
42 साल की सुनीता हमें उस जगह ले जाती हैं जहां 50 घंटे तक वह मलबे में दबी रहीं। सुनीता कई पलों तक दैत्याकार जेसीबी मशीनों को काम करते देखती हैं। कई लाशें अभी भी उसी मलबे में दबी हैं, जिससे वह सुरक्षित निकलीं। सुनीता की आंखों से आंसू गिरने लगते हैं।
हम उसके पति महेंद्र से बात करते हैं। वह बताते हैं कि उस दिन सुनीता इस पांच मज़िला इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर थी। जब इमारत भरभरा कर गिरी तो ये उम्मीद करना मुश्किल था कि कोई बच पाएगा। जब महेंद्र ने पत्नी की खोज शुरू की तो उन्हें उसकी चीखें सुनाई दी।
"मेरी पत्नी ज़िंदा थी। मैं मदद के लिए चिल्लाया। नेपाल की पुलिस और आर्मी आई तो ज़रूर पर उनके पास ऐसे औजार ही नहीं थे, जो इस विशालकाय इमारत के मलबे को हटा पाते।"
सुनीता की चीखें करीब 20 घंटे तक लोगों को सुनाई देती रहीं। फिर सुनाती बेहाश हो गई..आखिर कार सोमवार को एनडीआरएफ के जवान उसके लिए राहत लेकर आए...
एनडीआरएफ के इंस्पेक्टर ने हमें बताया, पिछले दो सालों में जवानों को सिखाया गया है कि ऐेसे हाल में कैसे लोगों को निकाला जाए। जैसे ही हमें सुनीता के बारे में पता चला तो हमने उनकी लोकेशन पता की। वो दो स्लैब्स के बीच फंसी थी। हमारे जवान रेंगकर उन्हें निकालने भीतर गए।
सुनीता बेहाश हो गई थी पर ज़िंदा थी। उसे खरोंच भी नहीं आई क्योंकि वो सीमेंट के दो स्लेब्स के बीच पड़ी रही। आज उसका पूरा परिवार सुरक्षित है, लेकिन महेंद्र का कहना है कि ज़िंदगी की सारी कमाई चली गई, लेकिन वह नई शुरुआत करेंगे।
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं