Burger King success story: 20 तारीख. जंतर-मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन जारी था. दिल्ली पुलिस छात्रों को संसद की तरफ जाने से रोकने के लिए बल प्रयोग कर रही थी. कुछ घंटे बाद एक वीडियो वायरल होता है, जिसमें CJP प्रवक्ता विजेता दहिया को बर्गर किंग के आउटलेट पर दिखाई देता है.वीडियो देखकर सवाल उठने लगे कि जब छात्र डंडे खा रहे थे तब विजेता दहिया बर्गर खा रहा था. इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी ने विजेता को प्रवक्ता पद से हटा दिया. ऐसे में लोगों का ध्यान बर्गर किंग पर गया. आखिर ये बर्गर किंग की शुरुआत कैसे हुई.
जब बात 'बर्गर किंग' की हो, तो उसके मशहूर 'व्हॉपर' (Whopper) का जिक्र तो लाजमी है. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि आग पर सेंक कर बनाया गया यह 'व्हॉपर' असल में बर्गर किंग का अपना आइडिया था ही नहीं. एक फ्रेंचाइजी ओनर ने इस धांसू आइडिया को एक खस्ताहाल और गंदे रेस्त्रां से चुराया था. तो चलिए आपको बताते हैं कि कैसे महज 11 डॉलर से शुरू होकर, एक कंपनी अरबों डॉलर का ग्लोबल ब्रांड बन गई.
$11 और सड़क पर आने की दर्दनाक शुरुआत
फ्लोरिडा का जैक्सनविले. कीथ क्रेमर और उसके रिश्तेदार मैथ्यू बर्न्स ने जब मैकडॉनल्ड्स का तेज-तर्रार काम देखा, तो उनके होश उड़ गए. ग्राहक ऑर्डर कर रहे थे और मिनटों में खाना हाजिर. उन्होंने भी इसी स्पीड को टक्कर देने की ठानी. साल 1953 में फ्लोरिडा में उन्होंने एक खास 'इंस्टा ब्रॉयलर' मशीन खरीदी और 'इंस्टा बर्गर किंग' की नींव रखी. 'इंस्टा ब्रॉयलर' मशीन की खासियत यह थी कि यह एक साथ 12 बर्गर पैटीज सेंक सकती थी. इससे ग्राहकों को मिनटों में गरमा-गरम बर्गर मिलने लगा. सिर्फ 18 सेंट में बर्गर और शेक. जनता दीवानी हो गई. जल्द ही मियामी में इसकी फ्रेंचाइजी खुली, इसे जेम्स मैकलमोर और डेविड एडगर्टन के हाथों में थी. ये दोनों नाम याद रखिएगा आगे ये दोनों इस कंपनी की किस्मत बदलने वाले हैं.

फाउंडर से नहीं संभली कंपनी, दिवालिया होने की नौबत
1954 तक आते-आते कीथ क्रेमर और मैथ्यू बर्न्स पूरी तरह दिवालिया हो गए. इस संकट में अपने फ्रेंचाइजी पार्टनर जेम्स मैकलमोर और डेविड एडगर्टन को कंपनी कौड़ियों के दाम पर बेच दी.
जेम्स और डेविड- बर्गर किंग के असली गॉडफादर
फ्रेंचाइजी पार्टनर जेम्स मैकलमोर और डेविड एडगर्टन. जिन्होंने फास्ट-फूड की दुनिया का इतिहास ही बदल कर रख दिया. बर्गर किंग की कहानी के बीच पहले हम आपको जेम्स की कहानी सुनाते हैं. उनकी कहानी किसी फिल्मी ट्रेजेडी से कम नहीं है. 1929 की भयानक आर्थिक मंदी ने उनके परिवार को सड़क पर ला दिया था. पिता की नौकरी चली गई. मां सदमे में पागलखाने पहुंच गईं, जहां से वो कभी लौटकर नहीं आईं. जिस पुश्तैनी खेत पर उन्होंने पनाह ली, वो भी आग में जलकर खाक हो गया. जेम्स की दादी ने घर का सामान और अपने गहने बेचकर जेम्स को बोर्डिंग स्कूल भेजा.
जब जेम्स कॉलेज पहुंचे, तो उनकी जेब में सिर्फ 11 डॉलर थे. रहने का कोई ठिकाना नहीं. उन्होंने एक प्रोफेसर के घर झाड़ू-पोछा और बर्तन मांजने के बदले वहां पनाह ली. इसके बाद उन्होंने फौज में काम किया, शादी की और पेट पालने के लिए कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं. एक जगह से तो उन्हें निकाल भी दिया गया था. जेम्स ने मियामी में अपना एक रेस्टोरेंट भी खोला, लेकिन वो भी बुरी तरह फ्लॉप रहा.
'इंस्टा-बर्गर किंग' से 'बर्गर किंग' का सफर
नाकामी के इसी दौर में जेम्स की मुलाकात डेविड से हुई. दोनों ने मिलकर 'इंस्टा-बर्गर किंग' नाम की एक कंपनी की फ्रेंचाइजी ले ली. लेकिन ये धंधा भी चौपट हो रहा था. इनकी बर्गर बनाने वाली मशीन 'इंस्टा ब्रॉयलर' आए दिन धोखा दे जाती थीं. एक दिन गुस्से में आकर पार्टनर डेविड ने अपनी ही मशीन को कुल्हाड़ी से चकनाचूर कर दिया. फिर एक इंजीनियर के साथ मिलकर खुद का एक 'फ्लेम ब्रॉइलर' (आग पर सीधे सेंकने वाली मशीन) का आविष्कार किया.

James McLamore
लेकिन मुसीबतें कम नहीं थीं, पैसे खत्म हो रहे थे. एक दिन मायूस होकर जेम्स सड़क पर टहल रहे थे कि तभी उनकी नजर एक टूटे-फूटे, गंदे से रेस्टोरेंट पर पड़ी, जिसके बाहर ग्राहकों की लंबी लाइन लगी थी. उन्होंने देखा कि वहां एक बहुत बड़े साइज का बर्गर बिक रहा है, जिसमें ढेर सारी सब्जियां और सॉस डली हैं.
जेम्स और डेविड का दिमाग ठनका. उन्होंने हूबहू वैसा ही बड़ा बर्गर बनाया और उसे नाम दिया- 'द व्हॉपर' (The Whopper). इस 'व्हॉपर' ने मार्केट में आग लगा दी. यह इतना सुपरहिट हुआ कि उन्होंने अपने ब्रांड के नाम से 'इंस्टा' शब्द हटा दिया और जन्म हुआ- 'बर्गर किंग' का.

कॉर्पोरेट बिसात और अरबों का साम्राज्य
इसके बाद शुरू हुआ कॉर्पोरेट दुनिया का असली खेल- बड़ी मछलियों का छोटी मछलियों को निगलना. जब बर्गर किंग एक बड़ा नाम बन गया, तो इसे 'पिल्सबरी' (Pillsbury) नाम की एक दिग्गज कंपनी ने खरीद लिया. डेविड इस कॉर्पोरेट माहौल से ऊब कर चले गए, लेकिन जेम्स जमे रहे. पिल्सबरी ने इसके बाद अपने सबसे बड़े दुश्मन 'मैकडॉनल्ड्स' से उनके एक तेज-तर्रार अफसर को तोड़कर बर्गर किंग में शामिल किया, जिसने कंपनी को नई रणनीतियां दीं. आने वाले दशकों में, बर्गर किंग किसी पार्सल की तरह कई बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों (जैसे Grand Metropolitan, Diageo, Texas Pacific Group, और 3G Capital) के हाथों से गुजरा.

कभी इसका बिजनेस गिरा, तो कभी चढ़ा. लेकिन कहते हैं न, जिसकी नींव मजबूत हो, वो इमारत जल्दी ढहती नहीं है. जेम्स और डेविड ने 'व्हॉपर' के जरिए जो मजबूत नींव रखी थी, उसने हमेशा कंपनी को बचाए रखा. बाद में मशहूर कनाडाई ब्रांड 'टिम हॉर्टन्स' के साथ मिलकर बर्गर किंग ने वापसी की और आज यह अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी बर्गर चेन है.
मैकडॉनल्ड्स के ग्राहकों को तोड़ा
बर्गर किंग ने पहले से स्थापित मैकडॉनल्ड्स को चोट देने के लिए कई रणनीतियां बनाईं. मसलन, अमेरिका में बर्गर किंग के 7000 आउटलेट थे, वहीं मैकडोनल्ड्स के 14000. तभी बर्गर किंग ने जियोफेंसिंग मार्केटिंग शुरू की. जैसे ही कोई शख्स मैकडॉनल्ड्स आउटलेट के आधा किलोमीटर घूम रहा हो तो बर्गर किंग उसे नॉटिफिकेशन भेज देता कि 1 सेंट बर्गर और नजदीक आउटलेट की लोकेशन. 1 सेंट में बर्गर के चक्कर में ग्राहक आउटलेट से और भी सामान ले जाते. इस स्ट्रैटजी से बर्गर किंग छा गया. इस स्ट्रैटजी में बर्गर किंग ने $1 खर्च करके $37 कमाया. लाखों करोड़ों इनएक्टिव यूजर्स को एक्टिव यूजर्स में कन्वर्ट किया. आज बर्गर किंग 100 से ज्यादा देशों में फैला एक अरबों डॉलर का साम्राज्य है.
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