- ब्रिक्स समिट भारत में चौथी बार हो रहा है और इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पहली बार भारत आएंगे
- ब्रिक्स की स्थापना 2001 में हुई थी और 2009 में इसका पहला औपचारिक समिट आयोजित किया गया था
- ब्रिक्स सदस्य देशों की संख्या बढ़कर ग्यारह हो गई है जिनमें कई मुस्लिम देश भी शामिल हो गए हैं
ब्रिक्स समिट का चौथी बार भारत में आयोजन हो रहा है. इस बार का समिट खास है क्योंकि 2020 में चीन के साथ तनाव के बाद पहली बार शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं. इसके अलावा गैर-पश्चिम एजेंडा के लिहाज से भी यह समिट महत्वपूर्ण है. यदि वैश्विक संघर्षों को समाप्त करते हुए दुनिया की अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाई जाए तो यह बेहतर होगा. 2001 में ब्रिक्स जैसे किसी संगठन की कल्पना की गई थी, जब गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने इन देशों को उभरती अर्थव्यवस्था बताया था. उनका विचार यह था कि इन देशों में निवेश को आमंत्रित किया जा सके. इसी लिहाज से उन्होंने दुनिया के सामने ब्रिक्स का फॉर्मूला पेश किया था. फिर इस संगठन ने औपचारिक रूप लिया और 2009 में पहले समिट का आयोजन हुआ. अब ब्रिक्स की उम्र 18 साल पूरी हो गई है. ऐसे में सवाल है कि क्या ब्रिक्स अब बड़ा हो गया है और जिम्मेदारियों के लिए तैयार है?
कुछ मामलों में ऐसा लगता है. खासतौर पर जब दुनिया में अर्थव्यवस्था अस्थिरता के दौर से गुजर रही है. तब दुनिया की बड़ी इकॉनमीज का समिट होना मायने रखता है. इस संगठन का भूराजनीतिक महत्व भी काफी ज्यादा है. इस बार की समिट में कुल 350 बैठकें होनी हैं और उसके परिणाम की एक सूची तैयार की जाएगी. इससे पहले ब्राजील के रियो में ब्रिक्स का आयोजन हुआ था, जिसमें 126 पैरा का बयान जारी हुआ था. उसमें ट्रेड, क्लाइमेट, टेक्नोलॉजी, ग्लोबल गवर्नेंस समेत कई मामलों पर बात हुई थी. अब देखना होगा कि इस बार किन प्रस्तावों पर चर्चा होती है और किन मामलों पर आम सहमति बनती है.
पिछले कुछ सालों में ब्रिक्स का विस्तार भी तेजी से हुआ है. शुरुआती दिनों में 5 देश ही इसका हिस्सा थे- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और द. अफ्रीका. फिर मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और यूएई भी इसमें आ गए. इनमें से इथियोपिया को छोड़ दें तो सभी मुस्लिम देश हैं. इस तरह कभी पश्चिम के एजेंडे के काउंटर के तौर पर विकसित हुए ब्रिक्स का स्वभाव अब बदल रहा है. नए शामिल हुए देशों में से कोई भी ऐसा नहीं है, जो अमेरिकी एजेंडे के खिलाफ जाए या फिर निकट भविष्य में पश्चिम के खिलाफ जाएगा. इस तरह ब्रिक्स के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं. आइए जानते हैं, ब्रिक्स के सामने कौन सी चुनौतियां हैं...
- चीन इस समूह में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है. वह चाहेगा कि ब्रिक्स एक कॉमन करेंसी की बात भी करे, लेकिन दूसरे देशों को शायद यह सही न लगे.
- भारत और चीन के बीच की प्रतिद्वंद्विता ऐतिहासिक है. दोनों के रिश्ते ज्यादातर समय असामान्य ही रहे हैं. इस बार के समिट में दोनों की भागीदारी रणनीतिक है. ऐसे समय में जब अमेरिका ने दोनों पर भारी टैरिफ थोपे हैं. ब्रिक्स की सफलता भी दोनों देशों के संबंध कैसे हैं, इस बात पर निर्भर करती है.
- इस समिट में कुल 11 देश हैं और सबके अपने हित हैं. रियो में जिस तरह से 126 पैरा का प्रस्ताव आया था, उससे साफ था कि मतभेद कायम हैं और अंत में किसी तरह से साझा बयान जारी हुआ था.
- अब तक ब्रिक्स की कोई ऐसी करेंसी नहीं है, जो डॉलर का विकल्प बन सके. किसी देश की इस पर सहमति भी नहीं मिलती दिख रही.
- ब्रिक्स की एक समस्या यह है कि अब तक किसी मसले पर इसने कोई ठोस लाइन नहीं ली है. इसका कोई सचिवालय नहीं है. इसका कोई इंचार्ज नहीं है. इसके अलावा डॉलर का विकल्प खोजना एक अहम मुद्दा रहा है, लेकिन कभी इस पर आम सहमति नहीं बन सकी. इसके लिए कौन सी करेंसी एंकर के रूप में इस्तेमाल की जाए. इस पर भी बात नहीं हुई है.
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अब ब्रिक्स यदि 18 साल का हो गया है तो फिर उसे एक वयस्क जैसा ही व्यवहार करना चाहिए. इसका एक मुख्यालय होना चाहिए. एक ऐसे शहर में कुछ तैयार होना चाहिए, जिससे कहा जा सके कि यह ब्रिक्स का दफ्तर वाली सिटी है. इसके अलावा एक महासचिव भी जरूरी है. सामान्य बैठकें करना आसान है, लेकिन कुछ मसलों पर चर्चा हो और फैसले किए जाएं. यह भी जरूरी है. अजय बिसारिया लिखते हैं कि इस मामले में भारत नेतृत्व कर सकता है, जो संस्थापक सदस्य है. दिल्ली में ही ब्रिक्स का मुख्यालय बन सकता है. इसके अलावा पहला महासचिव भी यहीं से हो सकता है. इससे पहले तक प्रस्ताव ही आते रहे हैं, लेकिन कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है. इस तरह ब्रिक्स को किस तरह से एकता वाला संगठन कहा जाए. यही नहीं सऊदी अरब जैसे पश्चिम देशों से अच्छे रिश्ते रखने वाले मित्रों को एंट्री देना भी एक चैलेंज ही है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि वे अमेरिका की कीमत पर ब्रिक्स में ऐसा कोई एजेंडा नहीं लाना चाहेंगे, ऐसा इसलिए क्योंकि उनके हित अमेरिका के साथ जुड़े हैं.
(लेखक: अजय बिसारिया, सीनियर रिसर्च फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन)
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