
केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मंगलवार को पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि सरकार आदिवासियों के अधिकारों के लिए पूरी तरह सजग है, लेकिन पर्यावरण मंत्री उस वक्त लड़खड़ा गए, जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि उनकी सरकार ने विश्व बैंक से आदिवासियों को अधिकार सुनिश्चित करने वाली शर्तें हटाने को क्यों कहा है?
‘ये आपको कहां से पता चला? ये कैसे कह सकते हैं आप?’ प्रकाश जावड़ेकर की यही पहली प्रतिक्रिया थी। असल में केंद्र सरकार ने विश्व बैंक की नीति के उस प्रावधान पर एतराज़ किया है, जिसमें वह विकास परियोजनाओं के लिए मदद देने से पहले आदिवासियों की सहमति लेने और उनके हितों को सुरक्षित करने का वादा मांगती है।
एनडीटीवी इंडिया ने वन औऱ पर्यावरण मंत्री से सीधा सवाल किया कि अगर वह आदिवासियों के लिए चिंतित हैं, तो सरकार विश्व बैंक के इस प्रावधान पर एतराज़ क्यों कर रही है।
जबाव में पर्यावरण मंत्री ने ज़िम्मेदारी आदिवासी मामलों के मंत्रालय पर डाल दी औऱ कहा कि इसका ख्याल रखना उस मंत्रालय का काम है। एनडीटीवी इंडिया के पास जो दस्तावेज़ हैं, वह बताते हैं कि सरकार ने विश्व बैंक से कहा है कि वह विकास परियोजनाओं के मदद से पहले आदिवासियों के हितों और सहमति के बारे में कोई लिखित वादा देने के प्रावधान से असहज है, क्योंकि भारत के पास पर्याप्त घरेलू कानून हैं, जो आदिवासियों के हित सुनिश्चित करते हैं।
लेकिन जानकार सरकार के इस रुख से खुश नहीं हैं। खासतौर पर तब जबकि कई कमेटियों की रिपोर्ट ये बता चुकी है कि देश के आदिवासी इलाकों में विकास परियोजनाओं के आने के बाद वहां जनजातीय समाज की हालत और खराब होती गई है। हाल ही में खाखा कमेटी की रिपोर्ट में भी यही बात सामने आई थी। अब सरकार विश्व बैंक से जिस प्रावधान को हटाने की बात कर रही है, उससे सवाल खड़ा हो रहा है कि सरकार के लिए विकास के खाके में आदिवासी कहां खड़े होते हैं।
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