भोपाल के स्वामी विवेकानंद पार्क में भारत का पहला एल्गी ट्री लगाया गया है. यह माइक्रोएल्गी (Microalgae) टेक्नीक पर बेस्ड एक स्मार्ट इंस्टॉलेशन है, जो कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन पैदा करता है. बताया जा रहा है कि यह 25 पेड़ों के बराबर काम करता है. तो आइए जानते हैं इस एल्गी ट्री के बारे में कुछ जरूरी बातें.
क्या है एल्गी ट्री?
भोपाल में लगाया गया यह एल्गी ट्री दिखने में एक पेड़ जैसा लगता है लेकिन यह कोई आम पेड़ नहीं है. इसके अंदर माइक्रोएल्गी होती है जो सूरज की रोशनी की मदद से फोटोसिंथेसिस करती है. इस प्रोसेस में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित किया जाता है और ऑक्सीजन छोड़ी जाती है. शहर में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए इसे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत लगाया गया है.
25 पेड़ों के बराबर करता है काम
बताया जा रहा है कि एल्गी ट्री की एक यूनिट एक साल में लगभग 1.5 टन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर सकती है. यह लगभग 25 बड़े पेड़ों के काम के बराबर बताई जा रही है. इसी वजह से इसे शहरी इलाकों में एयर क्वॉलिटी सुधारने के लिए एक नई टेक्नीक के रूप में देखा जा रहा है.
हवा को भी करता है साफ
यह टेक्नीक सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड कम नहीं करती बल्कि अपने आसपास लगभग 15 मीटर के दायरे में PM 2.5 कणों को 45 से 55 फीसदी तक कम करने में मदद कर सकती है. PM 2.5 बहुत छोटे प्रदूषक कण होते हैं जो सीधे फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं और हेल्थ पर बुरा असर डाल सकते हैं.
किस तरह काम करता है एल्गी ट्री
एल्गी ट्री के ऊपर सोलर पैनल लगाए गए हैं जिससे यह सिस्टम रिन्यूएबल एनर्जी की मदद से काम करता है. सूरज की रोशनी मिलते ही माइक्रोएल्गी एक्टिव होकर अपना काम शुरू कर देती है.
कहां-कहां काम आएगी ये टेक्नीक?
यह टेक्नीक खास तौर पर उन जगहों के लिए तैयार की गई है जहां जमीन की कमी के कारण पेड़ लगाना आसान नहीं होता. फ्लाईओवर, बिजी रोड, कंस्ट्रक्शन साइट और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में इसे आसानी से लगाया जा सकता है.
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