अब से ढाई दशक पहले मुंबई से सटे ठाणे में एक ऐसा शख्स रहता था जो गुस्ताखी करने वालों की खाल अपने हंटर से उधेडता था. उसे न कानून की परवाह थी और न ही पुलिस का डर. आज से 23 साल पहले 26 अगस्त 2001 को जब उसकी मौत हुई तो उसके कार्यकर्ताओं ने पूरे अस्पताल को आग लगा दी, तमाम वाहनों को फूंक दिया, पत्रकारों की पिटाई की और पुलिस को भी निशाना बनाया. ये शख्स थे आनंद दिघे – शिव सेना के अध्यक्ष और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के राजनीतिक गुरु. बतौर पत्रकार मैने दिघे की मृत्यु की खबर को ब्रेक किया था और उसके बाद ठाणे शहर का जो हाल हुआ वो देखा.
बाल ठाकरे भी नहीं काटते थे उनका फैसला
आनंद दिघे वैसे तो शिव सेना के ठाणे जिला के प्रमुख थे लेकिन पार्टी में उनका रसूख बहुत बडा था. पार्टी के शुरुआती दिनों से संस्थापक बाल ठाकरे के साथ थे और ठाणे सहित मुंबई के आसपास शिव सेना के पैर जमाने में उन्होंने बडी भूमिका अदा की थी. भले ही वे बाल ठाकरे को अपना नेता मानते थे लेकिन ठाणे में उनका रुतबा ठाकरे से भी बडा समझा जाता था. दिघे ने खुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा लेकिन उनकी इमेज किंगमेकर की थी. कहते हैं कि दिघे जिसके सिर पर हाथ रख देते उसकी किस्मत पलट जाती. उन्होने एक पार्षद प्रकाश परांजपे को सांसद बनवा दिया, एक मंदिर के पुजारी और महानगरपालिका के सफाई कर्मचारी को अचानक पार्षद का टिकट दिलवा दिया. उनके फैसले को ठाकरे भी नहीं काटते थे.
जेल भी गए दिघे
दिघे पार्टी से गद्दारी करने वालों से या गलती करने वालों से बेरहमी से निपटते थे. उन्हें सजा देने के लिये वे अपने दफ्तर में हंटर रखा करते थे जिससे सभी खौफ खाते. एक बार ठाणे मेयर चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले पार्षद की हत्या हो गई. उस आरोप में दिघे को गिरफ्तार किया गया. हालांकि दिघे उस मामले से छूट गये लेकिन उनके समर्थक उन्हें धर्मवीर कहकर बुलाने लगे क्योंकि उनका मानना था कि दिघे एक अधर्मी को सजा देने के लिये जेल जाने को तैयार हुए.
जब शिंदे को दिघे ने दिखाया रास्ता
एकनाथ शिंदे को भी राजनीति में पूरी तरह सक्रिय कराने वाले दिघे ही थे. अस्सी के दशक में सातारा के एक तालाब में अपने दो छोटे बच्चों की डूबने से मौत के बाद शिंदे अवसाद में चले गये थे. उस वक्त दिघे उनसे मिलने आए और उन्हें हिम्मत देकर फिर से अपनी जिंदगी शुरू करने के लिये प्रेरित किया.
26 अगस्त 2001 का दिन रविवार था. रात करीब 10 बजे उस वक्त जिस न्यूज चैनल में मैं बतौर पत्रकार काम करता था वहां से अपना काम खत्म करके घर लौटने की तैयारी कर रहा था. तभी ठाणे से एक फोटो पत्रकार दोस्त का फोन आया कि आनंद दिघे की हार्ट अटैक से मौत हो गई है. हफ्तेभर पहले ही दिघे एक कार एक्सीडैंट में घायल होने के कारण ठाणे के सुनीतिदेवी सिंघानिया अस्पताल में भर्ती हुए थे. खबर बहुत बडी थी. इसकी पृष्टि के लिए मैने शिव सेना नेता शिशिर शिंदे को फोन किया. उनकी ओर से तस्दीक किये जाने के बाद मैंने तुरंत फोनो देकर अपने न्यूज चैनल पर खबर ब्रेक कर दी. इसके बाद अपनी मोटरसाइकिल पर कैमरा लेकर ठाणे की ओर निकला. रास्ते में कैमरामैन राजू इनामदार को भी उसके घर से साथ ले लिया.
ऑटो चालक का लिया इंटरव्यू
ठाणे शहर के मुहाने पर पहुंचने पर नजर आया कि शिव सैनिक हर तरफ तांडव मचा रहे थे. मुंबई-आगरा हाइवे उन्होने बंद कर रखा था और ट्रकों और ऑटोरिक्शा के साथ तोड़फोड़ कर रहे थे. मैने वहीं एक पुलिस चौकी के पीछे अपनी मोटरसाइकिल छुपा दी. उस जगह से सिंघानिया अस्पताल करीब 5 किलोमीटर के फासले पर था. हमने पैदल ही ये फासला तय करते हुए अस्पताल तक पहुंचने का फैसला किया. उग्र शिव सैनिकों की नजर बचाते हुए हमने तोड़फोड़ की तस्वीरें लीं. हमें एक रोता हुए ऑटोरिक्शा चालक मिला जिसके ऑटो को शिव सैनिकों ने जला दिया था. मैने उसे एक किनारे ले जाकर उसका इंटरव्यू किया.
भीड़ ने बस को आग के हवाले किया
इस तरह छुपते छुपाते हम हाइवे के उस कैडबरी चौराहे तक पहुंच गये जहां से सिंघानिया अस्पताल बेहद करीब था. इस बीच हमें ठाणे से दूसरे पत्रकार दोस्तों के आगाह करने के लिये फोन आने लगे कि वहां हालात काफी खराब हो चुके हैं. इस शक पर कि डॉक्टरों ने दिघे के इलाज में कोताही बरती, शिव सैनिकों ने पूरे अस्पताल को ही जला दिया. जब स्थानीय पत्रकार वहां रिपोर्टिंग करने पहुंचे तो उनको भी बुरी तरह पीटा गया और उनके वाहन फूंक दिये गए. कुछ लोगों ने मुझे वापस लौट जाने की सलाह दी. मैने अपने ब्यूरो चीफ को पूरी जानकारी दे दी. उनकी सलाह पर मैने कैमरे से टेप निकाल कर अपनी जेब में रख लिया और दूसरी टेप कैमरे में डाल दी. ऐसे हालात में आगे बढना है या नहीं इस बारे में मैं सोच ही रहा था कि सामने शिव सैनिकों की भीड़ आ गई. जिसने एक बस को आग के हवाले कर दिया.
भीड़ मुझपर और कैमरामैन पर हमला कर दिया
कैमरामैन राजू इनामदार एक होर्डिंग की आड में छुपकर उस आगजनी के शॉट्स लेने लगा. इस बीच एक दंगाई की नजर उस पर पड़ गई और उसने अपने साथियों के साथ राजू को घसीट कर बाहर निकाला और डंडों से उसकी पिटाई करने लगे. मैं राजू को बचाने के लिये गया तो मुझपर भी हमला कर दिया. दंगाइयों ने राजू के हाथ से कैमरा छीनकर उसे जलती हुई बस में डाल दिया और हम पर लात, घूंसे और डंडे बरसाते रहे. ये सारा कुछ सुनीतिदेवी सिंघानिया स्कूल के गेट के सामने हो रहा था. मुझसे ज्यादा प्रहार राजू पर हो रहा था. अचानक राजू अचेत होकर गिर पडा. मुझे लगा कि शायद वो मर गया है. मैं भी उसके बगल में आंख बंद करके लेट गया.
दीवार कूदकर भागे
दंगाइयों को लगा कि दोनो मर गये हैं और हमें पीटना बंद करके वे आगे बढ गए. कुछ मिनट बाद मुझे किसी ने हिलाया. “चल जल्दी भागते हैं यहां से”- ये राजू इनामदार की आवाज थी. राजू को जिंदा पाकर जो खुशी महसूस हुई उसे बयां नहीं कर सकता. शिव सैनिकों की पिटाई से वो लहूलुहान हो चुका था लेकिन उसने सूझबूझ दिखाते हुए मरने का नाटक किया जिससे पिटाई रुक गई. इसके बाद हम स्कूल का गेट फांदकर स्कूल के मैदान में पहुंच गये और बड़ी देर तक वहीं ऊंची उग आयी घास में छुपे रहे. जब लगा कि दंगाई शिव सैनिक वहां से चले गए हैं तो हम हाइवे से सटी एक दीवार से कूदकर बाहर निकले.
उद्धव की शिवसेना में हैं दिघे के भांजे
हम पैदल चलकर फिरसे ठाणे शहर के मुहाने पर उस पुलिस चौकी पर जाने लगे जहां मैने अपनी मोटरसाइकिल छुपाई थी. रास्ते में हमें शैलेश मुले और विजयानंद गुप्ता नाम के दो फोटोपत्रकार मिल मिले जिन्होने हमें पानी पिलाया. पुलिस चौकी से मोटरसाइकिल लेकर हम मुंबई के सायन अस्पताल इलाज के लिये पहुंचे. मुझे तो सिर्फ ऊपरी चोट लगी थी लेकिन राजू को कंधे के पास गंभीर चोट लगी जिसका इलाज उस घटना के दस साल बाद तक भी चलता रहा. आनंद दिघे की मौत को लेकर आज भी तरह तरह की अफवाहें उडती रहतीं हैं कि उनकी मौत हार्ट अटैक से नहीं बल्कि एक साजिश के तहत उनकी हत्या की गई. ठाणे पुलिस ने दिघे की मौत के बाद हुए हिंसा की जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती की और किसी को भी सजा नहीं मिली. दिघे ने शादी नहीं की थी. उनका एक भांजा है जो कि उनके शिष्य एकनाथ शिंदे के साथ नहीं बल्कि उद्धव ठाकरे की शिव सेना में है.
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