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निकाय चुनाव के बाद BJP-कांग्रेस का मंथन, हार के कारणों की तलाश, पंचायत चुनाव से पहले कमियां ढूंढ रही पार्टी

राजस्थान निकाय चुनाव में बड़ी जीत के बावजूद बीजेपी उन सीटों की समीक्षा कर रही है जहां बागियों, निर्दलीयों, क्रॉस वोटिंग और स्थानीय गुटबाजी से उसका गणित बिगड़ा. वहीं कांग्रेस टिकट वितरण, संगठनात्मक कमजोर की वजहों की पड़ताल कर रही है.

निकाय चुनाव के बाद BJP-कांग्रेस का मंथन, हार के कारणों की तलाश, पंचायत चुनाव से पहले कमियां ढूंढ रही पार्टी
फाइल फोटो
PTI

राजस्थान में निकाय चुनाव के नतीजों के बाद अब बीजेपी और कांग्रेस दोनों हार की कड़ियां तलाश रही हैं. दरअसल, बीजेपी बड़ी जीत के बावजूद उन जगहों का हिसाब लगा रही है जहां बागियों, निर्दलीयों और स्थानीय खींचतान ने पार्टी का गणित बिगाड़ा. वहीं कांग्रेस यह देख रही है कि टिकट से लेकर संगठन और नेताओं के तालमेल तक आखिर कहां चूक हुई.

असल में दोनों दलों की यह कवायद सिर्फ निकाय चुनाव तक सीमित नहीं है अगली चुनौती पंचायत चुनाव की है और उससे पहले संगठन की कमजोर कड़ियां जोड़ने की कोशिश शुरू हो गई है.

बीजेपी की जीत के बाद अब उन जगहों पर नजर, जहां पार्टी चूकी

बीजेपी ने 309 निकायों के चुनाव में करीब 200 निकायों में जीत हासिल की है. इसके बावजूद पार्टी संगठन अब उन जगहों की पड़ताल कर रहा है जहां जीत का माहौल होने के बावजूद पार्टी बोर्ड बनाने में कामयाब नहीं हो सकी या जहां चुनावी प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहा.

असल में भाजपा की समीक्षा का फोकस सिर्फ हार-जीत के आंकड़े पर नहीं है. पार्टी यह देख रही है कि टिकट वितरण के दौरान कहां नाराजगी हुई किन जगहों पर बागी उम्मीदवार मैदान में उतरे और उनका असर कितना रहा.इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल कैसा रहा.

निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका भी भाजपा के लिए अहम है. निकाय चुनाव में बड़ी संख्या में निर्दलीय पार्षद जीते हैं. अब पार्टी यह पता लगाने में जुटी है कि इनमें कितने ऐसे उम्मीदवार थे जो भाजपा से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय मैदान में उतरे थे या जिनका पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव था.

यानी भाजपा के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि निर्दलीयों ने कितनी सीटें जीतीं बल्कि यह भी है कि उन्होंने पार्टी के वोट में कितनी सेंध लगाई और किन निकायों में उनके कारण पूरा चुनावी समीकरण बदल गया.

मुंडवा का मामला भाजपा के लिए बड़ा सवाल

मसलन, नागौर की मुंडवा नगरपालिका का मामला भाजपा की समीक्षा में अहम है. यहां भाजपा के 10 पार्षद जीतकर आए लेकिन अध्यक्ष के चुनाव में भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार को एक भी वोट नहीं मिला.

दूसरी तरफ कांग्रेस और आरएलपी समर्थित उम्मीदवार बोर्ड बनाने में कामयाब रहा. चुनाव के दौरान भाजपा से बगावत कर निर्दलीय मैदान में उतरे घनश्याम सादावत की भूमिका भी चर्चा में रही. भाजपा के कुछ पार्षदों के उनके साथ जाने की बात सामने आई. 

ऐसे में पार्टी अब यह समझने की कोशिश कर रही है कि आखिर संगठन और निर्वाचित पार्षदों के बीच ऐसा अंतर क्यों पैदा हुआ कि 10 पार्षद होने के बावजूद पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार एक वोट तक नहीं जुटा पाया. मुंडवा जैसे मामले भाजपा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां मामला सिर्फ एक सीट हारने का नहीं है. यह संगठन उम्मीदवार और निर्वाचित पार्षदों के बीच तालमेल से जुड़ा सवाल बन गया है. 

भाजपा की समीक्षा में बागी उम्मीदवारों और भीतरघात को भी देखा जा रहा है. पार्टी यह देख रही है कि किन नेताओं या कार्यकर्ताओं ने अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ काम किया. पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी कहां सामने आई और टिकट वितरण के बाद पार्टी संगठन उसे संभालने में कितना सफल रहा. कई जगह ऐसा भी हुआ कि भाजपा के पास पार्षदों की संख्या ठीक थी लेकिन अध्यक्ष या सभापति के चुनाव के समय राजनीतिक समीकरण बदल गए. कुछ जगह निर्दलीय पार्षद निर्णायक बन गए तो कहीं क्रॉस वोटिंग की स्थिति सामने आई. 

ऐसे मामलों में अब निकायवार रिपोर्ट तैयार की जा रही है. वार्डवार वोटों का अंतर, बूथ पर पार्टी का प्रदर्शन, मजबूत माने जाने वाले वार्डों में वोट कम होने की वजह और स्थानीय नेताओं की भूमिका को भी देखा जा रहा है.

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा है कि पार्टी पूरे निकाय चुनाव की समीक्षा कर रही है और खास तौर पर उन जगहों पर ध्यान दिया जा रहा है जहां भाजपा अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी. बीकानेर मुंडवा और तिजारा जैसे निकाय भी इस समीक्षा के दायरे में हैं.

कांग्रेस में भी शुरू हुआ हार का हिसाब

उधर कांग्रेस में भी निकाय चुनाव के नतीजों को लेकर मंथन शुरू हो गया है. कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने जयपुर में प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व के साथ चुनाव परिणाम और संगठन की स्थिति पर चर्चा की. बैठक में निकाय चुनाव के प्रदर्शन के साथ आगामी पंचायतीराज चुनाव की तैयारियों पर भी फीडबैक लिया गया. कांग्रेस की समीक्षा में टिकट वितरण से लेकर उम्मीदवार चयन तक कई मुद्दे शामिल हैं. 

पार्टी यह भी देख रही है कि स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल कहां कमजोर रहा और चुनाव के दौरान उम्मीदवारों को संगठन का कितना समर्थन मिला. असल में कांग्रेस के सामने एक बड़ा सवाल उन निकायों का है जहां उसके पार्षदों की संख्या अच्छी रही लेकिन बोर्ड बनाने के लिए जरूरी राजनीतिक समीकरण नहीं बन पाए. 

यानी चुनाव के दौरान मिली जीत को बोर्ड की सत्ता में बदलने में पार्टी कहां पीछे रह गई इसकी भी समीक्षा हो रही है. अजमेर में कांग्रेस के 37 पार्षद जीते लेकिन बहुमत के लिए जरूरी संख्या नहीं जुट सकी. ऐसे में निर्दलीय पार्षदों से तालमेल और चुनाव के बाद बने राजनीतिक समीकरण भी कांग्रेस की समीक्षा का हिस्सा हैं. पाली में भी चुनाव के बाद बने समीकरणों को लेकर कांग्रेस ने रिपोर्ट मांगी है. 

रिपोर्ट तैयार करेगी कांग्रेस कमिटी

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कोऑर्डिनेटर और जिला प्रभारियों से जानकारी ली जा रही है. जरूरत पड़ने पर स्थानीय स्तर पर कमेटियां भेजकर भी रिपोर्ट तैयार की जाएगी. कांग्रेस यह देख रही है कि टिकट वितरण में कहां गलती हुई, किन जगहों पर स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद रहे और कहां संगठन की पूरी ताकत उम्मीदवार के पीछे नहीं लग सकी. 

रिपोर्ट तैयार होने में करीब पांच से छह दिन लगने की संभावना है. इसके बाद प्रदेश कांग्रेस कमेटी के स्तर पर इसका विश्लेषण किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर रिपोर्ट एआईसीसी को भी भेजी जा सकती है.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने निकाय चुनाव को लेकर प्रशासनिक तंत्र के कथित इस्तेमाल और निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ कार्रवाई के आरोप लगाए हैं. कांग्रेस का कहना है कि इन मुद्दों को लेकर पार्टी विस्तृत प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगी. 

स्थानीय स्तर पर तालमेल कैसे बने?

पार्टी की ओर से राज्यपाल, राज्य निर्वाचन आयुक्त, डीजीपी और मुख्य सचिव को ज्ञापन देने की तैयारी भी बताई गई है. ये कांग्रेस के आरोप हैं और पार्टी इन्हें चुनावी समीक्षा में शामिल कर रही है.

दरअसल, निकाय चुनाव के नतीजों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अलग-अलग सवाल खड़े किए हैं. भाजपा के सामने चुनौती यह है कि बड़ी चुनावी जीत के बावजूद जिन जगहों पर संगठन कमजोर रहा वहां की कमियों को कैसे दूर किया जाए. 

बागियों और निर्दलीयों के कारण बिगड़े समीकरणों को कैसे रोका जाए और स्थानीय स्तर पर संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच बेहतर तालमेल कैसे बनाया जाए.

यही वजह है कि दोनों दलों की नजर अब पंचायत चुनाव पर है. निकाय चुनाव की यह समीक्षा आने वाले चुनाव के लिए सिर्फ आंकड़ों की रिपोर्ट नहीं होगी. बूथ से लेकर वार्ड और निकाय स्तर तक जो कमियां सामने आएंगी उसी के आधार पर संगठन को दुरुस्त करने और अगली चुनावी रणनीति तैयार करने की कोशिश होगी.

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