरह से सिविल कोर्ट के पास है और रेवेन्यू एंट्री उसी के आधार पर की जाती है."

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अदालत ने अपने आदेश में कहा, "मध्य प्रदेश लैंड रेवेन्यू कोड, 1959 की धारा 117 के तहत रेवेन्यू एंट्री की सही होने की कानूनी धारणा को सबूतों के आधार पर गलत साबित किया जा सकता है. यह मालिकाना हक की पक्की धारणा नहीं है और इसे बाकी सबूतों के साथ ही परखा जाना चाहिए."

कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में प्रॉपर्टी के म्यूटेशन से न तो मालिकाना हक बनता है और न ही खत्म होता है. न ही इसकी कोई कानूनी अहमियत होती हैय यह सिर्फ उस शख्स को संबंधित जमीन का रेवेन्यू चुकाने में सक्षम बनाता है, जिसके पक्ष में म्यूटेशन का आदेश दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिमिटेशन की समय-सीमा की शुरुआत सिर्फ उस तारीख से तय नहीं की जा सकती, जिस दिन रेवेन्यू एंट्री की गई थी.

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