नशे का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में चरस, गांजा या हेरोइन जैसी खतरनाक चीजों की तस्वीर खिंच जाती है. लेकिन अब गलियों और मोहल्लों में नशे का एक ऐसा रूप फैल रहा है जो दिखने में बहुत आम और घरेलू लगता है. जब सीमाओं पर सख्त पहरेदारी की वजह से हेरोइन यानी चिट्टा की सप्लाई रुकी, तो नशे के धंधेबाजों ने एक नया और खतरनाक रास्ता तलाश लिया. अब वो रास्ता है मेडिकल स्टोरों पर मिलने वाली दर्द निवारक, नींद की गोलियां और कफ सिरप.
पंजाब पुलिस ने पिछले कुछ समय में 11 लाख से ज्यादा नशीली गोलियां और कैप्सूल जब्त किए हैं. जांच में सामने आया कि ये दवाइयां गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों से अवैध तरीके से पहुंचाई जा रही हैं. पर क्या यह सिर्फ कानून और पुलिस का मामला है. दिल्ली के मशहूर सर गंगा राम अस्पताल के मेडिसिन विशेषज्ञ और फाइमा (FAIMA) के मुख्य सलाहकार डॉ. बिभु आनंद का कहना है कि यह सीधे-सीधे हमारी पब्लिक हेल्थ और आम परिवारों की जिंदगी से जुड़ा बड़ा संकट बन चुका है.
इलाज की गोलियां कैसे बन रही हैं नया नशा
डॉ. बिभु आनंद बताते हैं कि अस्पताल में मरीजों की सर्जरी के बाद या किसी गंभीर बीमारी में तेज दर्द कम करने के लिए कुछ खास दवाएं लिखी जाती हैं. जब तक डॉक्टर की देखरेख में सही खुराक ली जाए, तब तक ये दवाएं मरीज की जान बचाती हैं. लेकिन मुसीबत तब शुरू होती है जब लोग बिना किसी पर्चे के या नशे का सुरूर पाने के लिए इन दवाइयों को मनमर्जी से खाने लगते हैं.
ट्रामाडोल: यह एक बहुत तेज दर्द निवारक दवा है, जिसका गलत इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है.
कोडीन वाले कफ सिरप: खांसी की दवा समझकर कुछ लोग इसे नशे की तरह बोतलों में गटक जाते हैं.
प्रेगाबालिन: नसों के दर्द के लिए दी जाने वाली यह दवा दिमाग पर सीधा असर डालती है.
अल्प्राजोलाम और क्लोनाजेपाम: नींद और घबराहट शांत करने वाली इन गोलियों की लत इंसान को पूरी तरह लाचार बना देती है.
कुछ अन्य ओपिओइड दवाएं: जो दर्द तो मिटाती हैं लेकिन आदत पड़ते ही शरीर को अपना गुलाम बना लेती हैं.
डॉक्टर की चेतावनी: शरीर पर क्या पड़ता है असर
डॉ. आनंद के मुताबिक इन दवाओं को लेकर समाज में एक बहुत गलतफहमी फैली हुई है. लोग सोचते हैं कि अगर कोई चीज मेडिकल स्टोर पर बिक रही है, तो वो हेरोइन जितनी खतरनाक नहीं हो सकती. लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है.
- जब कोई इंसान बिना डाक्टर की सलाह के ये गोलियां लगातार खाने लगता है, तो शरीर इनका आदी हो जाता है.
- अगर अचानक दवा न मिले, तो बेचैनी, हाथ-पैरों में कंपकंपी और भयंकर गुस्सा आने लगता है.
- सबसे बड़ा खतरा तब होता है जब लोग दो-तीन अलग-अलग दवाइयों को एक साथ खा लेते हैं या शराब के साथ मिला लेते हैं.
- इससे सांस की गति बहुत धीमी पड़ जाती है, इंसान गहरी बेहोशी में चला जाता है और कई बार नींद में ही सांस रुकने से मौत हो जाती है.
नकली दवाओं का 70 करोड़ का खेल और मरीज की सावधानी
इस नशे के दलदल के बीच नकली दवाओं के सिंडिकेट ने आग में घी डालने का काम किया है. हाल ही में पकड़े गए नकली दवाओं के गिरोह यह साबित करते हैं कि बाजार में घटिया और मिलावटी गोलियां भी धड़ल्ले से खप रही हैं.
डॉ. आनंद आम जनता को कुछ बेहद आसान और काम की सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं.
- हमेशा रजिस्टर्ड और भरोसेमंद मेडिकल स्टोर से ही दवा खरीदें, जहां पक्का बिल मिलता हो.
- दवा की डिब्बी पर निर्माता कंपनी का नाम, बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट बहुत ध्यान से पढ़ें.
- अगर दवा का पत्ता फटा हुआ है, प्रिंटिंग धुंधली है या टैबलेट का रंग-रूप थोड़ा अजीब दिख रहा है, तो उसे कतई न खाएं.
- अगर कोई दवा बाजार भाव से बहुत ज्यादा सस्ती मिल रही हो, तो तुरंत सावधान हो जाएं क्योंकि यह नकली होने की सबसे बड़ी निशानी हो सकती है.
- किसी भी संदिग्ध पैकेट को कूड़े में न फेंकें, बल्कि बिल सहित उसे संभालकर रखें और ड्रग कंट्रोल विभाग या फार्मासिस्ट को शिकायत दर्ज कराएं.
दवाएं खरीदने का सही नियम क्या है
आजकल सोशल मीडिया या अनजान ऐप्स के जरिए लोग घर बैठे बिना पर्चे के दवाइयां मंगाने की गलती कर रहे हैं.
किसी अनजान व्यक्ति, व्हाट्सएप ग्रुप या बिना लाइसेंस वाली वेबसाइट से कभी भी नींद या दर्द की गोलियां न खरीदें. डॉक्टर ने जितनी खुराक लिखी है, ठीक उतने ही दिन तक दवा लें. अपनी मर्जी से दिन या समय न बढ़ाएं. अपने घर की बची हुई दवाएं किसी रिश्तेदार या पड़ोसी को यह कहकर न दें कि इससे मुझे आराम मिला था तो तुम भी खा लो. हर इंसान का शरीर और बीमारी अलग होती है.
एक परिवार के तौर पर हमें क्या करना चाहिए
डॉ. बिभु आनंद साफ शब्दों में कहते हैं कि सिर्फ पुलिस के डंडे से यह समस्या खत्म नहीं होगी. असली लड़ाई घर के अंदर से लड़ी जानी है.
अगर परिवार में किसी बच्चे या बड़े का व्यवहार अचानक बदलने लगे, वो हर वक्त सुस्त रहे, कमरे में खुद को बंद रखे या छोटी-छोटी बात पर चिढ़ने लगे, तो फौरन सतर्क हो जाएं. नजर रखें कि वो बार-बार मेडिकल स्टोर के चक्कर क्यों लगा रहा है. अगर किसी को ऐसी लत लग भी गई है, तो उसे अपराधी समझने के बजाय किसी अच्छे मनोचिकित्सक या नशा मुक्ति केंद्र लेकर जाएं. वक्त रहते सही कदम उठाने से किसी की उजड़ती हुई जिंदगी को बचाया जा सकता है.
यह लेख दिल्ली के मशहूर सर गंगा राम अस्पताल के मेडिसिन विशेषज्ञ और फाइमा (FAIMA) के मुख्य सलाहकार डॉ. बिभु आनंद से बातचीत पर आधारित है.
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