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हैदराबाद की 180 साल पुरानी परंपरा में जिंदा मछली निगलते हैं लोग, विज्ञान ने अभी नहीं लगाई मुहर

फिश प्रसादम का आयोजन हैदराबाद में एक सम्मानित परिवार कराता है. इस प्रसाद की सबसे खास बात यह है कि इसमें लोगों को एक छोटी जिंदा मछली निगलनी होती है. इस साल भी ‘फिश प्रसादम’ को लेकर बड़ी संख्या में लोग हैदराबाद पहुंचे हैं.

हैदराबाद की 180 साल पुरानी परंपरा में जिंदा मछली निगलते हैं लोग, विज्ञान ने अभी नहीं लगाई मुहर
क्या आपने देखी है ऐसी परंपरा? जहां जिंदा मछली को निगलना पड़ता है. ( Image Source-PTI)

हर साल की तरह इस बार भी हैदराबाद में ऐसा एक ट्रेडिशनल इवेंट होने जा रहा है, जो अपने आप में काफी दिलचस्प है. लेकिन जो भी व्यक्ति इसके बारे में पहली बार सुनता है उसके लिए ये काफी हैरान करने वाला होता है. दरअसल, यहां हजारों लोग एक खास प्रसाद लेने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं. इस प्रसाद की सबसे अनोखी बात यह है कि इसमें लोगों को एक छोटी जिंदा मछली निगलनी होती है.

इस साल भी ‘फिश प्रसादम' को लेकर बड़ी संख्या में लोग हैदराबाद पहुंचे हैं. तेलंगाना के फिशरीज डिपार्टमेंट के मुताबिक अब तक करीब 38 हजार टोकन जारी किए जा चुके हैं और दूसरे दिन भी भारी भीड़ पहुंचने की उम्मीद है. लेकिन सवाल वही है जो हर साल लोगों के मन में उठता है. आखिर जिंदा मछली निगलने की जरूरत क्यों पड़ती है और इसके पीछे की कहानी क्या है?

180 साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा (A 180-Year-Old Tradition)

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Photo Credit: Image Source-PTI

फिश प्रसादम का आयोजन हैदराबाद में बथिनी परिवार की ओर से किया जाता है. परिवार का दावा है कि यह परंपरा करीब 180 साल से चली आ रही है. फिश प्रसादम का आयोजन हर साल मृगशिरा कार्ते के दौरान किया जाता है. यह एक पारंपरिक समय माना जाता है, जो आमतौर पर मानसून की शुरुआत के आसपास पड़ता है. बथिनी परिवार का मानना है कि इसी दौरान दिया जाने वाला फिश प्रसादम सबसे ज्यादा असर करता है.  देश के अलग-अलग राज्यों से लोग इसमें हिस्सा लेने पहुंचते हैं.

जिंदा मछली निगलने के बाद क्या होता है? (What Happens If You Swallow A Live Fish?)

फिश प्रसादम के दौरान एक छोटी जिंदा मुरेल मछली के मुंह में खास हर्बल पेस्ट रखा जाता है. इसके बाद लोगों को बिना चबाए उस मछली को निगलना होता है. दावा है कि मछली गले के रास्ते नीचे जाते समय हर्बल पेस्ट को शरीर के भीतर पहुंचाती है. हालांकि मेडिकल एक्सपर्ट्स और कई हेल्थ संस्थाएं इस दावे को वैज्ञानिक तौर पर साबित नहीं मानती हैं. अब तक ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक सबूत नहीं मिला है, जो यह दिखाए कि जिंदा मछली निगलने से अस्थमा या सांस से जुड़ी बीमारियां ठीक हो जाती हैं. फिश प्रसादम लेने वाले लोगों का मानना है कि इससे अस्थमा और सांस लेने में होने वाली दिक्कतों में राहत मिल सकती है. इसी वजह से हर साल हजारों लोग इस आयोजन में पहुंचते हैं. कई लोग अपने परिवार के साथ लंबी दूरी तय करके हैदराबाद आते हैं.

इस बार कितनी है भीड़? (Thousands Gather Again)

तेलंगाना फिशरीज डिपार्टमेंट के डिप्टी डायरेक्टर टी. श्रीनिवास के मुताबिक अब तक करीब 38 हजार टोकन जारी किए जा चुके हैं. आयोजन के लिए 1.30 लाख मुरेल मछलियां तैयार रखी गई हैं. अधिकारियों का कहना है कि दूसरे दिन भी बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की उम्मीद है. फिश प्रसादम कई बार बहस का विषय भी बन चुका है. एक तरफ बड़ी संख्या में लोग इसे पारंपरिक इलाज मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ डॉक्टर और वैज्ञानिक इसके फायदों पर सवाल उठाते रहे हैं. यही वजह है कि हर साल इस आयोजन के साथ बहस भी शुरू हो जाती है कि क्या जिंदा मछली निगलने से सचमुच कोई फायदा होता है या नहीं.

फिश प्रसादम को लेकर लोगों की आस्था और अनुभव अपनी जगह हैं, लेकिन मेडिकल दुनिया में इसके फायदों को लेकर अभी तक आम सहमति नहीं है. इसके बावजूद हर साल हजारों लोग हैदराबाद पहुंचते हैं और जिंदा मछली निगलने की इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं. शायद यही वजह है कि फिश प्रसादम हर साल चर्चा में आ जाता है.

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ साइंस में पब्लिश एक रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रसाद का सेवन करने से बीमारी के ठीक होने के सबूत नहीं मिले हैं. बल्कि डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह से प्रसाद को बांटना किसी दूसरी बीमारी की वजह भी बन सकता है.

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