मुझे 2006 फीफा फुटबॉल विश्व कप आज भी याद है. फ्रांस और इटली के बीच खेले गए उस फाइनल मैच के अतिरिक्त समय में फ्रांस के कप्तान जिनेदिन जिदान का मार्को मातेरात्सी को मारा गया हेडबट, उस पर उन्हें मिला रेड कार्ड और फिर पेनल्टी शूटआउट में इटली की जीत, सब कुछ जैसे कल की ही बात हो. इटली तब फुटबॉल की दुनिया की तगड़ी टीमों में से एक थी, लेकिन लगभग दो दशक बाद हालात ऐसे हैं कि विश्व कप के सबसे बड़े मंच पर इटली को ढूंढना पड़ रहा है. चार बार की विश्व विजेता टीम लगातार तीसरे विश्व कप (2018, 2022 और 2026) के लिए क्वालिफाई नहीं कर सकी है. जिस टीम ने कभी दुनिया को बुफोन, टोटी, पिर्लो और डेल पिएरो जैसे महान खिलाड़ी दिए थे, उसकी यह स्थिति फुटबॉल प्रेमियों के लिए निराशाजनक है.
बर्लिन की वो रात जब इटली दुनिया का बादशाह बना
घरेलू फुटबॉल में कैल्सियोपोली फिक्सिंग विवाद के बीच इटली की टीम 2006 विश्व कप में मैदान पर अपनी साख बचाने उतरी थी. कोच मार्सेलो लिप्पी की रणनीति, फैबियो कैनावैरो की कप्तानी और जियानलुइगी बुफोन की शानदार गोलकीपिंग ने इटली को एक अभेद्य टीम में बदल दिया. पूरे टूर्नामेंट में उसकी रक्षात्मक दीवार को तोड़ना दुनिया की बड़ी टीमों के लिए भी मुश्किल साबित हुआ.
इटली की मजबूत रक्षात्मक परंपरा ने एक बार फिर दुनिया को उसकी प्रसिद्ध फुटबॉल शैली कैटेनैशियो की याद दिलाई. कैटेनैशियो फुटबॉल की वह रणनीतिक प्रणाली है जिसमें मजबूत रक्षापंक्ति के जरिए विरोधी टीम के लिए गोल करना बेहद कठिन बना दिया जाता है.
जर्मनी और फ्रांस के खिलाफ वो मुकाबले, जो इतिहास बन गए
डॉर्टमुंड में 4 जुलाई 2006 को खेले गए सेमीफाइनल में इटली का सामना मेजबान जर्मनी से हुआ. निर्धारित 90 मिनट तक मुकाबला 0-0 की बराबरी पर रहा और मैच एक्स्ट्रा टाइम में पहुंच गया. उसमें पहले आंद्रेया पिरलो के बेहतरीन पास पर फाबियो ग्रोसो ने शानदार गोल कर इटली को बढ़त दिलाई. इसके तुरंत बाद जर्मनी के हमले को नाकाम कर इटली ने काउंटर-अटैक किया और डेल पिएरो ने दूसरा गोल दागा. इटली ने मेजबान जर्मनी को 2-0 से हराकर फाइनल में जगह बनाई.
9 जुलाई 2006 को बर्लिन में खेले गए फाइनल मुकाबले में इटली और फ्रांस निर्धारित समय और अतिरिक्त समय तक 1-1 की बराबरी पर रहे. अतिरिक्त समय के दौरान फ्रांस के कप्तान जिनेदिन जिदान ने मार्को मातेरात्सी को हेडबट मारा और उन्हें रेड कार्ड मिला. इसके बाद हुए पेनल्टी शूटआउट में इटली ने फ्रांस को 5-3 से हराकर चौथी बार फीफा विश्व कप का खिताब जीता.
कभी दुनिया की सबसे बड़ी लीगों में थी सीरी ए
इटली की घरेलू लीग सीरी ए कभी विश्व फुटबॉल का केंद्र मानी जाती थी. कई दशकों तक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी और कोच उसमें खेले. एसी मिलान, इंटर मिलान, युवेंटस और रोमा जैसे क्लबों ने यूरोप में लंबे समय तक अपना दबदबा बनाए रखा. लेकिन समय के साथ इंग्लैंड की प्रीमियर लीग और स्पेन की ला लीगा आर्थिक और खेल दोनों स्तरों पर आगे निकल गईं. विदेशी खिलाड़ियों पर बढ़ती निर्भरता और स्थानीय प्रतिभाओं को सीमित अवसर मिलने का असर राष्ट्रीय टीम पर भी पड़ा.
स्वर्णिम पीढ़ी के जाने के बाद क्यों गहराया संकट?
विश्व कप जीतने वाली पीढ़ी के संन्यास लेने के बाद इटली को नए सितारों की तलाश थी, लेकिन वह वैसी निरंतरता के साथ प्रतिभा पूल तैयार नहीं कर सका. पिर्लो जैसा मिडफील्डर, टोटी जैसा प्लेमेकर और डेल पिएरो जैसा फिनिशर लंबे समय तक नहीं मिला. युवा विकास कार्यक्रमों में आई चुनौतियों और घरेलू क्लबों की प्राथमिकताओं ने भी इस समस्या को बढ़ाया. धीरे-धीरे इटली का फुटबॉल मॉडल यूरोप की तेज, तकनीकी और आक्रामक फुटबॉल शैली के मुकाबले पिछड़ता चला गया.
इंटर मिलान, एसी मिलान और अन्य बड़े क्लबों में विदेशी खिलाड़ियों की अहम भूमिका रही, जबकि स्थानीय युवा खिलाड़ियों, खासकर स्ट्राइकर और अटैकिंग खिलाड़ियों को अपेक्षाकृत कम अवसर मिले. इसका असर राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी विकास पर भी दिखाई दिया.
2018 से 2026 तक, लगातार बढ़ता गया संकट
साल 2018 में स्वीडन से हारकर इटली 60 साल बाद विश्व कप से बाहर हुआ. इसके बाद 2021 में यूरोपीय चैम्पियनशिप जीतने वाली टीम से वापसी की उम्मीद थी, लेकिन 2022 विश्व कप के क्वालिफाइंग प्लेऑफ में उत्तर मैसिडोनिया ने उसे हराकर एक और झटका दे दिया.
2026 विश्व कप क्वालिफाइंग अभियान में भी इटली का संघर्ष जारी रहा. टीम अपने ग्रुप में नॉर्वे के बाद दूसरे स्थान पर रही और उसे प्लेऑफ का रास्ता अपनाना पड़ा. प्लेऑफ में बोस्निया और हर्जेगोविना के खिलाफ मुकाबला पेनल्टी शूटआउट तक पहुंचा, जहां हार के साथ इटली लगातार तीसरी बार विश्व कप से बाहर हो गया. इस नाकामी के बाद कोच गेनारो गट्टूसो ने पद छोड़ दिया. इस तरह 1934, 1938, 1982 और 2006 में विश्व कप जीतने वाली अजूरी अब लगातार तीसरे विश्व कप में दर्शक बनकर रह गई है.
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