विज्ञापन
This Article is From Jan 30, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में फ्री सैनेटरी पैड देने का आदेश दिया, जानें ये क्यों जरूरी था?

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को स्कूली लड़कियों को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने आदेश दिया है कि हर स्कूल में फ्री में सैनेटरी पैड दिए जाएंगे. हर स्कूल में साफ-सफाई और हाइजिन की अच्छी व्यवस्था भी करनी होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में फ्री सैनेटरी पैड देने का आदेश दिया, जानें ये क्यों जरूरी था?
  • सुप्रीम कोर्ट ने मेन्स्ट्रुअल हेल्थ को मौलिक अधिकार मानते हुए स्कूलों में फ्री सैनेटरी पैड देने का आदेश दिया
  • अदालत ने सभी स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट और पैड डिस्पोजल की व्यवस्था का आदेश दिया है
  • NFHS-5 के अनुसार शहरों में 90% और गांवों में 73% महिलाएं पीरियड्स के दौरान सुरक्षित तरीके इस्तेमाल करती हैं
नई दिल्ली:

कहीं महीना... कहीं माहवारी... कहीं मेन्स्ट्रुअल साइकल... तो कहीं पीरियड्स... यहां जिसकी बात हो रही है, वो महिलाओं की जिंदगी का अहम हिस्सा है. लेकिन इसके बावजूद इस बारे में खुलकर बातचीत करने की इजाजत नहीं है. भारतीय समाज में आज भी महिलाओं को होने वाली माहवारी के बारे में न तो बात होती है और न ही इसके बारे में सोचा जाता है. शायद यही कारण है कि आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ा कि मेन्स्ट्रुअल हेल्थ महिलाओं का मौलिक अधिकार है और हर स्कूल को फ्री सैनेटरी पैड की व्यवस्था करनी होगी. 

ये फैसला सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की याचिका पर आया है. उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि पीरियड आने पर लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं, क्योंकि उनके परिवारों के पास पैड पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं होते. इस पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेन्स्ट्रुअल हेल्थ संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'मौलिक अधिकार' है. अदालत ने आदेश दिया कि सभी स्कूलों को 6वीं से 12वीं तक पढ़ने वालीं छात्राओं के लिए फ्री सैनेटरी पैड की व्यवस्था करनी होगी. कोर्ट ने सख्त लहजे में ये भी कहा कि अगर इसका पालन नहीं होता है तो स्कूल की मान्यता रद्द की जा सकती है.

ये फैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेव की बेंच ने सुनाया. बेंच ने कहा कि देश के हर स्कूल में फिर चाहे वो सरकारी हो या प्राइवेट, शहर में हो या गांव में, वहां लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट बनाने होंगे. हर स्कूल में साफ-सफाई के लिए साबुन और पानी की व्यवस्था होगी. हर स्कूल में 6वीं से 12वीं तक की छात्रा के लिए फ्री सैनेटरी पैड की व्यवस्था करनी होगी. साथ ही सैनेटरी पैड के डिस्पोजल के लिए भी व्यवस्था करनी होगी.

फैसला सुनाते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला ने टिप्पणी करते हुए कहा, 'हम हर उस बच्ची को यह संदेश देना चाहते हैं जो पीरियड्स के कारण स्कूल न आने को मजबूर हुई. गलती उसकी नहीं है.'

सैनेटरी पैड इस्तेमाल करती हैं महिलाएं?

पीरियड्स आना एक नैचुरल प्रोसेस है. भले ही इसे ज्यादातर समाज में आज भी 'गंदा' या फिर 'बीमारी' समझा जाता हो. इसे मेन्स्ट्रुअल साइकल कहते हैं, क्योंकि यह हर महीने आता है. पीरियड्स में महिलाओं के गर्भाशय से खून बाहर आता है. आमतौर पर 10-12 साल की उम्र की लड़कियों में ये शुरू हो जाता है. 

ये एक ऐसी प्रक्रिया है कि अगर साफ-सफाई का ध्यान न रखा जाए तो कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं. शहरों में तो ज्यादातर महिलाएं सैनेटरी पैड या फिर कोई दूसरा सुरक्षित तरीका इस्तेमाल कर लेती हैं. लेकिन गांवों में हालात आज भी बहुत ज्यादा अच्छे नहीं हैं. केंद्र सरकार के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के नतीजे बताते हैं कि शहरों में रहने वालीं 15 से 24 साल की उम्र की 90% तो गांवों में 73% महिलाएं ही पीरियड्स के दौरान किसी सुरक्षित तरीके का इस्तेमाल करती हैं. सुरक्षित तरीकों में साफ कपड़ा, सैनेटरी पैड या मेन्स्ट्रुअल कप होता है. 

Latest and Breaking News on NDTV

ये आंकड़ा पहले से बढ़ा है. NFHS-5 2019-21 के बीच हुआ था. इससे पहले 2015-16 में जब NFHS-4 हुआ था, तो सामने आया था कि देश में 15 से 24 साल की उम्र की लगभग 58% लड़कियां ही पीरियड्स के दौरान सुरक्षित तरीकों का इस्तेमाल करती थीं. NFHS-5 के मुताबिक, अब लगभग 78% लड़कियां सुरक्षित तरीका इस्तेमाल करती हैं. यानी, 5 साल में सुरक्षित तरीका इस्तेमाल करने वाली लड़कियां 20% बढ़ गई हैं.

स्कूल में क्यों जरूरी हैं फ्री सैनेटरी पैड?

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 35 करोड़ से ज्यादा महिलाएं हैं, जिन्हें पीरियड्स आते हैं. लेकिन इनमें से सिर्फ 36% ही सैनेटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं. गांवों में तो हालात और भी खराब हैं. चिंता की एक बड़ी बात ये भी है कि भारत में 71% लड़कियों को पहली बार पीरियड्स आने से पहले इसके बारे में कुछ पता ही नहीं होता है.

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि हर महीने 2 अरब महिलाओं को पीरियड्स आते हैं और इनमें से लाखों महिलाएं ऐसी हैं जो अपने लिए पैड नहीं खरीद सकतीं. भारत में भी कमोबेश यही स्थिति है. संयुक्त राष्ट्र इसके लिए 'पीरियड पॉवर्टी' टर्म का इस्तेमाल करता है. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि पीरियड्स के दौरान सैनेटरी पैड या कोई सुरक्षित तरीका नहीं होने के कारण लाखों महिलाओं को स्कूल छोड़ना पड़ता है या काम से छुट्टी लेनी पड़ती है.

कई रिपोर्ट्स हैं जो बताती हैं कि पीरियड्स के कारण लड़कियों की पढ़ाई पर कितना बुरा असर पड़ता है. 2014 में डासरा नाम के एनजीओ की एक रिपोर्ट आई थी. इसमें दावा किया गया था कि भारत में हर साल 2.3 करोड़ लड़कियां पीरियड्स के कारण स्कूल छोड़ देती हैं. इसी तरह जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में 2024 में छपी एक स्टडी कहती है कि भारत में हर 4 में से 1 लड़की पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जाती है. कई स्टडी में सामने आया है कि सालभर में लड़कियों को 20% छुट्टियां पीरियड्स के कारण लेनी पड़ती है.

इतना ही नहीं, अगर पीरियड्स के बाद लड़कियां स्कूल चली भी जाएं तो भी उन्हें वहां अपमानित महसूस कराया जाता है. 

पीरियड्स आने के बाद स्कूल छोड़ने की एक वजह ये भी होती है कि गांव में आज भी ज्यादातर परिवारों को लगता है कि पीरियड्स आने का मतलब है कि लड़की जवान हो गई है और अब इसकी शादी करवा देनी चाहिए. मई 2025 में टाटा ट्रस्ट ने एक रिपोर्ट की थी. इसमें उत्तर प्रदेश के मेरठ के एक सरकारी स्कूल की टीचर डिंपल सिंह ने कहा था, 'मैंने ऐसी छात्राओं को देखा है जो पीरियड्स के दौरान स्कूल से छुट्टी ले लेती हैं. माता-पिता उनकी शादी के बारे में सोचने लगते हैं और प्यूबर्टी के तुरंत बाद कई लड़कियों की शादी हो जाती है. मेरे स्कूल की कई लड़कियां पहले से ही शादीशुदा हैं.'

Latest and Breaking News on NDTV

स्कूल न जाने की एक वजह ये भी!

कई सामाजिक संस्थाएं स्कूलों में फ्री सैनेटरी पैड्स बांटती हैं. सरकारें भी ऐसा करती हैं. लेकिन आज भी बहुत से स्कूल ऐसे हैं जहां फ्री सैनेटरी पैड्स नहीं मिलते और पीरियड्स के दौरान लड़कियों को छुट्टी लेनी पड़ती है.

सितंबर 2022 में बिहार की एक लड़की ने आईएएस अफसर हरजोत कौर भामरा से अपने स्कूल में फ्री सैनेटरी पैड की मांग की थी. इस पर आईएएस अफसर ने उस लड़की को लताड़ते हुए कहा था, 'कल तुम फैमिली प्लानिंग की उम्र की हो जाओगी और उम्मीद करोगी कि सरकार तुम्हें कंडोम भी दे.'

ये दिखाता है कि अगर कोई लड़के अपने हक का मांगे तो उसे सबके सामने शर्मिंदा किया जा सकता है. हालांकि, सिर्फ सैनेटरी पैड्स ही अकेली बड़ी समस्या नहीं है. स्कूलों में आज भी टॉयलेट की प्रॉपर व्यवस्था नहीं है. शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ की 2024-25 की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में 97% स्कूलों में अलग से गर्ल्स टॉयलेट की व्यवस्था है. हालांकि, अब भी 87,763 स्कूल ऐसे हैं जहां लड़कियों के लिए अलग से गर्ल्स टॉयलेट नहीं बने हैं. 

स्कूलों में कई बार सैनेटरी पैड फ्री में देने की मांग हो चुकी है. हालांकि, अब तक इसकी व्यवस्था नहीं की गई थी. 2011 में केंद्र सरकार ने मेन्स्ट्रुअल हाइजिन स्कीम शुरू की थी. इस स्कीम के तहत ग्रामीण इलाकों में रहने वालीं 10 से 19 साल की उम्र की लड़कियों को सिर्फ 6 रुपये में 6 सैनेटरी नेपकीन वाला पैक दिया जाता है. केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि 2021-22 में हर महीने लगभग 35 लाख महिलाओं को इस स्कीम के तहत सैनेटरी पैड दिए गए थे.

बहरहाल, आजादी के 78 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में लड़कियों को फ्री सैनेटरी पैड देने और साफ-सफाई की व्यवस्था करने का आदेश दिया है. उम्मीद है कि इससे हालात सुधरेंगे.

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Supreme Court, Period Poverty, Menstrual Hygiene, Free Sanitary Pads, Free Sanitary Pads In India
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com