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This Article is From Nov 06, 2025

बिहार में वोट, किसे करेगा चोट? चुनावी पंडितों से समझिए क्या है टर्निंग प्वाइंट

बिहार चुनाव में इस बार क्या बड़ा मुद्दा है, चुनावी पंडितों के बीच इसको लेकर अलग-अलग राय है. पलायन, प्रशांत किशोर, नीतीश कुमार का नेतृत्व, युवा तेजस्वी यादव या लोकलुभावन वादे... जनता आखिर किस पर दांव लगा रही है.

बिहार में वोट, किसे करेगा चोट? चुनावी पंडितों से समझिए क्या है टर्निंग प्वाइंट
Bihar Election
नई दिल्ली:

बिहार में क्या बदलाव की बयार है या 20 सालों से बेमिसाल नीतीश का जलवा बरकरार रहेगा. बिहार चुनाव में पहले चरण के मतदान के बीच राजनीतिक गलियारे में चर्चा तेज है कि आखिर इस बार टर्निंग प्वाइंट क्या है. एनडीटीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ राहुल कंवल ने भी पूर्णिया में चुनावी पंडितों के साथ ऐसे ही मुद्दों पर चर्चा की. इसमें नीतीश कुमार का नेतृत्व, महागठबंधन का चेहरा तेजस्वी के प्रण, मुफ्त के चुनावी वादे, प्रशांत किशोर और प्रवासियों का फैक्टर कितना कारगर रहा है, इस पर चुनावी विश्लेषकों ने अपनी बात रखी.

प्रशांत किशोर क्या असर दिखा पाएंगे
पूर्णिया में चुनावी पंडितों से चर्चा के बीच एनडीटीवी कंसल्टिंग एडिटर अजीत जा ने प्रशांत किशोर पर कहा कि जन सुराज नेता ने कुछ गलतियां कीं. उन्होंने कहा, राघोपुर से लड़ूंगा, दो जगह से लड़ूंगा. सब जानते हैं कि 2015 में लालू-नीतीश को वो साथ लाए और अब रोज अटैक उन पर करते हैं. हां उनका एजेंडे का इंपैक्ट है. वो द्विध्रुवीय को त्रिध्रुवीय मुकाबला बनाने की कोशिश कर रहे हैं. युवा वोटर -खासकर प्रवासी आकर्षित हो रहे हैं. हालांकि कैंपेन ज्यादातर सोशल मीडिया पर है, ग्राउंड पर असर देखना होगा. वो 10 फीसदी वोट हासिल कर पाएं तो कुछ सीटें मिलेंगी, ज्यादा वोट मिलें तो बड़ा असर हो सकता है, लेकिन वो किसका वोट काटेंगे, ये देखने वाली बात होगी. अर्थशास्त्री डॉ. सुरजीत भल्ला ने कहा, वो शायद अगले इलेक्शन के लिए लड़ रहे हैं. इस चुनाव में उन्हें अच्छा अनुभव हो जाएगा. जनता ऐसा नहीं सोचेगी कि तुम हार गए हो आप खत्म हो गए. इकोनॉमिस्ट डॉ. नीरज कौशल ने कहा, वो सोशल मीडिया से और कद बढ़ाना चाहते हैं. नीतीश युग के बाद प्रशांत किशोर की क्या जगह होगी, ये अभी कोई कुछ नहीं कह सकता है.

नीतीश कुमार की शख्सियत कितनी अहम
एनडीटीवी के कंसल्टिंग एडिटर अजीत झा और इकोनॉमिस्ट नीरज कौशल ने परिचर्चा में कहा कि नीतीश जब से सत्ता में आए तो उन्होंने क्राइम रेट नीचे लाने में काफी मेहनत की. लोग कहते हैं कि जिस प्रशांत किशोर को वो घर में रखते थे और आज ये उन्हीं को गाली देता है. नीतीश ने बीजेपी और राजद दोनों से अलग एक राजनीतिक संतुलन बनाकर रखा है. वो बीजेपी की कम्यूनल पॉलिटिक्स से दूर हैं. साथ ही उनका प्रयास राजद की जातिगत जकड़न से दूर हर वर्ग के बीच पैठ बनाने का रहा है. नीतीश कुमार को लेकर सहानुभूति अभी भी है. डा. नीरज कौशल ने कहा कि जाति से परे जाकर महिलाओं में अपनी पैठ बनाई है.

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क्या बिहार में सत्ता विरोधी लहर?
चुनाव पंडितों का कहना है कि बिहार में एंटी इनकंबेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर जैसा कुछ नहीं दिखता. रेवड़ी की बात न करते बीजेपी और जेडीयू ने भी उसी फैक्टर को चुनाव के पहले आखिरी कुछ महीनों में हथियार बनाया. बिहार में 10 हजार रुपये की स्कीम भी रेवड़ी ही है. रोड, इलेक्ट्रिसिटी और एजुकेशन की जगह ये मुद्दे हावी हैं. फ्री बिजली, सरकारी नौकरी पर बढ़-चढ़कर दावे हो रहे हैं. महिलाओं को पिछले कुछ महीनों में बड़ी सौगातें मिली हैं, नीतीश को जातिगत दायरे से परे जाकर सभी वर्ग की महिलाओं को लुभाया है.

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एकजुट NDA बनाम इकलौते तेजस्वी!
चुनाव विश्लेषक संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि महागठबंधन इस बार एकजुट चेहरा नहीं पेश कर सका. जबकि मोदी और नीतीश कुमार की जुगलबंदी हर जगह साफ दिखी. पोस्टर-बैनर से लेकर रैलियों में ये साफ दिखता है. एनडीटीवी कंसल्टिंग एडीटर अजीत झा का कहना है कि वोटर अधिकार यात्रा के दौरान राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, वीआईपी नेता मुकेश सहनी और लेफ्ट के दीपांकर भट्टाचार्य साथ दिखे थे. लेकिन उसके बाद सीटों के बंटवारे को लेकर जो तल्खी पैदा हुई कि सब अलग-थलग हो गए. राहुल गांधी लंबी विदेश यात्रा के बाद लौटे, लेकिन महागठबंधन के बड़े नेता एक साथ ही कम ही दिखे. तेजस्वी अकेले दम पर चुनाव प्रचार के मैदान में डटे रहे हैं. महागठबंधन में फूट से विपक्ष ने 12 सीट सीधे-सीधे एनडीए को दे दी हैं.

वन मैन आर्मी तेजस्वी यादव
वोट वाइब के फाउंडर अमिताभ तिवारी ने कहा कि जिस तरह से जन सुराज ने तीन साल में प्रचार किया, जमीन पर दिखाई दिए, लेकिन तेजस्वी पिछले कुछ महीने से एक्टिव दिखे. जबकि अगस्त सितंबर से एनडीए में सब कुछ क्लियर दिखा. नीतीश मोदी और सम्राट चौधरी पोस्टर में दिखे. तेजस्वी यादव सियासी परिवार से आते हैं. उन्हें बहुत सी चीजें विरासत में मिली हैं. जो बदलाव की भूख प्रशांत किशोर में दिखी, उसका मुकाबला नहीं है. मुख्यमंत्री पद का चेहरा बने तेजस्वी वन मैन आर्मी की तरह मोर्चा संभाले हुए हैं. महागठबंधन में एकमात्र चेहरा तेजस्वी जातिगत समीकरण साधे हुए हैं.

बिहार में क्या जाति ही सब कुछ?
कंसल्टिंग एडीटर अजीत झा ने कहा कि नीतीश का स्वास्थ्य मुद्दा नहीं है. कोई भी खानदान या वंशवादी राजनीति के बारे में बात नहीं कर रहा है. पोलिंग बूथ के पहले वोटरों को अपनी जाति और गोत्र याद आ जाता है. कुर्मी सिर्फ 2.49 फीसदी हैं, लेकिन नीतीश सर्वमान्य नेता बनकर उभरे हैं. कायस्थ होकर भी जेपी नारायण का व्यापक प्रभाव देखा गया. ओल्डर वर्सेस न्यू जनरेशन और मेल वर्सेस फीमेल का फैक्टर इस बार देखा जा रहा है. हालांकि इससे इतर अमिताभ तिवारी ने कहा कि 105 सीटें ऐसी हैं, जहां एक ही जाति के उम्मीदवार पिछली तीन बार से चुनाव जीते हैं. जबकि 113 सीटों पर दो बार से ऐसा ट्रेंड है.

पलायन कितना बड़ा मुद्दा
इकोनॉमिस्ट एंड जर्नलिस्ट डॉ. नीरज कौशल का कहना है कि पलायन के पीछे रोजगार की कमी एक वजह है. लेकिन बिहार लौट रहे प्रवासी अपने साथ नई ऊर्जा, काम की नई संस्कृति भी साथ लाते हैं. पलायन को सिर्फ नकारात्मक रुख से नहीं देखा जा सकता. अमिताभ तिवारी ने कहा कि प्रवासियों में जन सुराज पार्टी की चर्चा है. लोग आप वापस लौटते हैं तो उन्हीं चीजों को अपने राज्य में करना चाहते हैं. वो केवल एकमात्र ऐसी पार्टी है, जो लगभग सभी सीटों पर लड़ रही है. चुनावी पंडितों का मानना है कि सोशल मीडिया प्रचार में वो नंबर वन है.

प्रवासियों में प्रशांत किशोर की बात है. पानीपत जैसे इलाकों से आ रहे प्रवासियों में ओवैसी और तेजस्वी का भी समर्थन दिखा. सीनियर जर्नलिस्ट संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि जमीनी स्तर पर उतना नहीं है. जितना डिजिटल मीडिया पर दिख रहा है. सुरजीत भल्ला ने कहा कि जन सुराज को 10 सीटें तक आ सकती हैं, लेकिन देखना होगा कि क्या वो लंबा गेम खेलेंगे. चुनावी रणनीतिकार की जगह अब वो नेता हैं. वो खुद लड़ रहे हैं. लेकिन उनकी खुद एक पार्टी, वन मैन पार्टी न बन जाए, ये ध्यान रखना होगा. केजरीवाल इसका उदाहरण है, जो भी ऐसी पार्टी चाहते थे, लेकिन व

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