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कायनात की अनसुलझी पहेली को सुलझाने की तैयारी, ब्रह्मांड को 5 प्रतिशत जानता है इंसान, बाकी 95 फीसदी है क्या?

हिग्स बोसॉन (गॉड पार्टिकल) की खोज के एक दशक बाद अब CERN के वैज्ञानिक ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों, डार्क मैटर और डार्क एनर्जी, को समझने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. भारतीय वैज्ञानिक डॉ. अर्चना शर्मा के अनुसार, इंसान अब तक ब्रह्मांड का केवल 5% हिस्सा ही समझ पाया है.

कायनात की अनसुलझी पहेली को सुलझाने की तैयारी, ब्रह्मांड को 5 प्रतिशत जानता है इंसान, बाकी 95 फीसदी है क्या?
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गॉड पार्टिकल के नाम से मशहूर 'हिग्स बोसॉन' की खोज को एक दशक से ज्यादा का वक्त बीत चुका है. अब यूरोपियन सेंटर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (CERN) नाम की दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला के वैज्ञानिक एक और भी बड़ी वैज्ञानिक कामयाबी की ओर कदम बढ़ा रहे हैं. वे डार्क मैटर के असली वजूद को समझने और शायद डार्क एनर्जी पर रोशनी डालने की तैयारी में हैं. ये वही ताकतें हैं जो पूरे ब्रह्मांड का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा बनाती हैं.

इस वैज्ञानिक खोज की अगुवाई दुनिया भर के हजारों वैज्ञानिक कर रहे हैं. इन्हीं में भारत की वरिष्ठ भौतिक विज्ञानी (फिजिसिस्ट) डॉ. अर्चना शर्मा भी शामिल हैं. वह लंबे समय से इस प्रयोगशाला के सबसे अहम प्रयोगों से जुड़ी रही हैं.

एनडीटीवी से बात करते हुए डॉ. शर्मा ने एक कड़वी हकीकत की तरफ इशारा किया. उन्होंने बताया कि विज्ञान की तमाम तरक्कियों के बावजूद, इंसान आज भी इस ब्रह्मांड का सिर्फ एक बेहद छोटा सा हिस्सा ही समझ पाया है.

उन्होंने कहा, "जो कुछ हमें दिखाई देता है, वह महज 5 प्रतिशत है."  इसका सीधा सा मतलब यह है कि लगभग 95 प्रतिशत कायनात अब भी हमारी समझ से बाहर है.  वह कहती हैं, "हम नहीं जानते कि इसमें से कितना हिस्सा डार्क एनर्जी का है और कितना डार्क मैटर का."

क्या है आज के वैज्ञानिकों की चुनौती

आज के वैज्ञानिकों के सामने जो चुनौती है, वह 2012 में हिग्स-बोसॉन की खोज से भी कहीं ज़्यादा बड़ी और पेचीदा है. हिग्स बोसॉन ने तो कण भौतिकी (पार्टिकल फिजिक्स) के पुराने मॉडल को पूरा कर दिया था, लेकिन डार्क मैटर और डार्क एनर्जी इंसान की मौजूदा समझ और साइंस के दायरों से पूरी तरह बाहर हैं.

CERN में ही 'लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर' (LHC) मौजूद है, जो दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ताकतवर पार्टिकल एक्सीलेटर (कण त्वरक) है. यह विशालकाय मशीन स्विट्जरलैंड और फ्रांस की सीमा पर जमीन के नीचे बनी 27 किलोमीटर लंबी एक गोल सुरंग में फैली हुई है. कई देशों के सहयोग और अरबों डॉलर की लागत से बनी यह मशीन कणों को रोशनी की रफ्तार के करीब लाकर आपस में टकराती है. इससे ब्रह्मांड के बनने के ठीक बाद वाले हालात दोबारा पैदा होते हैं.

इस मशीन की सबसे बड़ी कामयाबी 2012 में मिली, जब वैज्ञानिकों ने 'गॉड पार्टिकल' यानी हिग्स बोसॉन की खोज का ऐलान किया. इसने आधुनिक भौतिकी की एक बहुत बड़ी कमी को पूरा किया और इस खोज के लिए सिद्धांत देने वाले वैज्ञानिक पीटर हिग्स और फ्रांस्वा एंग्लर्ट को 2013 में फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार मिला. अब CERN एक नया अध्याय 
शुरू करने जा रहा है.

क्या तैयारी चल रही है? 

LHC को अब और बड़ा रूप दिया जा रहा है, ताकि यह 'हाई ल्यूमिनेसिटी लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर' (HL-LHC) बन सके. इस अपग्रेडेड मशीन से कणों की टक्करों की तादाद बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगी, जिससे वैज्ञानिकों को पहले से कहीं ज़्यादा डेटा मिल सकेगा.

डॉ. शर्मा ने बताया कि यह बदलाव बड़े पैमाने पर हो रहा है. उन्होंने कहा, "हम अपनी मशीन को अपडेट कर रहे हैं, अपने डिटेक्टर्स को बेहतर बना रहे हैं और अपने सॉफ्टवेयर को सुधार रहे हैं, ताकि हम आने वाले वक़्त का सामना कर सकें."

अर्चना शर्मा कहतीं हैं,  "अब यह मशीन पहले के मुकाबले 10 गुना ज़्यादा टकराने की दर देख पाएगी. इसका मतलब यह हुआ कि जो डेटा इकट्ठा करने में हमें पहले 10 साल लगते थे, वह अब सिर्फ एक साल में मिल जाएगा."

डेटा का यह बड़ा ढेर इसलिए बहुत जरूरी है क्योंकि अगर इन टक्करों से डार्क मैटर के कण बनते भी हैं, तो उनके संकेत इतने दुर्लभ और बारीक होंगे कि उन्हें पहचानना बहुत मुश्किल होगा.

डार्क मैटर खुद में आज भी विज्ञान का सबसे बड़ा राज बना हुआ है. खगोलशास्त्री इसे सीधे तौर पर नहीं देख पाते, क्योंकि यह न तो रोशनी छोड़ता है, न सोखता है और न ही रोशनी को वापस मोड़ता है. इसके बावजूद, पूरी कायनात में इसका गुरुत्वाकर्षण का असर साफ दिखाई देता है.

वैज्ञानिक जानते हैं कि कोई न कोई अनदेखी चीज जरूर मौजूद है, क्योंकि गैलेक्सी यानी आकाशगंगा उससे कहीं ज़्यादा तेजी से घूमती हैं जितना कि सिर्फ दिखाई देने वाले पदार्थों से घूमना चाहिए. 

बड़े-बड़े गैलेक्सी क्लस्टर्स में भी इतना ज्यादा खिंचाव होता है कि उसे सिर्फ तारों, ग्रहों और गैसों के दम पर नहीं समझाया जा सकता. ब्रह्मांड के विकास से जुड़े तमाम अध्ययन भी इसी नतीजे की पुष्टि करते हैं कि किसी न किसी अनदेखे पदार्थ का वजूद जरूर है.

आसान भाषा में समझिए 

इसे समझाने के लिए डॉ. शर्मा ने एक बहुत आसान सी मिसाल दी. अगर मेज के नीचे कोई चुंबक छुपा दिया जाए, तो मेज के ऊपर रखी लोहे की चीजें अजीब तरह से हिलने-डुलने लगेंगी. भले ही आप चुंबक को देख न सकें, लेकिन उसके असर से आप अंदाजा लगा लेते हैं कि नीचे चुंबक मौजूद है. ठीक इसी तरह, वैज्ञानिक भी गुरुत्वाकर्षण के असर और गैलेक्सी के व्यवहार को देखकर डार्क मैटर की मौजूदगी का अंदाजा लगाते हैं.

डार्क एनर्जी तो और भी ज्यादा रहस्यमयी है. माना जाता है कि ब्रह्मांड का जो तेजी से फैलाव हो रहा है और गैलेक्सी एक-दूसरे से दूर भाग रही हैं, उसके पीछे यही ताकत काम कर रही है.  हालांकि यह पूरे ब्रह्मांड का सबसे बड़ा हिस्सा है, फिर भी वैज्ञानिक आज तक यह नहीं जान पाए हैं कि यह असल में है क्या.

अपग्रेड हुई यह कोलाइडर मशीन शायद सीधे तौर पर डार्क एनर्जी को न खोज पाए, लेकिन यह ऐसे नए कणों या भौतिकी के नए नियमों का पता लगा सकती है जो सही जवाब तक पहुंचने का रास्ता दिखाएं.

CERN के शोधकर्ताओं को पहले ही कुछ दिलचस्प सुराग मिलने लगे हैं. डॉ. शर्मा के मुताबिक, हाल के प्रयोगों में भारी क्वार्क्स (Quarks) से बने कुछ अनोखे संयुक्त कणों की पहचान की गई है. इनमें क्वार्क्स के ऐसे अनोखे जोड़े शामिल हैं जो पदार्थों के बनने की प्रक्रिया को लेकर हमारी समझ को और गहरा करते हैं.

हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि ये नए देखे गए कण डार्क मैटर नहीं हैं. उन्होंने समझाया, "अगर डार्क मैटर आम 'मैटर' कणों से बना होता, तो बात अलग थी. लेकिन हम जानते हैं कि डार्क मैटर इन आम कणों से नहीं बना है और जो हमने देखा है, वे आम मैटर कण ही हैं. इसलिए बाहर कोई और ही नस्ल या किस्म मौजूद है जिसे हम नहीं समझते और शायद हाई ल्यूमिनेसिटी LHC के जरिए हमें उसके कुछ सुराग मिल सकें."

इसी उम्मीद ने भर दिया जोश

यही उम्मीद दुनिया भर के वैज्ञानिकों में नया उत्साह भर रही है. डार्क मैटर की खोज ब्रह्मांड को लेकर इंसान की समझ को पूरी तरह बदल कर रख देगी. यह उस अनदेही चीज के असली रूप को सामने लाएगी जो आम पदार्थों से कहीं ज्यादा भारी है और पूरे ब्रह्मांड के ढांचे को संभाले हुए है. 

ऐसी खोज इतिहास की सबसे महान वैज्ञानिक कामयाबियों में शुमार होगी. डॉ. शर्मा CERN के उस दौर का हिस्सा रही हैं जिसने 'गॉड पार्टिकल' दिया. वह मानती हैं कि अब यह खोज और भी गहरी और अनजान राहों पर निकल पड़ी है. उन्होंने कहा, "हम बहुत ही कम जानते हैं. ब्रह्मांड क्या है, इसका सिर्फ कुछ प्रतिशत हिस्सा ही हमारी समझ में आया है."

जैसे ही अपग्रेडेड कोलाइडर अपने अगले दौर के लिए तैयार हो रहा है, वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जिस मशीन ने 'गॉड पार्टिकल' का पर्दाफाश किया था, वह अब ब्रह्मांड के उस विशाल और छिपे हुए हिस्से को भी रोशन कर पाएगी जो अब तक इंसान की पहुंच से दूर रहा है. 

आधुनिक भौतिकी की सबसे बड़ी मंजिल अब वह 5 प्रतिशत हिस्सा नहीं है जिसे हम जानते हैं, बल्कि असली मंज़िल वह रहस्यमयी 95 प्रतिशत हिस्सा है जो आज भी अंधेरे में छुपा हुआ है.

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