हिंद महासागर में चीन की बढ़ती दखलअंदाजी और समुद्री चुनौतियों को देखते हुए भारतीय नौसेना ने एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेला है. भारतीय रक्षा मंत्रालय ने नौसेना के लिए 4 फिक्स्ड-विंग एम्फीबियस (Amphibious) विमानों के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (RFI) जारी की है. 1953 के बाद यह पहला मौका होगा जब भारतीय नौसेना फिर से इन समुद्री परिंदों का इस्तेमाल करेगी.
वेट लीज के लिये आरएफआई जारी
नौसेना ने चार साल के वेट लीज के लिये आरएफआई जारी की हैं. वेट लीज में विमान देने वाली कंपनी न केवल विमान उपलब्ध करवाती है बल्कि पूरे क्रू से लेकर विमान के रख-रखाव की जिम्मेदारी भी उसी की होती हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि नौसेना को जल्द ही जरूरी ऑपेरशनल कैपेबिलिटी भी मिल जाएगी. साथ ही इसके लिए उसे अलग से इंफ्रास्ट्रक्चर या ट्रेनिंग का इंतजाम भी नही करना होगा.
हालांकि, आरएफआई में यह साफ नहीं किया गया है कि इन विमानों को कहां तैनात किया जाएगा, लेकिन माना जा रहा है कि इनका मुख्य इस्तेमाल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में किया जाएगा. हाल के वर्षों में केंद्र सरकार का पूरा ध्यान अंडमान-निकोबार आईलैंड्स पर है. यह द्वीप समूह भारत की मुख्य भूमि से लगभग 1200 किलोमीटर दूर स्थित है और रणनीतिक रूप से यह काफी मायने रखता है. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह मलक्का स्ट्रेट के बहुत करीब है. इस समुद्री रास्ते से दुनिया का बड़ा हिस्सा व्यापार करता है. इसी रास्ते से चीन का करीब 80 फीसदी तेल आयात और लगभग 40 फीसदी वैश्विक व्यापार गुजरता है. इस लिहाज से यह इलाका बेहद संवेदनशील है.
एम्फीबियस विमान की ताकत
ऐसे एम्फीबियस विमान बहु उपयोगी होते है. आपात हालात में ये सीधे सैनिकों को मेडिकल टीम, राहत सामग्री या जरूरी उपकरण पहुंचा सकते हैं. यानि यह लॉजिस्टिक सपोर्ट के साथ-साथ समुद्र में पेट्रोलिंग करने में सक्षम हैं. फिलहाल नौसेना के पास एक भी एम्फीबियस विमान नही है, ऐसे में नौसेना अब यह विमान लीज पर लेने की सोच रही है, ताकि तुरंत ऑपेरशनल क्षमता हासिल कर सके.
1953 के बाद पहली बार एम्फीबियस विमानों की वापसी भारतीय नौसेना की आधुनिक जरूरतों और 'एक्ट ईस्ट' नीति की मजबूती को दर्शाती है. यह न केवल हमारी निगरानी क्षमता को बढ़ाएगा, बल्कि भविष्य के समुद्री युद्धक कौशल में भारत को एक निर्णायक बढ़त भी दिलाएगा.
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