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बाबा चमलियाल मेला: इस बार भी नहीं पहुंचेगे पाक रेंजर, 9वीं बार नहीं बंटेगी 'शक्कर' और 'शर्बत'

भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव के कारण यह परंपरा पिछले कई वर्षों से बंद है. इस बार भी लगातार नौवीं बार न तो पाक रेंजर्स चादर लेकर आएंगे और न ही भारतीय पक्ष की ओर से शक्कर और शर्बत सीमा पार भेजा जाएगा.

बाबा चमलियाल मेला: इस बार भी नहीं पहुंचेगे पाक रेंजर, 9वीं बार नहीं बंटेगी 'शक्कर' और 'शर्बत'
नई दिल्ली:

आज जम्मू के रामगढ़ सेक्टर में लगने वाला ऐतिहासिक बाबा चमलियाल मेला इस बार भी भारत और पाकिस्तान के बीच वर्षों पुरानी एक खास परंपरा के बिना आयोजित होगा. यह लगातार नौवीं बार पाकिस्तान के लोगों तक 'शक्कर' और 'शर्बत' नहीं पहुंच पाएगा. सीमा पर स्थित चमलियाल चौकी में हर साल बाबा चमलियाल का मेला लगता है. पहले इस मौके पर पाकिस्तान रेंजर्स भी कार्यक्रम में शामिल होते थे. वे बाबा की दरगाह पर चादर चढ़ाते थे. लेकिन इस बार भी ऐसा नहीं होगा. भारतीय सुरक्षा बलों ने पाक रेंजर्स को मेले में शामिल होने का निमंत्रण नहीं दिया है. ऐसे में दोनों देशों के बीच होने वाला पारंपरिक आदान-प्रदान भी नहीं हो सकेगा.

क्या है बाबा चमलियाल की मान्यता

जीरो लाइन के पास स्थित यह दरगाह बाबा दिलीप सिंह मन्हास की समाधि मानी जाती है. स्थानीय लोगों के बीच बाबा को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं. कहा जाता है कि उनके एक शिष्य को चर्म रोग हो गया था. बाबा ने उसे यहां के एक विशेष कुएं का पानी और मिट्टी लगाने को कहा. इससे वह ठीक हो गया. इसके बाद बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई. लोगों का मानना है कि इसी वजह से आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और बाबा से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.

मेले की सबसे खास परंपरा

बाबा चमलियाल मेले की सबसे बड़ी पहचान 'शक्कर' और 'शर्बत' है. पहले मेले के दिन भारतीय सुरक्षा बल ट्रॉलियों और टैंकरों के जरिए यह प्रसाद पाकिस्तान भेजते थे. वहां हजारों श्रद्धालुओं में इसे बांटा जाता था. पाकिस्तान के सियालकोट और आसपास के इलाकों से लोग बड़ी संख्या में इस प्रसाद को लेने पहुंचते थे. उनका विश्वास है कि इससे रोगों और परेशानियों से राहत मिलती है.

नौ साल से टूटी हुई है परंपरा

भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव के कारण यह परंपरा पिछले कई वर्षों से बंद है. इस बार भी लगातार नौवीं बार न तो पाक रेंजर्स चादर लेकर आएंगे और न ही भारतीय पक्ष की ओर से शक्कर और शर्बत सीमा पार भेजा जाएगा. इससे दोनों देशों के श्रद्धालुओं को निराशा हुई है. खासकर पाकिस्तान के उन लोगों को, जो हर साल इस प्रसाद का इंतजार करते थे.

विभाजन के बाद बदली मेले की तस्वीर

बुजुर्गों के मुताबिक भारत-पाक विभाजन से पहले यह मेला पूरे इलाके का बड़ा धार्मिक आयोजन हुआ करता था. दोनों तरफ के गांवों और शहरों से लोग बड़ी संख्या में यहां पहुंचते थे. दोनों देशों के बीच बंटवारा  होने बाद मेले की रौनक धीरे-धीरे कम हो गई. हालांकि श्रद्धालुओं की आस्था आज भी कायम है. पहले मेले के सातों दिन भारी भीड़ रहती थी. अब आमतौर पर आखिरी तीन या चार दिनों में ज्यादा श्रद्धालु पहुंचते हैं.

लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद

इस साल भी मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है. सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं. हालांकि सीमा पार शक्कर और शर्बत भेजने की परंपरा नहीं निभाई जाएगी, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था और बाबा चमलियाल के प्रति विश्वास पहले की तरह बना हुआ है. यही वजह है कि हर साल हजारों-लाखों लोग यहां पहुंचकर बाबा के दरबार में माथा टेकते हैं और अपने परिवार की खुशहाली की दुआ मांगते हैं.
 

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