"क्या आप सरकार को देशद्रोही कहेंगे...?" इन्फोसिस के बचाव में RSS की पत्रिका पर बरसे रघुराम राजन

जाने-माने अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ रघुराम राजन ने NDTV से भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़े कई मुद्दों पर बात की

अर्थशास्त्री और RBI के पूर्व गवर्नर डॉ रघुराम राजन ने अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर NDTV से बातचीत की.

नई दिल्ली:

टैक्स फाइलिंग में आ रही दिक्कतों और उस बाबत दिग्गज आईटी कंपनी इन्फोसिस (Infosys) की RSS से जुड़ी पत्रिका में आलोचना किए जाने पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर डॉ रघुराम राजन (Dr Raghuram Rajan) ने नाराजगी जताई है. उन्होंने पूछा कि क्या केंद्र सरकार को कोविड टीकाकरण के मोर्चे पर शुरू में कथित खराब प्रदर्शन के लिए देशद्रोही करार दिया जाएगा?

RBI के पूर्व गवर्नर आईटी फर्म द्वारा टैक्स-फाइलिंग वेबसाइट पर कुछ गड़बड़ियों को ठीक करने में असमर्थता के लिए आरएसएस से संबद्ध एक साप्ताहिक द्वारा इंफोसिस पर हमले का जवाब दे रहे थे. हाल के महीनों में कई निजी क्षेत्र की फर्मों को सरकार या संस्थाओं या व्यक्तियों के गुस्से का सामना करना पड़ा है, 

डॉ राजन ने एक उदाहरण के रूप में वस्तु एवं सेवाकर (GST) को लेकर अजीबोगरीब हवाला देते हुए कहा कि "यह मुझे पूरी तरह से अनुत्पादक के रूप में कुरेदता रहता है. क्या आप सरकार पर शुरू में टीकों पर अच्छा काम नहीं करने के लिए राष्ट्र-विरोधी होने का आरोप लगाएंगे? यह एक गलती है और लोग गलतियाँ करते ही हैं." 

GST पर उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि जीएसटी रोलआउट शानदार रहा है. इसे बेहतर किया जा सकता था... लेकिन उन गलतियों से हमने कुछ नहीं सीखा. उन्होंने कहा कि अपने पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए इसे एक क्लब के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए."

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, जो कि अब एक शिक्षक हैं, ने अन्य संबंधित मामलों पर भी एनडीटीवी के साथ एक विशेष साक्षात्कार के दौरान अपने विचार व्यक्त किए. उन्होंने कहा कि भारत के कारखानों के उत्पादन में हालिया "उछाल" को बहुत अधिक नहीं समझा जाना चाहिए क्योंकि वसूली की कथित रूप से विषम प्रकृति के कारण निम्न आधार पर संख्याओं की गणना की गई है.

हालांकि, उन्होंने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि औद्योगिक क्षेत्र में "उचित सुधार" हुआ है. एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पिछली तिमाही में 20.1 प्रतिशत की रिकॉर्ड वार्षिक गति से बढ़ी, जो विनिर्माण में उछाल और उपभोक्ता खर्च में एक मजबूत बदलाव से प्रेरित थी.

शिकागो विश्वविद्यालय के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में फायनेंस के विशिष्ट सेवा प्रोफेसर के रूप में कार्यरत राजन ने कहा, "यहां मुख्य मुद्दा यह है, 'क्या यह पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक पलटाव है या अर्थव्यवस्था के कुछ वर्गों के लिए एक पलटाव भर है?".

उन्होंने कहा, "निश्चित रूप से, औद्योगिक क्षेत्र में उचित रिकवरी हुई है लेकिन फिर से यह उन सामानों के बीच अंतर करता है जो अमीर, उच्च-मध्यम वर्ग बनाम गरीब लोगों के सामान पर लक्षित है." डॉ राजन ने चौपहिया बनाम दोपहिया वाहनों की बिक्री का उदाहरण दिया जिसमें बाद में गिरावट आई है.

उन्होंने अर्थव्यवस्था में बदलाव की ओर इशारा किया और कहा कि बड़ी अधिक औपचारिक फर्में छोटी फर्मों की तुलना में काफी अधिक लाभ वृद्धि का अनुभव कर रही हैं. यहां तक कि सूचीबद्ध फर्में भी. उन्होंने कहा, यह एक कारण है कि शेयर बाजार इतना अच्छा कर रहा है. यही कारण है कि कर संग्रह बढ़ रहा है. अगस्त में जीएसटी संग्रह सालाना 30 प्रतिशत बढ़कर 1.12 लाख करोड़ रुपये हो गया.

डॉ राजन ने कहा, "हम अर्थव्यवस्था को जबरन औपचारिक रूप देते हुए देख रहे हैं. हमने अपने छोटे और मध्यम व्यवसायों को उस हद तक समर्थन नहीं दिया है, जो अन्य देशों में दिया जाता है." उन्होंने कहा, "आप छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए और अधिक औपचारिक बनने के लिए शर्तों में सुधार करके औपचारिकता चाहते हैं. मुझे नहीं लगता कि हम ऐसा देखते हैं." उन्होंने कहा कि बढ़ते राजस्व को राज्य सरकारों के साथ साझा नहीं किया जा रहा है.

संघवाद के मुद्दे पर उन्होंने कहा, "राज्य सरकारों की वित्तीय हालत बहुत खराब है. केंद्र ने केंद्रीय उपकर के माध्यम से राजस्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निगल लिया है." उन्होंने कहा, "भारत विशेष रूप से केंद्र सरकार द्वारा संचालित होने लगा है. और वह भी न केवल केंद्र  बल्कि 'केंद्र के भीतर केंद्र' से. इस तरह का अति-केंद्रीकरण हमें पीछे धकेलता है."

उन्होंने कहा, निर्णय बहुत देर से लिए जा रहे हैं. इस बाबत उन्होंने सरकारी बैंकों में सीईओ नियुक्त करने का उदाहरण दिया. डॉ राजन ने कहा, "इससे पता चलता है कि सरकार अभिभूत है... बहुत से लोग मार्गदर्शन के लिए केंद्र की ओर देख रहे हैं लेकिन वहां से अपेक्षित मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है. नतीजतन, सिस्टम लकवाग्रस्त हो जाता है."

लोगों पर एक लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के प्रभाव का जिक्र करते हुए उन्होंने गोल्ड लोन में कथित वृद्धि की ओर इशारा किया और कहा कि भारत में लोग, अपने परिवारिक पूंजी सोने को तभी बेचते हैं, जब वो गंभीर संकट में होते हैं. उन्होंने कहा कि सोने की खपत में मामूली गिरावट ही आई है. 


महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को गांवों के लिए एक प्रकार की नकद-हस्तांतरण योजना के रूप में बताते हुए उन्होंने कहा कि शहरी भारत के लिए भी कुछ इसी तरह की योजना की जरूरत है.

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निवेशकों द्वारा भारतीय लोकतंत्र की बनावट में बदलाव को उनके व्यावसायिक निर्णयों में एक कारक के रूप में मानने के सवाल पर, डॉ राजन ने कहा कि व्यवसायी आमतौर पर तब तक परवाह नहीं करते जब तक यह उन्हें प्रभावित नहीं करता है. उन्हें अक्सर देर से पता चलता है कि जब कोई सरकार बिना चेक और बैलेंस के काम करती है, तो यह अंततः उन्हें प्रभावित करता है. उन्होंने कहा कि व्यवसायों के संबंध में भी मनमाना निर्णय लिया जा सकता है.