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Explainer: जनगणना के कुछ सवालों पर क्यों उठ रहे हैं निजता के सवाल

जनगणना 2027 में पहली बार ऐसे कई सवाल शामिल किए गए हैं जो सिर्फ आबादी और सामाजिक-आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं दिखते. 40 सवालों में आधार से लेकर बैंक खातों तक की संख्या मांगी जा रही है. आखिर सरकार को इतना डेटा क्यों चाहिए और निजता की सुरक्षा कैसे होगी?

Explainer: जनगणना के कुछ सवालों पर क्यों उठ रहे हैं निजता के सवाल
जनगणना फरवरी 2027 के अंत तक समाप्त हो जाना है
ANI
  • जनगणना में ऐसे कुछ सवाल शामिल किए गए हैं जो केवल आबादी, लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं हैं.
  • जनगणना का मतलब ये होता है कि देश की आबादी कैसी है और उसे किन सुविधाओं और नीतियों की जरूरत है.
  • लेकिन कई डॉक्युमेंट्स के डिटेल लेने से उनकी डेटा सुरक्षा और संभावित इस्तेमाल पर चिंता जताई जा रही है.

2027 की जनगणना में पहली बार कई ऐसे सवाल शामिल किए गए हैं जो सिर्फ आबादी और सामाजिक-आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं दिखते. 40 सवालों में राष्ट्रीयता के साथ बैंक खातों की संख्या, मोबाइल नंबर, आधार, वोटर आईडी, पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस जैसी जानकारी भी मांगी जा रही है. सवाल यह है कि नीति बनाने के लिए जरूरी डेटा और नागरिकों की व्यक्तिगत पहचान संबंधी जानकारी के बीच सीमा कहां तय होगी.

जनगणना के सवालों पर विवाद क्यों?

भारत की जनगणना में उम्र, लिंग, शिक्षा, रोजगार, वैवाहिक स्थिति, भाषा, धर्म, प्रवास और रहने की स्थिति जैसी जानकारियां जुटाई जाती रही हैं.

इसका मकसद सरकार को यह समझने में मदद करना है कि देश की आबादी कैसी है और उसे किन सुविधाओं और नीतियों की जरूरत है. लेकिन 2027 की जनगणना में कुछ ऐसे सवाल जोड़े गए हैं, जिन्होंने इस पूरी कवायद को लेकर नई बहस छेड़ दी है.

मसलन, नए सवालों में बैंक खातों की संख्या, मोबाइल नंबर, आधार नंबर, वोटर आईडी, पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस जैसी जानकारी शामिल है. 

भारत में डिजिटल अधिकारों की वकालत करने वाली इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के मुताबिक ये सवाल हाउसहोल्ड शेड्यूल के आखिरी हिस्से में रखे गए हैं.

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क्या जनगणना में पहचान संख्या लेना जरूरी है?

आलोचकों का कहना है कि अगर सरकार को यह जानना है कि किसी इलाके में कितने लोग रहते हैं, उनकी उम्र क्या है, वे क्या काम करते हैं, कितने पढ़े-लिखे हैं या कितने लोग रोजगार की तलाश में हैं, तो इसके लिए हर व्यक्ति का आधार या वोटर आईडी नंबर जानना जरूरी क्यों है?

सवाल ये हैं कि इन व्यक्तिगत डेटा की जरूरत जनगणना में क्यों है?

किसी जिले में कितने लोगों के पास बैंक खाता है, यह जानना एक सामाजिक-आर्थिक संकेतक हो सकता है. लेकिन खातों की संख्या पूछना भी एक अलग तरह की जानकारी है.

इसी तरह मोबाइल नंबर, आधार और वोटर आईडी, पासपोर्ट नंबर, ड्राइविंग लाइसेंस की उपलब्धता जैसी जानकारी व्यक्ति की पहचान से सीधे जुड़ती है.

इसलिए आलोचना यह है कि जनगणना और पहचान के सत्यापन के बीच की सीमा धुंधली हो सकती है. मतलब सीधा है कि जब इन सभी डॉक्युमेंट्स के नंबर आपस में लिंक्ड हैं तो डेटा ट्रायंगुलेशन यानी सुरक्षा और गोपनीयता के मोर्चे पर कई बड़े जोखिम खड़े हो सकते हैं.

अगर आपके डेटा लीक हो जाते हैं तो इन डेटाबेस के आधार पर बड़ी आसानी से आपके 360 डिग्री प्रोफाइल की जानकारी फिंगर टिप्स पर मौजूद होगी.

अगर ये हैकर के हाथ लग गया तो वो आपके पूरी जिंदगी की प्रोफाइल तैयार कर सकता है. आपके बारे में वो सभी जानकारियां जो आप रोजमर्रा की जिंदगी में करते हैं, उसका पूरा ब्योरा उसके हाथों में होगा और इसका इस्तेमाल वित्तीय धोखाधड़ी से लेकर विभिन्न कार्यों में किया जा सकता है.

सरकार की तरफ से क्या तर्क हो सकता है?

यह भी समझना जरूरी है कि सवाल पूछे जाने का मतलब अपने-आप यह नहीं है कि सरकार उन दस्तावेजों का पूरा डेटा या बैंक खाते की रकम मांग रही है.

मसलन, उपलब्ध जानकारी के अनुसार बैंक खातों को लेकर सवाल कुल संख्या से संबंधित है, जबकि आधार और मोबाइल जैसी जानकारी के साथ "अगर मौजूद हैं" जैसी शर्तें भी दी गई हैं.

इसका मतलब यह भी हो सकता है कि सरकार नागरिकों की सामाजिक और डिजिटल पहुंच की तस्वीर ज्यादा विस्तार से समझना चाहती है.

लेकिन असली चिंता यहां खत्म नहीं होती. तो असली मुद्दा क्या है?

असली मुद्दा है डेटा का इस्तेमाल

जनगणना से जुटाई गई जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इसे किस काम में इस्तेमाल किया जाएगा, कौन इसे देख सकता है और इसे कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा?

इसमें पारदर्शिता बेहद जरूरी हो जाती है. अगर जनगणना का डेटा केवल सांख्यिकी, नीति और योजना बनाने के लिए इस्तेमाल होना है, तो सरकार को साफ तौर पर बताना होगा कि व्यक्तिगत पहचान से जुड़ी जानकारी की सुरक्षा कैसे होगी.

कौन-सा डेटा अनाम किया जाएगा?

क्या आधार या वोटर आईडी जैसी जानकारी को दूसरे सरकारी डेटाबेस से जोड़ा जा सकता है? क्या किसी नागरिक के जनगणना रिकॉर्ड को उसके जनकल्याण के लाभ, बैंकिंग, मतदान या नागरिकता से जुड़े फैसलों में इस्तेमाल किया जा सकता है? इन सवालों के स्पष्ट जवाब जरूरी हैं.

आलोचकों की चिंता यह है कि जो डेटा लिए जा रहे हैं वो इस जनगणना को नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर के करीब ला रहे हैं.

जनगणना और एनपीआर में फर्क भी समझना होगा

जनगणना का मुख्य उद्देश्य देश की आबादी और उसके सामाजिक-आर्थिक स्वरूप की तस्वीर तैयार करना है. वहीं नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर का उद्देश्य देश में सामान्य तौर पर रहने वाले लोगों की पहचान का एक डेटाबेस तैयार करना है.

एनपीआर के दायरे में मोबाइल नंबर, आधार नंबर, वोटर आईडी और पासपोर्ट नंबर जैसी जानकारी भी रही हैं.

हालांकि केवल कुछ जानकारियों (वो भी वैकल्पिक) के मांगे जाने पर जनगणना और एनपीआर एक ही चीज नहीं बन जाते हैं. लेकिन डेटा के संभावित इस्तेमाल और आपसी लिंकिंग को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.

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Photo Credit: PTI

पिछली जनगणना की तुलना में क्या बदला?

2027 की जनगणना में 40 सवाल रखे गए हैं. 2011 की तुलना में इसमें 13 नए सवाल जोड़े गए हैं. इनमें परिवार और व्यक्ति की पहचान, राष्ट्रीयता, प्रवास और सामाजिक-आर्थिक जानकारी के अलावा डिजिटल और दस्तावेज संबंधी जानकारी भी शामिल हैं. 

बेशक यह जनगणना कई मायनों में पहले की तुलना में अधिक विस्तृत है, जो कि इसकी ताकत भी है तो सबसे बड़ी चुनौती भी.

क्योंकि अधिक डेटा लेने का मतलब सरकार के पास देश की वास्तविक तस्वीर समझने के लिए ज्यादा जानकारी होगी. लेकिन ज्यादा व्यक्तिगत डेटा का मतलब गोपनीयता और डेटा सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होगी.

फिलहाल सरकार की ओर से यह जानकारी नहीं दी गई है कि आखिर इन मांगे गए नए डेटा का वह क्या उपयोग करना चाहती है. हालांकि यह भी माना जा रहा है कि जो नए सवाल जोड़े गए हैं, वो भारत जैसे डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए सामान्य बात है क्योंकि बैंकिंग, मोबाइल कनेक्टिविटी, डिजिटल साक्षरता और सरकारी पहचान की मौजूदा व्यवस्था अब आम लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुकी है. 

तो इनसे जुड़ी जानकारियां भविष्य की नीति बनाने के लिहाज से उपयोगी हो सकती हैं. ऐसे में अगर किसी जोड़े गए नए सवाल से बेहतर स्कूल, अस्पताल, रोजगार, आवास, परिवहन या कल्याणकारी योजनाओं को बनाने में मदद मिलती है, तो निश्चित रूप से यह उद्देश्य सराहनीय है.

लेकिन अगर सरकार केवल व्यक्तिगत पहचान जानना चाहती है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि आखिर वो इस डेटा की सुरक्षा कैसे करेगी.

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