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चाचा की परछाईं अजित पवार हमेशा 'सीएम इन वेटिंग' ही बने रहे- राजनीति के कद्दावर चाचा-भतीजे की कहानी

महाराष्ट्र की राजनीति के कद्दावर चाचा-भतीजे शरद पवार और अजित पवार की कहानी, जहां चाचा कई बार मुख्यमंत्री बने पर मौका होने पर भी कभी भतीजे को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया.

चाचा की परछाईं अजित पवार हमेशा 'सीएम इन वेटिंग' ही बने रहे- राजनीति के कद्दावर चाचा-भतीजे की कहानी
ANI
  • अजित पवार ने शरद पवार की उंगली पकड़ कर महाराष्ट्र की राजनीति में कदम रखा और कद्दावर नेता बने.
  • लेकिन वे केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो पाते उससे पहले ही उन्हें MP की सीट चाचा शरद पवार के लिए छोड़नी पड़ी.
  • 2004 में राज्य की गठबंधन सरकार में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी शरद पवार ने अजित पवार को CM नहीं बनने दिया.
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महाराष्ट्र के कद्दावर राजनेता अजित पवार का बुधवार (28 जनवरी 2026) की सुबह एक विमान हादसे में निधन हो गया है. कोई उन्हें दबंग तो कोई कुशल प्रशासक, वहीं कोई बागी और मौकापरस्त कहता था. महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार की कई पहचानें हैं. अपने चाचा शरद पवार से बगावत करके अजित पवार ने अलग राह तो पकड़ ली लेकिन ये डगर उनके लिए आसान नहीं साबित हुई.

अजित पवार ने अपने सियासी करियर की जिस बारामती से उड़ान भरी थी वहीं उन्होंने अपने जीवन की अंतिम उड़ान भी भरी और हमेशा के लिए अनंत में गुम हो गए. पर इसी बारामती की गलियों में कभी वो अपने मोटरसाइकिल की गड़गड़ाहट के साथ लोगों से मिलने निकल पड़ते थे, जहां उनका रौब आज भी कायम है.

उनका जन्म बारामती से पौने दो सौ किलोमीटर के फासले पर देवलाली प्रवारा नाम के कस्बे में हुआ था और वहीं पर उन्होंने स्कूली पढ़ाई की थी.
वे शरद पवार के बडे भाई अनंतराव के बेटे थे. अनंतराव ने पिता से झगड़े के बाद घर छोड़ दिया था और मुंबई के राजकमल स्टूडियो में फिल्मकार वी.शांताराम के लिए बतौर असिसटेंट सिनेमटोग्राफर काम करते थे. जब अजित पवार स्कूल में थे तब अनंतराव का देहांत हो गया और परिवार का गुजारा करने की जिम्मेदारी अजित पवार पर आ गई. कुछ दिनों तक अजित पवार अपने मामा के घर पर रहे.

चाचा की उंगली पकड़ कर राजनीति सीखी

ये वो दौर था जब शरद पवार का महाराष्ट्र की सियासत में उदय हो रहा था. उन्हीं की उंगली पकड़ कर अजित पवार ने भी राजनीति का रास्ता अख्तियार किया. जिस तरह से शरद पवार समेत पश्चिम महाराष्ट्र के तमाम राजनेताओं ने चीनी की सहकारी संस्थाओं के जरिए राजनीति में प्रवेश किया अजित पवार भी उसी दरवाजे से दाखिल हुए. 1982 में वे एक चीनी मिल के बोर्ड पर नियुक्त हुए. उसके बाद पुणे जिले की सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक के चेयरमैन चुने गये. 1991 में अजित पवार बारामती लोक सभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गये जिसके बाद उनकी गिनती भी महाराष्ट्र के दिग्गज राजनेताओं में होने लगी. लेकिन इससे पहले कि वे केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो पाते उन्हें संसद की सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए छोड़नी पड़ी. सिर्फ 6 महीने तक वे लोकसभा में बारामती के सांसद रहे. इसके बाद वे बारामती से ही विधान सभा चुनाव जीते और तब से लगातार राज्य की राजनीति ही करते आ रहे हैं.

हमेशा सीएम इन वेटिंग ही रहे- चाचा ने CM नहीं बनने दिया

बारामती के पत्रकार ज्ञानेश्वर रायते बताते हैं कि अजित पवार की राजनीति की शुरुआत छत्रपति शुगर फैक्ट्री से हुई. चाचा की तरह कॉपरेटिव सेक्टर में उन्होंने काम किया. शुरुआत से ही अजित पवार की राजनीति चाचा शरद पवार की राजनीति से जुड़ी रही. शरद पवार जब कांग्रेस में थे तो अजित पवार भी कांग्रेस में थे. जब शरद पवार ने कांग्रेस छोड़ कर अपनी पार्टी एनसीपी बनाई तो अजित पवार भी साथ हो लिए. चाहे कांग्रेस में हों या एनसीपी में जब भी वे सत्ता में रहे शरद पवार ने अजित पवार को अहम मंत्रालय दिए लेकिन मौका होने पर भी कभी मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया. अजित पवार हमेशा सीएम इन वेटिंग ही रहे.

सबसे बड़ी पार्टी बनने पर भी सीएम पद नहीं लिया

साल 2004 में कांग्रेस-एनसीपी की गठबंधन सरकार महाराष्ट्र में बनी. शरद पवार की एनसीपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसके पास मौका था मुख्यमंत्री पद पर दावा करने का. अजित पवार को उम्मीद थी कि चाचा इस पद के लिए उन्हें ही चुनेंगे लेकिन शरद पवार ने मुख्यमंत्री पद कांग्रेस के लिए छोड़ कर सबको चौंका दिया. मुख्यमंत्री पद छोड़ने के एवज में शरद पवार ने गृह और वित्त जैसे अहम मंत्रालय अपने पार्टी के लिए ले लिए और केंद्र की यूपीए सरकार में अपने कोटे से एक ज्यादा मंत्रीपद मांग लिया. हाथ आए मौके को इस तरह से छोड़ दिए जाने पर अजित पवार खासे नाराज हो गए और अपनी नाराजगी उन्होंने कई बार सार्वजनिक भी की. वे मुख्यमंत्री बनने की अपनी महत्वकांक्षा छुपा न सके.

अजित पवार को अब लगने लगा था कि जिन शरद पवार ने उन्हें राजनीति में बड़ा नाम बनाया था वही शरद पवार उनकी महत्वाकांक्षा पूरी होने की राह में रोड़े अटका रहे थे. इस बीच शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने भी राजनीति में अपने पैर जमा लिए. शरद पवार की सियासी वारिस के तौर पर उनका भी नाम लिया जाने लगा. ये सारा कुछ अजित पवार को असुरक्षित कर रहा था. 

भ्रष्टाचार के मामले

उधर अजित पवार एक एक करके भ्रष्टाचार के मामलों में भी फंसने लगे. उन पर सबसे बड़ा आरोप 70 हजार करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले का लगा. ये 1999 से लेकर 2009 तक की बात थी जब अजित पवार के पास सिंचाई विभाग का भी प्रभार था. 

बारामती के पत्रकार ज्ञानेश्वर रायते बताते हैं कि महाराष्ट्र सरकार के एक इंजीनियर ने आरोप लगाया कि सिंचाई के लिए बनाए जाने वाले बांधों के प्रोजेक्ट में घपला हुआ है. प्रोजेक्ट के ठेके अजित पवार की पार्टी से जुड़े लोगों को ही दिए जा रहे हैं, प्रोजेक्ट की लागत बढ़ाई जा रही है और वक्त पर काम पूरा न करने वाले और खराब काम करने वालों को ठेके दिए जा रहे हैं. कुल मिला कर आरोप ये लगा कि राज्य में सिंचाई बढ़ाने की खातिर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई. इसके अलावा अजित पवार और उनकी पत्नी पर 25 हजार करोड़ रुपये के महाराष्ट्र कॉपरेटिव बैंक घोटाले से जुड़े होने के भी आरोप लगे. इस मामले में पहले मुंबई पुलिस ने और फिर इनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट ने यानी ईडी ने मामला दर्ज किया.

अजित पवार पर लगे भ्रष्टाचार के इन्ही आरोपों की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनसीपी को नेचुरली करप्ट पार्टी कहा था. 2019 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने अजित पवार के कथित भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाया. बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस शोले फिल्म के डायलॉग के जरिए सरेआम एलान करते थे कि सत्ता में आने पर वो अजित पवार को जेल की चक्की पिसवाएंगे. लेकिन हुआ इसका उलटा. 

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चाचा से भतीजे की बगावत की कहानी

सत्ता आने पर अजित पवार को भ्रष्टाचार के तमाम मामलों में क्लीन चिट मिल गई. अजित पवार सत्ता में शामिल हो गए. चुनाव नतीजे आने के बाद सरकार बनाने को लेकर गतिरोध पैदा हो गया. बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को बहुमत मिला लेकिन ढ़ाई साल मुख्यमंत्री पद अपने पास रखने को लेकर शिवसेना अड़ गई. इस बीच 23 नवंबर 2019 की सुबह देवेंद्र फडणवीस ने अचानक मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली और अजित पवार को उपमुख्यमंत्री बना दिया. दरअसल अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से बगावत कर दी थी और दावा किया था कि उनके साथ एनसीपी के सभी 54 विधायक हैं जबकि हकीकत ये थी कि उनके साथ सिर्फ 12 विधायक ही थे. माना जाता है कि अजित पवार ने सत्ता की चाहत से ज्यादा जेल जाने से बचने की खातिर बीजेपी का दामन थामा था.

देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार की गुपचुप बनाई गयी सरकार तीन दिन से ज्यादा चल नहीं सकी क्योंकि शरद पवार की ओर से दलबदल कानून के तहत कार्रवाई की धमकी के बाद अजित पवार के साथ गए लगभग सभी विधायक वापस शरद पवार के पास लौट आए. बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा न जुटा पाने के कारण देवेंद्र फडणवीस ने इस्तीफा दे दिया.

चाचा के पास वापस लौटे भतीजा लेकिन...

फडणवीस के इस्तीफे के बाद महाविकास अघाड़ी की सरकार बनी जिसमें उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने. कुछ दिनों बाद शरद पवार ने वापस अजित पवार को पार्टी में ले लिया. अजित पवार न केवल पार्टी में वापस आये बल्कि उनको सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाया गया और वित्त जैसा अहम मंत्रालय भी दिया गया. शरद पवार, अजित पवार को उस वक्त वापस लिए जाने को अपनी एक गलती मानते हैं. एनडीटीवी के एक इंटरव्यू में उन्होंने ये बात कही थी.

वाकई, अजित पवार को वापस लेना शरद पवार को भारी पड़ गया. जुलाई 2023 में अजित पवार ने फिर एक बार बगावत करके पार्टी को दो फाड़ कर दिया. वे महायुति सरकार में शामिल हो गए जहां उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया और वित्त मंत्रालय भी दिया गया. शरद पवार के कई भरोसेमंद नेता जैसे छगन भुजबल, प्रफुल्ल पटेल और दिलीप वलसे पाटिल ने उनका साथ छोड़ दिया. चुनाव आयोग ने और विधानसभा स्पीकर ने अजित पवार के गुट को ही असली एनसीपी होने की मान्यता दे दी और पार्टी का चुनाव चिह्न घड़ी भी अजित पवार को मिल गया. इतने बड़े झटके के बाद भी शरद पवार भतीजे अजित पवार को पटखनी देने में कामयाब रहे. शरद पवार ने पार्टी का नया नाम रखा एनसीपी (शरदचंद्र पवार) और उन्हें तुतारी बजाता आदमी बतौर चुनाव चिह्न मिला. 

शरद पवार

शरद पवार
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लोकसभा चुनाव में शरद पवार गुट को मिला फायदा

लोकसभा चुनाव में शरद पवार की पार्टी ने 8 सीटें जीतीं जबकि अजित पवार सिर्फ 4 सीट जीत पाए. यहां तक कि अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार को शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने बारामती सीट से हरा दिया. लोकसभा चुनाव में भद्द पिटने के बाद से शरद पवार को छोड़ कर अजित पवार के साथ जाने वाले नेता वापस शरद पवार के पास लौटने लगे.

पत्रकार ज्ञानेश्वर रायते कहते हैं, "जो गए थे वो इनकम टैक्स, सीबीआई की वजह से गए थे. उनके क्षेत्रों में विकास कार्य पेंडिंग पड़ा हुआ था. शरद पवार का पलड़ा भारी था लिहाजा वो पार्टी में लौट आए."

अजित पवार के एक करीबी नेता सचिन साटव कहते हैं, "ये राजनीति नहीं है. आवश्यकता आविष्कार की जननी है. राजनीति में निर्णय लेने पड़ते हैं."

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बदले बदले से पवार

अजित पवार ने अपने बेटे पार्थ पवार को भी राजनीति में उतारा था. साल 2019 के लोक सभा चुनाव में पार्थ को मावल सीट से उम्मीदवारी दी गयी थी लेकिन पार्थ चुनाव हार गए. अजित पवार पर उनके सियासी करियर में कई आरोप लगे हैं. विपक्षी पार्टियों ने उनकी एक भ्रष्ट छवि बनाने की कोशिश की है. वे गर्ममिजाज के माने जाते हैं और कई बार गुस्से में कुछ ऐसा बोल देते हैं जिससे विवाद हो जाता है.

दो बार अपने चाचा से बगावत करने के बाद कई उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति का विलेन भी मानते हैं लेकिन उनके करीबियों का कहना है कि सिर्फ दसवीं तक पढ़ाई करने के बावजूद अजित पवार एक कुशल प्रशासक साबित हुए हैं और उन्होंने बतौर मंत्री बेहतरीन काम किया.

सचिन साटव कहते हैं, "अजित पवार जमीन से जुड़े नेता हैं. प्रशासनिक ताकत हैं. उन्होंने हर मिनिस्ट्री में काम किया, 10 बार राज्य का बजट पेश किया है."
अजित पवार की महाराष्ट्र की राजनीति में छवि एक दबंग राजनेता की रही है, पर लंबे वक्त से उन्हें जानने वाले लोगों की नजर में वो बीते कुछ समय से कुछ ऐसा कर रहे थे जो उनकी छवि से मेल नहीं खाता है.

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