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दुनिया भर में लगातार बढ़ रहे हैं कैंसर के मामले, WHO की आई नई रिपोर्ट में बताए गए कारण

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि 2050 तक दुनिया भर में कैंसर के मामले लगभग 70% बढ़कर सालाना 3.5 करोड़ (35 मिलियन) हो जाएंगे, जबकि अभी यह संख्या 2.06 करोड़ (20.6 मिलियन) है. कैंसर के मामलों में यह चिंताजनक बढ़ोतरी दुनिया की बढ़ती और उम्रदराज होती आबादी, और साथ ही तंबाकू, शराब और मोटापे जैसे रोके जा सकने वाले जोखिम कारकों के कारण हो रही है.

दुनिया भर में लगातार बढ़ रहे हैं कैंसर के मामले, WHO की आई नई रिपोर्ट में बताए गए कारण
लगातार कैंसर के केसों में हो रही है वृद्धि.
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में कैंसर के सालाना मामले आज के लगभग 2.06 करोड़ से बढ़कर 2050 तक लगभग 3.5 करोड़ होने की उम्मीद है.

इसका मतलब है कि कैंसर के मामलों में लगभग 70% की बढ़ोतरी होगी, और WHO का कहना है कि दुनिया भर में कैंसर के बढ़ते बोझ को रोकने के लिए सिर्फ वैज्ञानिक खोजें ही काफी नहीं होंगी. जब तक दुनिया भर की सरकारें स्वास्थ्य से जुड़ी बढ़ती असमानताओं को दूर नहीं करतीं, तब तक लाखों लोग ऐसे कैंसर से मरते रहेंगे जिन्हें रोका जा सकता है,

कैंसर के मामले क्यों बढ़ रहे हैं? (Why Cancer Cases Are Increasing)

WHO की इस रिपोर्ट में कैंसर के मामलों में लगातार होती वृद्धि की मुख्य वजह लगातार बढ़ती आबादी से जुड़ी है. न कि किसी व्यक्ति के लिए कैंसर का खतरा अचानक बढ़ जाना. जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है और लोगों की उम्र लंबी हो रही है, कैंसर के मामले भी ज्यादा सामने आ रहे हैं, क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ कैंसर होने की संभावना भी बढ़ जाती है.

हालांकि, जिन जोखिम वाले कारणों को रोका जा सकता है, वे इस महामारी को बढ़ावा दे रहे हैं. WHO का अनुमान है कि कैंसर के लगभग 10 में से 4 मामले ऐसी चीजों या आदतों से जुड़े हैं जिन्हें बदला जा सकता है, जैसे कि तंबाकू, शराब, फिजिकल इनएक्टिव, मोटापा और ह्यूमन पैपिलोमावायरस जैसे लंबे समय तक रहने वाले संक्रमण. उदाहरण के लिए, CDC के अनुसार, मोटापा कम से कम एक दर्जन अलग-अलग तरह के कैंसर से जुड़ा है, जिनमें ब्रेस्ट, पैंक्रियास, लिवर और किडनी का कैंसर शामिल है.

सुविधाओं तक कम पहुँच

कैंसर को रोकने में सबसे बड़ी चुनौती वैज्ञानिक तरक्की से जुड़ी नहीं है, बल्कि विज्ञान द्वारा विकसित की गई नई रिसर्च और इलाज तक हर किसी की समान पहुंच का ना होना है.

उदाहरण के तौर पर, ज्यादा आय वाले देशों में ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित लगभग 87% महिलाएँ कम से कम पाँच साल तक जीवित रहती हैं, जबकि कम आय वाले देशों में यह आँकड़ा सिर्फ 42% है. अभी 3 में से 1 से भी कम देश अपने यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज पैकेज में कैंसर की पूरी देखभाल को शामिल करते हैं, और ज्यादा आय वाले देशों की तुलना में कम आय वाले देशों में कैंसर के इलाज की सुविधाएँ काफी कम हैं. कुछ इलाकों में, 90% तक मरीज कैंसर का इलाज नहीं करवाते क्योंकि इसका खर्च बहुत ज्यादा होता है.

इलाज का प्रोग्रेस रेट

स्वास्थ्य से जुड़ी तमाम असमानताओं के बावजूद, सार्थक प्रगति हुई है. 2010 के बाद से दुनिया भर में तंबाकू के इस्तेमाल में 27% की कमी आई है, जिससे धूम्रपान से होने वाले कैंसर की दर में भी कमी आई है. इसके अलावा, लगभग 85% देशों ने अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रमों में HPV वैक्सीन को शामिल किया है, जिसके परिणामस्वरूप यूरोप और अमेरिका के कुछ हिस्सों में युवा लड़कियों में सर्वाइकल कैंसर लगभग खत्म हो गया है. ब्रेस्ट कैंसर और सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग में हुई प्रगति से कैंसर का जल्द पता लगाना आसान हो गया है.

चुनौती

कैंसर का असर शरीर तक ही सीमित नहीं रहता. फिजिकल और इमोशनल असर के अलावा, 45% कैंसर मरीजों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है, और देखभाल करने वालों को अक्सर सामाजिक अलगाव, तनाव और आय के नुकसान का सामना करना पड़ता है. कैंसर न केवल एक मेडिकल कंडीशन है, बल्कि दुनिया भर के परिवारों और कम्यूनिटी को प्रभावित करने वाली एक बड़ी आर्थिक और सामाजिक चुनौती भी है.

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