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मौत के बाद भी सुन सकता है इंसान? दिल रुकने पर दिमाग फिर भी रहता है एक्टिव, नई रिसर्च का चौंकाने वाला खुलासा

इस स्टडी में दावा किया गया है कि दिल की धड़कन रुकने के बाद भी इंसानी दिमाग कुछ समय तक एक्टिव रह सकता है और व्यक्ति अपने आसपास की आवाजें सुन सकता है.

मौत के बाद भी सुन सकता है इंसान? दिल रुकने पर दिमाग फिर भी रहता है एक्टिव, नई रिसर्च का चौंकाने वाला खुलासा
इस शोध में कार्डियक अरेस्ट (दिल की धड़कन रुकना) के मरीजों का अध्ययन किया गया.

मौत यह शब्द जितना छोटा है, उतना ही गहरा और रहस्यमय भी. सदियों से इंसान यह जानने की कोशिश करता आया है कि मौत के बाद क्या होता है? क्या सब कुछ तुरंत खत्म हो जाता है या फिर चेतना कुछ समय तक बनी रहती है? इन सवालों पर धर्म, दर्शन और विज्ञान तीनों ने अपनी-अपनी व्याख्याएं दी हैं. लेकिन हाल ही में आई एक नई वैज्ञानिक रिसर्च ने इस रहस्य को और भी दिलचस्प बना दिया है. इस अध्ययन में दावा किया गया है कि दिल की धड़कन रुकने के बाद भी इंसानी दिमाग कुछ समय तक सक्रिय रह सकता है और व्यक्ति अपने आसपास की आवाजें सुन सकता है.

किसने किया यह खुलासा?

यह चौंकाने वाला दावा न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ Dr. Sam Parnia और उनकी टीम ने किया है. यह स्टडी मेडिकल जर्नल Resuscitation में प्रकाशित हुआ है.

क्या कहती है स्टडी?

इस शोध में कार्डियक अरेस्ट (दिल की धड़कन रुकना) के मरीजों का अध्ययन किया गया. दिल बंद होने के बाद भी दिमाग तुरंत ऑफ नहीं होता. कुछ मरीजों ने सीपीआर (CPR) के बाद बताया कि उन्हें अपने आसपास की बातें, डॉक्टरों की आवाजें और उपकरणों की ध्वनियां सुनाई दे रही थीं. EEG (Electroencephalogram) मॉनिटरिंग से पता चला कि कुछ मामलों में ब्रेन की एक्टिविटीज कुछ मिनटों तक बनी रहती है. डॉ. पर्निया के अनुसार, मौत एक क्षणिक घटना नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है. यानी जब दिल रुकता है, तो शरीर के बाकी अंग धीरे-धीरे काम करना बंद करते हैं.

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मौत की नई परिभाषा?

अब तक आम धारणा थी कि जैसे ही दिल की धड़कन रुकती है, इंसान की चेतना खत्म हो जाती है. लेकिन यह रिसर्च बताती है कि क्लिनिकल डेथ (दिल बंद होना) और बायोलॉजिकल डेथ (कोशिकाओं का स्थायी रूप से मर जाना) अलग-अलग स्टेज हैं.

कुछ मरीजों ने बताया कि उन्होंने डॉक्टरों को अपनी मौत की घोषणा करते हुए सुना. हालांकि सभी मरीजों को ऐसा अनुभव नहीं हुआ, लेकिन इतने मामलों ने वैज्ञानिकों को इस विषय पर और गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया है.

क्या यह डरने वाली बात है?

यह अध्ययन भले ही थोड़ा भयावह लगे, लेकिन इसका उद्देश्य डर फैलाना नहीं है. बल्कि इससे पुनर्जीवन (Resuscitation) की तकनीकों को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.

अगर यह साबित होता है कि दिमाग कुछ समय तक सक्रिय रहता है, तो डॉक्टरों को मरीजों के साथ ज्यादा सेंसिटिव बिहेवियर करने की जरूरत हो सकती है, खासकर कार्डियक अरेस्ट के दौरान.

हालांकि यह रिसर्च बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि अभी और अध्ययन की जरूरत है. सभी मामलों में एक जैसा अनुभव नहीं पाया गया और दिमाग की एक्टिविटी कितनी देर तक रहती है, यह भी पूरी तरह साफ नहीं है.

फिर भी, यह शोध मौत की हमारी पारंपरिक समझ को चुनौती देता है और बताता है कि जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा शायद उतनी साफ नहीं है जितनी हम सोचते हैं.

मौत आज भी रहस्य है, लेकिन विज्ञान धीरे-धीरे उसके परदे हटा रहा है. दिल की धड़कन रुकने के बाद भी दिमाग की कुछ एक्टिविटी बनी रहना, यह विचार हमें जीवन के अंतिम क्षणों को नए नजरिए से देखने पर मजबूर करता है.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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