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दिल्ली में हर तीसरी मौत घर पर! क्या समय पर इलाज न मिलना बन रहा है सबसे बड़ी वजह?

आज के दौर में जब बड़े-बड़े अस्पताल, मॉडर्न ट्रीटमेंट और एंबुलेंस सेवाएं मौजूद हैं, तब भी अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग घर पर दम तोड़ रहे हैं, तो यह हेल्थ सिस्टम, जागरूकता और पहुंच तीनों पर सवाल उठाता है.

दिल्ली में हर तीसरी मौत घर पर! क्या समय पर इलाज न मिलना बन रहा है सबसे बड़ी वजह?
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में दिल्ली में कुल 1,39,480 मौतें दर्ज की गईं.

देश की राजधानी दिल्ली से जुड़ी एक रिपोर्ट ने स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. दिल्ली सरकार की दिल्ली में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण पर वार्षिक रिपोर्ट - 2024 के अनुसार, राजधानी में होने वाली कुल मौतों में से करीब हर तीसरी मौत घर पर हो रही है. यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे छुपी हकीकत बेहद चिंताजनक है. घर पर मौत का मतलब अक्सर यह होता है कि व्यक्ति अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाया या बहुत देर से पहुंचा. यह स्थिति बताती है कि गंभीर बीमारी या आपातकाल के समय लोग समय पर मेडिकल मदद नहीं ले पा रहे हैं.

आज के दौर में जब बड़े-बड़े अस्पताल, मॉडर्न ट्रीटमेंट और एंबुलेंस सेवाएं मौजूद हैं, तब भी अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग घर पर दम तोड़ रहे हैं, तो यह हेल्थ सिस्टम, जागरूकता और पहुंच तीनों पर सवाल उठाता है.

रिपोर्ट क्या कहती है?

रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में दिल्ली में कुल 1,39,480 मौतें दर्ज की गईं इनमें से 34.84% मौतें घर पर हुईं. 65.16% मौतें अस्पतालों और अन्य चिकित्सा संस्थानों में दर्ज की गईं.

यानी हर तीन में से एक व्यक्ति की जान अस्पताल पहुंचे बिना ही चली गई। यह आंकड़ा किसी एक इलाके या वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी राजधानी की तस्वीर दिखाता है.

2023 और 2024 की तुलना से क्या पता चलता है?

  • अगर पिछले साल से तुलना करें तो स्थिति ज्यादा बदली नहीं है.
  • 2023 में दिल्ली में 1,32,391 मौतें दर्ज की गई थीं.
  • उस साल भी घर पर होने वाली मौतों का अनुपात लगभग एक-तिहाई ही था.

2024 में मौतों की कुल संख्या जरूर बढ़ी, लेकिन घर पर होने वाली मौतों का ट्रेंड लगभग वही बना रहा. इससे साफ होता है कि यह कोई नई समस्या नहीं, बल्कि लगातार बनी हुई गंभीर चुनौती है.

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घर पर मौतें क्यों बढ़ रही हैं?

हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:

  • अस्पतालों में ज्यादा भीड़: सरकारी अस्पतालों में लंबी कतारें और बेड की कमी.
  • इलाज का बढ़ता खर्च: निजी अस्पतालों का खर्च कई परिवारों की पहुंच से बाहर.
  • एंबुलेंस की देरी: समय पर एंबुलेंस न मिल पाना.
  • बीमारी को हल्के में लेना: शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना.
  • बुजुर्गों की देखभाल में कमी: रिपोर्ट के अनुसार 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में मौतों की संख्या सबसे ज्यादा है.

ये सभी वजहें मिलकर यह स्थिति बना रही हैं कि लोग गंभीर हालत में भी अस्पताल देर से पहुंचते हैं या पहुंच ही नहीं पाते.

क्या यह देरी जानलेवा बन रही है?

विशेषज्ञों के अनुसार, हार्ट अटैक, स्ट्रोक, सांस की बीमारी या गंभीर इंफेक्शन जैसी स्थितियों में हर मिनट कीमती होता है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो जान बचाना मुश्किल हो जाता है. घर पर होने वाली मौतें इस बात का संकेत हैं कि इमरजेंसी के समय सिस्टम और जागरूकता दोनों कमजोर पड़ रहे हैं.

इससे क्या सीख मिलती है?

यह रिपोर्ट एक साफ चेतावनी है कि बीमारी के लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क जरूरी है. अस्पताल जाने में देरी नहीं करनी चाहिए. इमरजेंसी सेवाओं को और मजबूत करना होगा. बुजुर्गों की नियमित स्वास्थ्य जांच बेहद जरूरी है

अगर समय पर इलाज मिले और लोग सजग हों, तो कई कीमती जिंदगियां बचाई जा सकती हैं. दिल्ली के ये आंकड़े सिर्फ डराने के लिए नहीं, बल्कि सुधार की जरूरत दिखाने के लिए हैं.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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