रामायण के पात्र जटायु के बलिदान से शायद ही कोई अनजान हो.माता सीता की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने वाले उस वीर पक्षी की तरह, आज वास्तविक जीवन में भी गिद्ध प्रकृति चक्र की एक बेहद अनमोल कड़ी हैं!
कुछ दशक पहले तक गांव की सीमा के बाहर मृत मवेशियों को एक निश्चित स्थान पर छोड़ा जाता था. जहां गिद्धों का जमावड़ा आम बात थी. आकाश में मंडराते गिद्धों में से एक के नीचे उतरते ही बाकी भी पीछे हो लेते थे. सबसे पहले लाल सिर वाला गिद्ध अपनी नुकीली चोंच से मवेशी का कड़ा चमड़ा फाड़ता था, यह काम सफेद पीठ वाले गिद्ध और भारतीय गिद्ध सीधे नहीं कर पाते थे. इसके बाद भूखे गिद्धों के झुंड टूट पड़ते और देखते ही देखते हड्डियों के ढाँचे के सिवाय कुछ शेष नहीं रहता था.
क्या खाते और पचाते हैं गिद्ध
गिद्धों का पाचन तंत्र इतना शक्तिशाली होता है कि वे सड़े-गले मांस को आसानी से हजम कर लेते हैं. वहीं, उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का दाढ़ी वाला गिद्ध मुख्य रूप से हड्डियां खाता है. उन्हें तोड़ने के लिए ऊंचाइयों से नीचे गिराता है. यह साबित करता है कि प्रकृति में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता. इसी स्वच्छता व्यवस्था के कारण, पारसी समुदाय की पारंपरिक 'दखमा-नशीनी' प्रथा में मृतकों के शवों को 'टावर ऑफ साइलेंस' पर गिद्धों के लिए रखा जाता है, जो उनके ज़ोरोस्ट्रियन धर्म का अहम हिस्सा है.
प्रकृति ने हर जीव को विशिष्ट जिम्मेदारी सौंपी है. गिद्धों का काम पर्यावरण को स्वस्थ रखना है. मृत जीवों के शवों को तीव्र गति से साफ करने वाले ये प्रकृति के सबसे कुशल सफाईकर्मी हैं. इनके इस कार्य से पर्यावरण स्वच्छ रहता है और सड़ते शवों से फैलने वाली बदबू, एंथ्रेक्स, कोलेरा और रेबीज जैसी घातक बीमारियों का प्रसार रुक जाता है.

पशुओं को दिए जाने वाले डिक्लोफेना नाम के एक पेन किलर की वजह से गिद्धों का अस्तित्व खतरे में आ गया.
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खेतों में बैलों से अधिक काम लेने की लालसा में उन पर दर्द निवारक दवा डिक्लोफेनाक का अंधाधुंध इस्तेमाल किया गया. मृत पशुओं के मांस के जरिए यह दवा गिद्धों के शरीर में पहुंचकर जानलेवा साबित हुई. इससे उनकी किडनी फेल होने लगी. साल 1992 से 2007 के बीच कई प्रजातियों में 99 फीसद तक की भारी गिरावट दर्ज की गई. इससे वे विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए.
खतरे में क्यों हैं गिद्ध
भारत की नौ में से अधिकांश गिद्ध प्रजातियां मानवीय हस्तक्षेप और इस दवा के कारण खतरे में हैं. इसके गंभीर परिणाम सामने आए हैं. गिद्धों की कमी से मृत पशुओं के शव खुले में पड़े रहने लगे. इससे आवारा कुत्तों की संख्या में वृद्धि हुई. इससे रेबीज और अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ गया.
इस संकट ने पारसी समुदाय की पारंपरिक 'दखमा-नशीनी' प्रथा को भी बुरी तरह प्रभावित किया है.इससे निपटने के लिए अब सौर ऊर्जा के उपयोग और गिद्ध संरक्षण पर विशेष जोर दिया जा रहा है.
इसलिए अब समय आ गया है कि हम गिद्धों के प्रति अपनी नकारात्मक धारणाओं को बदलें. पर्यावरण संतुलन और जीवन की रक्षा करने वाले ये मूक पक्षी 'मृत्यु के प्रतीक' नहीं, बल्कि हमारे सच्चे मित्र हैं. इनका संरक्षण करना हमारा नैतिक दायित्व है.
(डिस्क्लेमर: लेखक महाराष्ट्र के पुणे में रहने वाले एक पक्षी विज्ञानी और अलाइव चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रमुख हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)