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This Article is From Nov 11, 2016

सतलुज-यमुना लिंक विवाद बढ़ा : पंजाब सरकार ने कहा, एक बूंद पानी नहीं देंगे, हरियाणा ने बंद की लंबे रूट की बसें

सतलुज-यमुना लिंक विवाद बढ़ा : पंजाब सरकार ने कहा, एक बूंद पानी नहीं देंगे, हरियाणा ने बंद की लंबे रूट की बसें
प्रतीकात्मक फो
नई दिल्ली: सतलुज-यमुना लिंक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पंजाब की सियासत गरमा गई है. कांग्रेस के 42 विधायकों ने विधानसभा जाकर अपना इस्तीफ़ा सौंपा. गुरुवार को पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता अमरिंदर सिंह ने लोकसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफ़ा भेज दिया. दूसरी ओर बादल सरकार एक बूंद पानी नहीं देने की बात कह रही है.

इस विवाद का असर अब नए रूप में देखा जा रहा है. अब हरियाणा ने पंजाब में लंबे रूट की बस सेवा बंद कर दी है.
बसें 50 से 60 किलोमीटर तक ही जाएंगी. यही नहीं हरियाणा ने भी जम्मू तक जाने वाली बस सेवा बंद कर दी है. कहा जा रहा है कि तनाव के मद्देनजर हरियाणा सरकार ने यह फैसला लिया है.

इधर, अरविंद केजरीवाल पंजाब का पानी बाहर नहीं जाने देने की कसम खा रहे हैं. बादल सरकार का इस्तीफा मांगते हुए आम आदमी पार्टी ने आज पंजाब के कपूरी गांव में अनिश्चितकालीन धरने का ऐलान किया है.

वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बादल सरकार ने कैबिनेट की बैठक बुलाई, जिसमें राष्ट्रपति से दख़ल की मांग करने का फ़ैसला लिया गया.

पंजाब के उप मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा कि पंजाब के पास कोई पानी नहीं है. कैबिनेट ने एक बूंद भी पानी नहीं देने का फैसला किया है. हम राष्ट्रपति से मिलेंगे और उनसे प्रार्थना करेंगे कि कोर्ट की सलाह को स्वीकार न करें.

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि अतिरिक्त पानी नहीं मांग रहे, समझौते का पानी ही मांग रहे हैं. साथ मिलकर मामले को सुलझाना चाहिए.

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि मैं इस फैसले का स्वागत करता हूं. हरियाणा अपने हक से कई दिनों से वंचित था.पंजाब के सीएम का बयान है कि हम खून दे देंगे, एक बूंद पानी नहीं देंगे. हमें एक बूंद पानी या खून नहीं चाहिए, हमें अपने हक का पानी चाहिए.

गौरतलब है कि सतलुज यमुना लिंक विवाद पर गुरुवार को पंजाब सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा. कोर्ट ने कहा कि पंजाब सरकार का पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट 2004 असंवैधानिक है. सतलुज यमुना लिंक नहर बनेगी. यह फैसला पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने लिया.

विवादों की नहर
  • कुल 214 किलोमीटर लंबी नहर बननी है
  • नहर का 92 किमी का हिस्सा हरियाणा में तैयार है
  • 122 किमी हिस्सा पंजाब में, 90% तैयार
  • पंजाब के रोपड़, फ़तेहगढ़ साहिब, मोहाली और पटियाला से गुज़रती है नहर
  • हरियाणा में अंबाला, कुरुक्षेत्र और करनाल के किसानों को फ़ायदा
  • 2004 में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ कैप्टन अमरिंदर सरकार ने पानी साझा करने का समझौता रद्द किया
  • 2016 में बादल सरकार ने नहर के लिए अधिग्रहित ज़मीन किसानों को लौटाने का क़ानून पास किया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई

बता दें कि पंजाब-हरियाणा के बीच रावी-ब्यास नदियों के अतिरिक्त पानी को साझा करने का समझौता करीब साठ साल पुराना है. हरियाणा राज्य बनने के बाद 1976 में केंद्र ने पंजाब और हरियाणा दोनों के बीच 3.5 मिलियन एकड़ फ़ीट (एमएएफ़) पानी साझा करने का आदेश दिया था. इस अतिरिक्त पानी को भेजने के लिए सतलज यमुना लिंक नहर पर काम शुरू हुआ जो हरियाणा की तरफ से पूरा हो गया था लेकिन लेकिन बाद में पंजाब ने अपनी तरफ से काम रोक दिया. हरियाणा ही इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गया था जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुनाया है.

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