
नई दिल्ली:
2008 के मालेगांव धमाकों के आरोपी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित साजिश का हिस्सा नहीं थे, बल्कि कट्टरपंथियों से मिलकर खुफिया तौर पर जानकारी जुटा रहे थे।
सेना के 50 गवाहों के बयानों के बाद हुए खुलासे से अब ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या सेना ने कर्नल पुरोहित को लेकर फैसला लेने में जल्दबाजी दिखाई और बिना वारंट के ही उन्हें सिविल एजेंसियों के हाथों सौंप दिया।
चार साल पहले लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित पर मालेगांव धमाके के आरोपी हिन्दू कट्टरपंथियों से रिश्ते के आरोप लगे और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन अब सेना के कई अधिकारियों और दूसरे लोगों से पूछताछ के बाद यह बात सामने आई है कि हालांकि कट्टरपंथियों के साथ पुरोहित के रिश्ते थे, लेकिन वह साजिश में शामिल नहीं था।
दरअसल पुरोहित हमेशा से कहता रहा कि कट्टरपंथियों के साथ उसके रिश्ते की खबर अधिकारियों को थी और यह उसकी ड्यूटी का हिस्सा था। अब सेना पूछताछ के बाद अगले कदम पर विचार कर रही है। इससे पुरोहित के दावे मजबूत होते हैं कि जांच में गंभीर कमियां हैं।
अब सवाल है कि सेना ने पुरोहित से मिली जानकारियां दूसरी एजेंसियों से क्यों नहीं बांटी, वह भी तब, जब ऐसी जानकारी मालेगांव धमाके से आठ महीने पहले मिल चुकी थी। सेना ने इतनी आसानी से और जल्दबाजी में पुरोहित को दूसरी जांच एजेंसियों के हवाले कैसे कर दिया। यह सब एटीएस के शक जताने के एक हफ्ते के भीतर हुआ।
जब सेना से इस बारे में पूछा गया, तो उसने पूरी जांच के बगैर पुरोहित को सौंपने के आरोप को खारिज कर दिया। लेकिन हकीकत यह है कि आखिर में आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने इस पूरे मामले की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश दिए।
दरअसल पुरोहित ने मिलेट्री इंटेलिजेंस के एक कर्नल पर आरोप लगाया है कि उसने सिविल एजेंसियों को बिना अरेस्ट वारंट के हिरासत में लेने और टॉर्चर करने की इजाजत दी। हालांकि अब सेना का यह भी कहना है कि उस कर्नल को सिविल एजेंसियों से बातचीत और तालमेल बनाने को कहा गया था।
सेना के 50 गवाहों के बयानों के बाद हुए खुलासे से अब ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या सेना ने कर्नल पुरोहित को लेकर फैसला लेने में जल्दबाजी दिखाई और बिना वारंट के ही उन्हें सिविल एजेंसियों के हाथों सौंप दिया।
चार साल पहले लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित पर मालेगांव धमाके के आरोपी हिन्दू कट्टरपंथियों से रिश्ते के आरोप लगे और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन अब सेना के कई अधिकारियों और दूसरे लोगों से पूछताछ के बाद यह बात सामने आई है कि हालांकि कट्टरपंथियों के साथ पुरोहित के रिश्ते थे, लेकिन वह साजिश में शामिल नहीं था।
दरअसल पुरोहित हमेशा से कहता रहा कि कट्टरपंथियों के साथ उसके रिश्ते की खबर अधिकारियों को थी और यह उसकी ड्यूटी का हिस्सा था। अब सेना पूछताछ के बाद अगले कदम पर विचार कर रही है। इससे पुरोहित के दावे मजबूत होते हैं कि जांच में गंभीर कमियां हैं।
अब सवाल है कि सेना ने पुरोहित से मिली जानकारियां दूसरी एजेंसियों से क्यों नहीं बांटी, वह भी तब, जब ऐसी जानकारी मालेगांव धमाके से आठ महीने पहले मिल चुकी थी। सेना ने इतनी आसानी से और जल्दबाजी में पुरोहित को दूसरी जांच एजेंसियों के हवाले कैसे कर दिया। यह सब एटीएस के शक जताने के एक हफ्ते के भीतर हुआ।
जब सेना से इस बारे में पूछा गया, तो उसने पूरी जांच के बगैर पुरोहित को सौंपने के आरोप को खारिज कर दिया। लेकिन हकीकत यह है कि आखिर में आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने इस पूरे मामले की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश दिए।
दरअसल पुरोहित ने मिलेट्री इंटेलिजेंस के एक कर्नल पर आरोप लगाया है कि उसने सिविल एजेंसियों को बिना अरेस्ट वारंट के हिरासत में लेने और टॉर्चर करने की इजाजत दी। हालांकि अब सेना का यह भी कहना है कि उस कर्नल को सिविल एजेंसियों से बातचीत और तालमेल बनाने को कहा गया था।
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