Rent a Friend: आज के दौर में शहर बड़े होते जा रहे हैं, लेकिन इंसानों की दुनिया छोटी और अकेली होती जा रही है. दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा जैसे महानगरों में लाखों लोग बेहतर नौकरी, पढ़ाई और करियर के सपने लेकर आते हैं, लेकिन इसी भीड़-भाड़ में वे धीरे-धीरे अकेले पड़ जाते हैं. परिवार से दूरी, दोस्ती के लिए समय की कमी और डिजिटल जिंदगी ने इंसान को भीतर से खाली कर दिया है. इसी बदलती सामाजिक हकीकत के बीच एक नया ट्रेंड सामने आया है किराए पर संगी-साथी (Rent a Companion).
यह कॉन्सेप्ट सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन महानगरों में यह तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. खासतौर पर दिल्ली और गुरुग्राम जैसे शहरों में इसकी शुरुआत हो चुकी है और लोग इसे अपनाने भी लगे हैं.
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क्या है किराए पर संगी-साथी का कॉन्सेप्ट?
किराए पर मिलने वाला संगी-साथी कोई रोमांटिक या शारीरिक रिश्ता नहीं होता. इसका मकसद सिर्फ और सिर्फ साथ देना है. ये संगी-साथी आपके साथ बैठकर बात कर सकते हैं, आपके साथ कॉफी पी सकते हैं, किसी इवेंट में साथ जा सकते हैं, पार्क में टहल सकते हैं या बस आपकी बातें सुन सकते हैं.
सरल शब्दों में कहें तो, यह एक ऐसा इंसान होता है जो आपको जज किए बिना समय देता है. न कोई सवाल, न कोई दबाव बस बातचीत और साथ.
महानगरों में क्यों बढ़ रही है इसकी मांग?
1. अकेले रहने वालों की बढ़ती संख्या
दिल्ली-एनसीआर में बड़ी संख्या में लोग अकेले रहते हैं. नौकरी के चलते वे परिवार से दूर होते हैं और नए शहर में दोस्त बनाना आसान नहीं होता.
2. वर्क-लाइफ बैलेंस का बिगड़ना
सुबह से रात तक ऑफिस, मीटिंग्स और ट्रैफिक इन सबके बीच इंसान के पास सामाजिक जीवन के लिए समय नहीं बचता. ऐसे में बातचीत और साथ की जरूरत बढ़ जाती है.
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3. भावनात्मक थकान
हर किसी के पास अपनी परेशानियां होती हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई नहीं होता. किराए के संगी-साथी को लोग एक सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं.

4. सोशल मीडिया के बावजूद अकेलापन
लाखों फॉलोअर्स और ऑनलाइन दोस्त होने के बावजूद लोग अंदर से खाली महसूस करते हैं. डिजिटल कनेक्शन असली भावनाओं की जगह नहीं ले पाता.
ये सर्विस कैसे काम करती है?
दिल्ली और गुरुग्राम में कुछ स्टार्टअप्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स इस तरह की सेवाएं दे रहे हैं. यहां आप अपनी जरूरत के अनुसार संगी-साथी चुन सकते हैं. समय (घंटों या दिन) तय कर सकते हैं. बातचीत, वॉक, इवेंट अटेंड करने जैसी एक्टिविटीज चुन सकते हैं.
अक्सर इन सेवाओं में स्पष्ट नियम होते हैं कि कोई शारीरिक या आपत्तिजनक व्यवहार नहीं होगा. पूरा फोकस मानसिक और भावनात्मक साथ पर रहता है.
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युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक क्यों ले रहे हैं यह सर्विस?
- यह ट्रेंड सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है.
- युवा इसे स्ट्रेस कम करने और बात करने के लिए चुन रहे हैं.
- वर्किंग प्रोफेशनल्स इसे सोशल थकान से राहत के रूप में देख रहे हैं.
- बुजुर्ग लोग इसे अकेलेपन और चुप्पी से निकलने का जरिया मान रहे हैं.
कई बुजुर्गों के बच्चे दूसरे शहर या देश में रहते हैं. ऐसे में बात करने वाला कोई हो, यही उनके लिए काफी होता है.
क्या यह समाज के लिए खतरे की घंटी है?
कुछ लोग इसे आधुनिक समाज की मजबूरी मानते हैं, तो कुछ इसे रिश्तों की गिरती कीमत से जोड़कर देखते हैं. सवाल उठता है कि अगर इंसान को बात करने के लिए भी किराया देना पड़े, तो क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं?
लेकिन दूसरी तरफ, मेंटल हेल्थ स्पेशलिस्ट मानते हैं कि अगर यह सर्विस किसी को अकेलेपन, डिप्रेशन या नकारात्मक सोच से बाहर निकालती है, तो इसे पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता.
इस नए ट्रेड के फायदे और चुनौतियां:
फायदे:
- अकेलेपन में कमी.
- भावनात्मक राहत.
- बिना जजमेंट के बातचीत.
- मानसिक स्वास्थ्य को सहारा.
चुनौतियां:
- असली रिश्तों से दूरी.
- भावनात्मक निर्भरता का खतरा.
- समाज में गलत समझ.
- लंबे समय में आदत बन जाना.
आगे का रास्ता क्या है?
किराए पर संगी-साथी का चलन यह दिखाता है कि हमारे समाज को सुनने वाले इंसानों की कितनी जरूरत है. यह ट्रेंड चाहे अस्थायी हो या स्थायी, लेकिन यह एक कड़वा सच जरूर उजागर करता है आज इंसान सबसे ज्यादा अकेलापन महसूस कर रहा है.
शायद यह वक्त है कि हम अपने आसपास के लोगों से जुड़ें, बातचीत करें और रिश्तों को फिर से समय देना सीखें. क्योंकि, किराए का साथ कुछ समय के लिए राहत दे सकता है, लेकिन सच्चा अपनापन आज भी रिश्तों से ही आता है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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