केरल सरकार ने सबरीमाला मामले (Sabarimala Case) के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं का विरोध किया है. केरल सरकार (Kerala Government) ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले साल दिए गए फैसले पर दोबारा विचार की कोई जरूरत नहीं है. साथ ही कोर्ट में कहा गया कि सबरीमाला मंदिर में रजस्वलाओं का प्रवेश रोकने की प्रथा हिन्दू धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है.
सबरीमला पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ तय करेगी कि 28 सितंबर के फैसले को बदला जाए या नहीं.
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कोर्ट में केरल सरकार ने कहा, 'छुआछूत के आधार पर या अन्य आधार पर चुनौती देने से फैसले पर कोई असर नहीं पड़ता. जो भी धार्मिक प्रथा संविधान के खिलाफ है, उसे जाना होगा. प्रथा मौलिक अधिकारों का विषय है. सबरीमाला में महिलाओं को बाहर रखना हिंदु धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं क्योंकि दूसरे अयप्पा मंदिरों में ऐसा नहीं है'
वहीं फैसले पर पुनर्विचार चाहने वाले याचिकाकर्ताओं के तरफ से दलील दी गई कि केरल के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार नहीं किया है जिसके चलते राज्य में अशांति है. कोर्ट इस तरफ अपना फैसला मानने के लिए राज्य के लोगों को बाध्य नहीं कर सकता.
त्रावणकोर देवासम बोर्ड ने कहा कि महिलाओं को प्रवेश मिलना चाहिए. इस पर जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने पूछा कि आपने अपना रुख बदल लिया है? तो बोर्ड ने कहा कि हम फैसले का सम्मान करते हैं. बता दें, इससे ससे पहले बोर्ड ने महिलाओं के प्रवेश का विरोध किया था.
पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनवाई कर रही है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की बेंच सुनवाई कर रही है. सुनवाई शुरू होने पर सीजेआई ने बताया, हमारे पास 54 पुनर्विचार याचिकाएं हैं, कुछ जनहित याचिकाएं हैं और कुछ ट्रांसफर याचिकाएं हैं. आप पहले किस पर बहस करना चाहेंगे. वहीं नैयर सर्विस सोसाइटी की ओर से कोर्ट में पेश हुए के परासरन ने कहा कि सितंबर महीने में दिए गए फैसले में कुछ खामियां हैं.
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बता दें, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 28 सितंबर को 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत दी थी. कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को लिंग आधारित भेदभाव बताते हुए निरस्त कर दिया था. करीब 54 पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल कर कोर्ट को इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की गई है.
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गौरतलब है कि चार महिलाओं ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करके पिछले साल सितंबर में सबरीमला मंदिर के संबंध में आए ऐतिहासिक फैसले के समर्थन में पक्षकार के रूप में हस्तक्षेप का अनुरोध किया. इस फैसले में केरल के सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष तक की प्रतिबंधित आयुवर्ग की महिलाओं को भी प्रवेश की अनुमति दी गई थी.
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