क्या बेटा पैदा करते समय मां को बेटी की तुलना में ज्यादा प्रसव पीड़ा झेलनी पड़ती है? एक नई वैज्ञानिक स्टडी में दावा किया गया है कि लड़कों का औसत आकार और सिर जन्म के समय अपेक्षाकृत बड़ा होने के कारण कुछ मामलों में प्रसव अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है. हालांकि, प्रसव की कठिनाई केवल बच्चे के लिंग पर नहीं, बल्कि कई अन्य चिकित्सीय कारकों पर भी निर्भर करती है.
हमारे समाज में सदियों से बेटा होने पर थाली बजाकर खुशियां मनाने का चलन रहा है. लोग बधाईयां देते हैं और मिठाइयां बांटते हैं. लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि उस नन्हें बेटे को दुनिया में लाते वक्त मां को कितनी भयानक पीड़ा से गुजरना पड़ता है. हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा खुलासा किया है जिसे सुनकर हर कोई दंग रह गया है. एक नई साइंटिफिक रिसर्च का दावा है कि बेटी के मुकाबले बेटा पैदा करते समय मां को कहीं ज्यादा असहनीय लेबर पेन और दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
अमेरिकन जर्नल ‘द एनाटॉमिकल रिकॉर्ड' में छपी इस स्टडी ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. वैज्ञानिकों ने इसे बहुत दिलचस्प नाम दिया है: ‘द कॉस्टली सन हाइपोथेसिस' यानी बेटा पाने की जैविक कीमत. वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानी विकास यानी एवोल्यूशन के दौरान कुछ ऐसे बदलाव हुए हैं, जिनकी वजह से बेटे का जन्म मां के शरीर पर ज्यादा भारी पड़ता है.
नई स्टडी के अनुसार, कुछ मामलों में लड़कों का जन्म अपेक्षाकृत अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि पुरुष शिशु औसतन जन्म के समय बड़े होते हैं और इससे कठिन प्रसव का जोखिम बढ़ सकता है. हालांकि, प्रसव की कठिनाई कई अन्य चिकित्सीय कारकों पर भी निर्भर करती है.
आखिर लड़के के जन्म में इतना दर्द क्यों होता है
वैज्ञानिक निकोल ग्रुनस्ट्रा और जोनाथन वेल्स ने 140 स्तनधारी जीवों की प्रजातियों पर गहरा अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि ज्यादातर जीवों में नर बच्चे जन्म के समय मादा बच्चों से आकार और वजन में बड़े होते हैं.
- पेट के अंदर लड़के का सिर और शरीर आमतौर पर लड़की के मुकाबले थोड़ा बड़ा और भारी विकसित होता है.
- मां का शरीर बेटे को विकसित करने में ज्यादा एनर्जी खर्च करता है ताकि वह भविष्य में मजबूत बन सके.
- जब बच्चा जन्म नली यानी बर्थ कैनाल से बाहर निकलने लगता है, तो उसका बड़ा सिर मां की पेल्विस की संकरी हड्डियों में अटकने का खतरा बढ़ा देता है.
- मेडिकल भाषा में इसे ‘डिस्टोसिया' यानी कठिन प्रसव कहा जाता है, जिसमें दर्द का समय बहुत लंबा खिंच जाता है.
आंकड़ों में सामने आई चौंकाने वाली हकीकत
यह केवल एक थ्योरी नहीं है, बल्कि इंसानों के आंकड़ों में भी यह साफ दिखाई देता है.
नेपाल में हुई एक स्टडी का हवाला देते हुए शोधकर्ताओं ने बताया कि वहां जिन महिलाओं ने बेटों को जन्म दिया, उनमें प्रसव रुकने या अटकने (ऑब्सट्रक्टेड लेबर) का खतरा 18 प्रतिशत ज्यादा देखा गया.
भारत के आंकड़ों पर नजर डालें तो लड़के के जन्म के समय सी-सेक्शन यानी सिजेरियन डिलीवरी की संभावना 3 प्रतिशत तक बढ़ जाती है.
सिर बड़ा होने की वजह से बच्चे को बाहर आने के लिए ज्यादा घूमना पड़ता है, जिससे मां की मांसपेशियां और नसें बुरी तरह खिंचती हैं.
इंसानी शरीर और चलने की अनोखी उलझन
वैज्ञानिक लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि इंसानों में प्रसव पीड़ा बाकी जानवरों से ज्यादा भयानक क्यों होती है. इसे साइंस में ‘ऑब्स्टेट्रिकल डिलेमा' कहा जाता है.
इंसान जब दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलने लगा, तो रीढ़ की हड्डी को संभालने के लिए महिला की पेल्विस यानी कूल्हे की हड्डी पहले से संकरी हो गई. लेकिन दूसरी तरफ इंसानी दिमाग तेजी से विकसित हुआ, जिससे बच्चे का सिर बड़ा होता चला गया. एक संकरे रास्ते से बड़े सिर वाले बच्चे का निकलना हमेशा से एक जोखिम भरा सफर रहा है. अब वैज्ञानिकों का कहना है कि जब गर्भ में लड़का होता है, तो यह संकरा रास्ता और ज्यादा चुनौतीपूर्ण बन जाता है.
भारत के लिए यह रिसर्च क्यों है इतनी अहम
भारत में हर साल लगभग 2.5 करोड़ बच्चों का जन्म होता है, जो पूरी दुनिया के जन्मदर का लगभग पांचवां हिस्सा है. इसलिए मां की सेहत से जुड़ा कोई भी छोटा बदलाव लाखों परिवारों को सीधे प्रभावित करता है.
हमारे देश में जागरूकता और बेहतर अस्पतालों की वजह से मातृ मृत्यु दर में भारी गिरावट आई है. स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार साल 2014-16 में जहां प्रति लाख जन्म पर 130 माताओं की मौत होती थी, वहीं 2019-21 में यह घटकर 93 रह गई है. अस्पतालों में सुरक्षित डिलीवरी का आंकड़ा भी 79 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. लेकिन दूसरी तरफ आज भी समाज में बेटे की चाहत बेटियों से कहीं ज्यादा देखने को मिलती है.
कुदरत का फैसला और सामाजिक विरोधाभास
यहां एक बहुत बड़ा विरोधाभास देखने को मिलता है. जिस बेटे को पाने के लिए समाज इतना उतावला रहता है, बायोलॉजिकल तौर पर उसी बेटे को जन्म देने में मां को अपनी जान का सबसे बड़ा जोखिम उठाना पड़ता है.
शोधकर्ताओं का मानना है कि कुदरत ने नर बच्चे को बड़ा इसलिए बनाया ताकि बड़ा होकर वो ज्यादा ताकतवर बने और अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ा सके. लेकिन कुदरत के इस नियम की सारी भारी कीमत उस बेचारी मां को चुकानी पड़ती है, जिसे घंटों असहनीय प्रसव पीड़ा झेलनी पड़ती है.
डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने यह भी साफ किया है कि इसका मतलब यह कतई नहीं है कि बेटा पैदा होना हमेशा खतरनाक ही होता है. प्रसव कितना आसान या मुश्किल होगा, यह मां के खान-पान, उसकी सेहत, पेल्विस के आकार, सही डाक्टरी देखरेख और बच्चे की पोजीशन पर भी निर्भर करता है.
एक आम इंसान के लिए इस रिसर्च की सबसे बड़ी सीख यही है कि बेटा हो या बेटी, दोनों को दुनिया में लाने के लिए एक मां अपनी जान की बाजी लगा देती है. अगली बार जब भी किसी के घर बेटा पैदा हो, तो सिर्फ जश्न मनाने के बजाय उस मां के उस भयानक दर्द और त्याग का भी सम्मान करें, जो उसने अपने जिगर के टुकड़े को इस दुनिया में लाने के लिए अकेले सहा है.
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