क्या इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन के प्रयोग समेत इन वजहों से फैला ब्लैक फंगस, शीर्ष डॉक्टरों ने गिनाईं खामियां

महाराष्ट्र के पांच बड़े अस्पतालों से जुड़े मेडिकल एक्स्पर्ट दूषित ऑक्सिजन, गंदे कंटेनर-गंदा ऑक्सीजन मास्क-ट्यूब या फिर ह्यूमिडिफ़ायअर में इस्तेमाल होने वाले नल के पानी का, ब्लैक फ़ंगस के अचानक हुए फैलाव में अहम रोल मानते हैं.

क्या इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन के प्रयोग समेत इन वजहों से फैला ब्लैक फंगस, शीर्ष डॉक्टरों ने गिनाईं खामियां

Black Fungus आंखों पर डालता है असर

मुंबई:

भारत में कोरोना मरीजों के लिए घातक बनी ब्लैक फंगस बीमारी की वजह क्या इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन यानी उद्योगों में इस्तेमाल ऑक्सीजन है? इसको लेकर देश के शीर्ष चिकित्सकों ने अहम खामियां गिना दी हैं. मेडिकल ऑक्सीजन की जगह इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन के इस्तेमाल को बड़ी भूल करार दिया है.स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा कि मेडिकल ऑक्सीजन 99% शुद्ध होता है, इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन 93 से 95% शुद्ध. मेडिकल ऑक्सिजन के सिलेंडर-टैंकर अलग होते हैं. इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन की सप्लाई के के बाद सिलेंडर-टैंकर भी क्या साफ़-अपग्रेड हुए, यह सवाल भी उन्होंने उठाया? विदेशों में भी कोरोना से जान बचाने के लिए स्टेरॉयड मरीजों को दिया गया, लेकिन वहां क्यों नहीं ब्लैक फंगस ने कहर बरपाया.

रिफलर ने हर तरह के सिलेंडर में भरी ऑक्सीजन...
ऑक्सीजन रिफलर ने भी माना है कि लोग कोरोना मरीजों को ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाई ऑक्साइड के सिलेंडर भी लाते थे. यानी ऑक्सीजन भरने के लिए किसी भी तरह के सिलेंडर का इस्तेमाल हुआ?
फ़ूड एंड ड्रग फ़ाउंडेशन ने इसको  लेकर FDA को चिट्ठी लिखी है.इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन का इस्तेमाल वेल्डिंग,कटिंग वगेरा के लिए फ़ैक्टरियों में होता है.ऑक्सीजन की क़िल्लत के दौरान दिन रात ऐसे ऑक्सीजन टैंकर दौड़ाए गए.

ब्लैक के देश भर में 9 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं. इस कारण तमाम मरीजों की जान चली गई है और कई मरीजों की जान बचाने को उनकी आंखें निकालनी पड़ी हैं.महाराष्ट्र में ब्लैक फ़ंगस के 2000 से ज्यादा केस हैं. महाराष्ट्र के पांच बड़े अस्पतालों से जुड़े मेडिकल एक्स्पर्ट दूषित ऑक्सिजन, गंदे कंटेनर-गंदा ऑक्सीजन मास्क-ट्यूब या फिर ह्यूमिडिफ़ायअर में इस्तेमाल होने वाले नल के पानी का, ब्लैक फ़ंगस के अचानक हुए फैलाव में अहम रोल मानते हैं. 

इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन की शुद्धता पर सवाल- डॉ. अभय पांडे
ऑल इंडिया फ़ूड एंड ड्रग लाइसेंस होल्डर फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष अभय पांडे ने कहा, हमने चिट्ठी लिखी है FDA को. इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन इतनी शुद्ध नहीं होती, न ही उनके प्लांट पर साफ़ सफ़ाई होती है, मेडिकल प्लांट की साफ़ सफ़ाई अलग होती है, सिलेंडर भी इस दर्जे का होता है, क्या मेडिकल को दिए गए इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन में FDA के नियमों का पालन हुआ. क्या टैंकर और सिलेंडर अपग्रेड किए गए मेडिकल टर्म्ज़ के हिसाब से हमने FDA से पूछा है.

दूसरे सिलेंडर का इस्तेमाल खतरनाक- रविंद्र जोशी
महाराष्ट्र फ़ूड एंड ड्रग अड्मिनिस्ट्रेशन के पूर्व असिस्टेंट कमिशनर रविंद्र जोशी बताते हैं कि 'दोनो ऑक्सीजन में फ़र्क़ ये है कि मेडिकल ऑक्सिजन 99% वॉल्यूम बाई वॉल्यूम प्योर होता है. जहां मैन्युफ़ैक्चर होता है, वहां से प्यूरिफ़िकेशन होता है. वायुमंडल से हवा लेते हैं, ऑक्सीजन सेप्रट होता है. इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन सामान्यतया 95% शुद्ध होता है. इमरजेंसी में इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन भी मेडिकल उद्देश्य के लिए इस्तेमाल पर कोई नुकसान तो नोटिस में नहीं आया है.  लेकिन अगर दूसरे सिलेंडर में मेडिकल ऑक्सिजन भरा तो ये बहुत ख़तरनाक हो सकता है. इसके गंदगी होने का पूरा ख़तरा है. मरीज़ को बहुत बड़ा ख़तरा हो जाएगा. 

इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन एक कारण संभव-डॉ राजीव बोधनकर
भाटिया अस्पताल के CEO डॉ राजीव बोधनकर ने कहा‘मेडिकल ऑक्सिजन कई पड़ाव से फ़िल्टर होकर 99% शुद्ध बनता है, लेकिन इंडस्ट्रियल 95% तक ही रहता है, और इस बार इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हुआ है. ये वाक़ई एक फैलाव का कारण हो सकता है.'

इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन में के कंप्रेसर में ऑयल... 
पुणे के डॉ अविनाश भोंडवे ने कहा कि इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन बनाते वक्त जो कंप्रेसर बनाया जाता है, उसमें ऑयल रहता है जबकि मेडिकल कंप्रेसर में तेल का इस्तेमाल नहीं होता. जिस कंटेनर या टैंकर से ये सप्लाई होता है, उसे साफ़ रखना ज़रूरी है जो इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन में नहीं किया जाता. 

अनियंत्रित शुगर लेवल बड़ी वजह...
महाराष्ट्र कोविड टास्क फ़ोर्स के डॉ राहुल पंडित ने कहा कि इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन इतने उच्च गुणवत्ता के सूक्ष्म कणों को फिल्टर करने वाले से नहीं गुजरता, लेकिन शायद ये छोटे कारण हैं. ऑक्सीजन ह्युमिडीफ़ायर भी एक फ़ैक्टर है लेकिन बड़ा कारण है अनियंत्रित शुगर लेवल.

ट्यूब-मास्क की सफाई जरूरी- डॉ. गौरव चतुर्वेदी
मुंबई जसलोक हॉस्पिटल के ENT स्पेशलिस्ट डॉ गौरव चतुर्वेदी ने कहा कि जो जो ट्यूब और मास्क ऑक्सीजन के लिए मरीज़ों को दे रहे हैं उसकी सफ़ाई ज़रूरी है. सोडियम हाइपोक्लोराइड एक टब में डालकर इसको साफ़ करें, फिर साफ़ पानी से धोकर इस्तेमाल करें, ह्यूमिडिफ़ायर में नल का नहीं स्टरलाइल पानी का इस्तेमाल करें.

रिफलर ने मानी लापरवाही...
महाराष्ट्र में 30 ऑक्सीजन मैन्युफ़ैक्चरर हैं और 88 रिफ़लर. इनमें से एक रिफ़लर ने अपनी पहचान छुपाते हुए दावा किया कि ऑक्सीजन की क़िल्लत के दौरान सिलेंडरों की भारी कमी थी. उनके रिफ़िलिंग प्लांट पर लोग हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और कार्बन डाई आक्साइड के सिलेंडर तक ले कर पहुंचते थे.लेकिन जब से तय हो गया था कि इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन नहीं देना है, तब से FDA के 2-3 लोग और पुलिस कॉन्स्टबल  हमारे प्लांट पर बैठते हैं.रिफलर ने कहा, जो हमसे रीफ़िल करवा कर आगे बेचते थे. हाइड्रोजन के अलावा नाइट्रोजन के सिलेंडर कलर कर के भेजते थे. कार्बन डाई आक्सायड के सिलेंडर कुछ-कुछ लोग भेज देते थे.

हाइड्रोजन-नाइट्रोजन सिलेंडर का इस्तेमाल गलत- डॉ गौतम भंसाली
मुंबई कोविड टास्क फ़ोर्स के सदस्य डॉ गौतम भंसाली ऐसे सिलेंडरों को ब्लैक फ़ंगस के पीछे का एक ख़तरनाक कारण मानते हैं. भंसाली ने कहा,‘ये ही ख़तरनाक था, जो हमको अभी तकलीफ़ दे रहा है, लोग गैस सिलेंडर लेकर जाने लग गए थे कि उसके अंदर ऑक्सिजन भरवाएँगे, लेकिन उस वक़्त का माहौल ऐसा ही था. ऑक्सीजन के ह्यूमिडिफ़ायअर में टैप वॉटर का इस्तेमाल ग़लत है. वो भी फ़ंगस देने का कारण है, इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन को बनाने का तरीक़ा अलग है. फिर भी मेडिकल के इस्तेमाल के लिए दिया गया. ऑक्सीजन हाइजीन ज़रूरी है. अमेरिका, ब्रिटेन सब जगह मामले आए, लेकिन ऐसे ब्लैक फ़ंगस वहां नहीं फैला क्योंकि वहां पर्याप्त साफ-सफाई बरती गई.


ऐसे इस्तेमाल होती है मेडिकल ऑक्सीजन...
विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल ऑक्सीजन 99% शुद्ध होना चाहिए. मरीज़ तक पहुंचने से पहले इसकी गुणवत्ता, शुद्धता की जांच होनी चाहिए. कार्बन मोनोऑक्साइड 5ppm v/v से अधिक ना हो, हलोजन, oxidising सब्स्टेंस के पैरामीटर भी तय हैं.दबाव के साथ मेटल के सिलेंडर में उपयुक्त सुरक्षा नियमों के अनुरूप इसे स्टोर करना है. वॉल्व और टैप्स को तेल या ग्रीस से चिकना नहीं होने देना है. 

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मेडिकल ऑक्सीजन निर्माता की पूरी जांच जरूरी...
मेडिकल सिलेंडर के ऊपरी हिस्से को सफेद रंग से और नीचे के हिस्से को काले रंग से रंगा जाना है। सिलेंडर में ‘ऑक्सीजन' का लेबल लगा होना चाहिए.  लेबल के साथ साथ ऑक्सीजन या इसके सिम्बल ‘O2' को सिलेंडर की सतह पर पेंट करके लगाना है. जब FDA मेडिकल ऑक्सीजन के लिए लाइसेंस देती है तो तय करती है कि मैन्युफ़ैक्चरर के पास ये सारे टेस्ट करने की तकनीक है या नहीं.