फीफा वर्ल्ड कप में कुरासाओ, नोर्वे और केप वर्डे जैसे छोटे द्वीपीय देशों की शानदार सफलता यह साबित करती है कि आबादी का आकार फुटबॉल में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए कोई बाधा नहीं है. इन छोटे देशों ने वर्ल्ड कप में जो कमाल किया है उसकी चर्चा पूरा वर्ल्ड करने वाला है. इन देशों ने दिखाया है कि विश्वास और जज्बा से क्या कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है. कुरासाओ, नोर्वे और केप वर्डे अब एक उदाहरण है.

कुरासाओ- आबादी 1.50 लाख
‘ब्लू वेव' – कुरासाओ की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम का सफर फीफा वर्ल्ड कप में शानदार रहा. 1.5 लाख की आबादी वाले इस देश ने वर्ल्ड कप में पहुंचकर एक उदाहरण पेश किया है. सिर्फ़ 1,50,000 से कुछ ज़्यादा आबादी और 444 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल वाला यह कैरिबियन द्वीप टूर्नामेंट के लिए क्वालिफ़ाई करने वाला अब तक का सबसे छोटा देश बना. कुरासाओ की टीम ग्रुप स्टेज भले ही एक भी मैच नहीं जीत सकी लेकिन यहां तक पहुंचना ही इस टीम की सफलता है. कुरासाओ एक ऐसा द्वीप है जो टूरिज़्म पर निर्भर है और इसके नीदरलैंड्स के साथ गहरे संबंध हैं. नीदरलैंड्स एंटिल्स के अलग होने के बाद 2010 में इसे बनाया गया था और यह अभी भी नीदरलैंड्स के साम्राज्य का हिस्सा है.
यहां के नागरिकों के पास डच पासपोर्ट हैं. 26 खिलाड़ियों की इस टीम में सभी खिलाड़ी नीदरलैंड्स में जन्मे हैं, सिवाय ताहिथ चोंग के, जिनका जन्म विलेमस्टैड में हुआ था और जिन्होंने दस साल की उम्र में फेयेनूर्ड की अकादमी जॉइन की थी. बाद में वे मैनचेस्टर यूनाइटेड की यूथ टीम से आगे बढ़े. वे अभी शेफील्ड यूनाइटेड के साथ इंग्लिश फुटबॉल के दूसरे टियर में खेल रहे हैं और 'ब्लू वेव' के लिए सबसे चर्चित नामों में से एक हैं. क्वालिफ़ाइंग के आखिरी मैच में जमैका के साथ मैच ड्रॉ होने के बाद 'ब्लू वेव' ने वर्ल्ड कप के लिए अपनी जगह पक्की की थी. फीफा वर्ल्ड कप में खेलकर नेशनल टीम ने इस द्वीप को दुनिया के नक्शे पर मजबूती से स्थापित किया है.
कुरासाओ की FIFA रैंकिंग क्या है?
दस साल पहले, कुरासाओ FIFA वर्ल्ड रैंकिंग में 150वें स्थान पर था.अब वे 82वें स्थान पर पहुंच गए हैं.
कुरासाओ का वर्ल्ड कप 2026 में कैसा रहा परफॉर्मेंस
- 14 जून: जर्मनी बनाम कुरासाओ – ह्यूस्टन स्टेडियम (7-1)
- 20 जून: इक्वाडोर बनाम कुरासाओ – कैनसस सिटी स्टेडियम (0-0)
- 25 जून: आइवरी कोस्ट बनाम कुरासाओ – फिलाडेल्फिया स्टेडियम (2-0)
केप वर्डे (आबादी: ~5 लाख):
पश्चिम अफ्रीका के इस छोटे से द्वीपीय देश ने वर्ल्ड कप के नॉकआउट स्टेज तक पहुंचने वाला सबसे छोटा देश बनकर इतिहास रच दिया. उनके शानदार सफर में टूर्नामेंट से पहले जीत की प्रबल दावेदार मानी जा रही स्पेन के खिलाफ बिना गोल वाला कड़ा मुक़ाबला (ड्रॉ) और कैमरून जैसी टीमों से आगे निकलना शामिल था. कई दशकों तक, काबो वर्डे ग्लोबल फ़ुटबॉल की दुनिया में हाशिए पर रहा. राष्ट्रीय टीम ने पहली बार 2002 के साइकल में फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप क्वालिफ़िकेशन में हिस्सा लिया और 2026 टूर्नामेंट के लिए क्वालिफ़ाई करने से पहले कई सालों तक बड़ी, ज़्यादा अमीर और बेहतर फ़ंडिंग वाली फ़ुटबॉल टीमों के ख़िलाफ़ मुक़ाबला करते रही. यह टीम दुनिया के बड़े स्टार्स या भारी-भरकम स्पॉन्सरशिप के दम पर नहीं बनी थी.

कई खिलाड़ी यूरोप और दूसरे देशों में बसे समुदायों के निचले डिवीज़न वाले क्लबों से आए थे. कुछ खिलाड़ियों को पर्सनल नेटवर्क और ऑनलाइन तरीकों से चुना गया था. लिंक्डइन के ज़रिए ही फ़ेडरेशन ने आयरलैंड में रहने वाले डिफेंडर रॉबर्टो "पिको" लोपेस से संपर्क किया था, जबकि उन्होंने पहले पुर्तगाली भाषा में भेजे गए मैसेज पर ध्यान नहीं दिया था. प्रबंधक पेड्रो "बुबिस्टा" लीताओ ब्रिटो के तहत, काबो वर्डे ने सामरिक संरचना, संयम, साहस और बुद्धिमत्ता के साथ खेला.
केप वर्डे- फीफा रैंकिंग 64

56 लाख वाली आबादी वाले देश नोर्वे का कमाल
नोर्वे की आबादी 56 लाख लाख होगी. इतनी कम आबादी के बाद भी इस टीम ने फीफा वर्ल्ड कप के क्वार्टर फाइनल तक अपनी जगह बनाई और साबित किया है कि खुद पर विश्वास आपको आपकी मंजील दिला सकता है. फीफा वर्ल्ड कप 2026 में नॉर्वे की टीम ने एर्लिंग हालैंड के नेतृत्व में ऐतिहासिक परफॉर्मेंस किया. नोर्वे के लिए एर्लिंग हालैंड ने
नोर्वे फीफा रैंकिंग - 19

भारत FIFA वर्ल्ड कप खेलने वाले देशों से क्या सीख सकता है?
जमीनी स्तर पर मजबूत ढांचा और कोचिंग इंफ्रास्ट्रक्चर- भारत में कोचों की भारी कमी है, वहीं सफल देश कोचों की ट्रेनिंग और कम उम्र से ही व्यवस्थित यूथ अकादमियों में बहुत निवेश करते हैं.
रणनीतिक और लंबी अवधि की योजना
जापान ने फुटबॉल संस्कृति बनाने और युवाओं को जोड़ने के लिए दशकों पहले अपना लगातार चलने वाला "मिशन" फ्रेमवर्क तैयार किया था. इससे साबित हुआ कि लगातार और व्यवस्थित काम, तुरंत किए गए छोटे-मोटे सुधारों से बेहतर होता है.
कॉम्पिटिटिव अनुभव
सिर्फ क्षेत्रीय टूर्नामेंट खेलने के बजाय, भारत को एशिया की बेहतरीन टीमों के खिलाफ खेलकर खुद को परखना चाहिए. जैसे जॉर्डन जैसे देशों ने क्वालिफ़ायर के दौरान मजबूत प्रतिद्वंद्वियों का सामना करके सुधार किया था.
क्वालिटी पर ध्यान
क्रोएशिया और आइसलैंड जैसे छोटे देश लगातार वर्ल्ड कप में पहुंचते हैं क्योंकि वे व्यवस्थित भागीदारी और टैलेंट की पहचान पर सबसे ज्यादा ज़ोर देते हैं, इससे साबित होता है कि सिर्फ़ ज़्यादा आबादी होने से ही फुटबॉल में सफलता नहीं मिलती.
भारत की फीफा रैंकिंग- 138
भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व स्ट्राइकर रॉबिन सिंह ने
जापान से सीखने की दरकार
रॉबिन ने कहा, "जापान का एक मिशन 100 वर्ल्ड कप था, जो बाद में मिशन 50 बन गया क्योंकि वे बहुत शानदार तरीके से आगे बढ़ रहे थे. यह सिर्फ वर्ल्ड कप में खेलने के बारे में नहीं था. उन्होंने युवाओं को फुटबॉल से प्यार करने के लिए प्रेरित किया. एक देश को इसी तरह का माहौल बनाने की जरूरत होती है. विश्व-स्तरीय फुटबॉलर बनाने के लिए हर चार साल में क्वालीफिकेशन कैंपेन की तैयारी से कहीं ज्यादा की जरूरत होती है."
रॉबिन ने कहा, "ऐसा नहीं होगा कि आप हर तीन साल में उठें और कहें, हमें विश्व कप खेलना है, ऐसा नहीं होता. हो सकता है यह टीम न हो या अगली, लेकिन आपको भविष्य के लिए खिलाड़ी बनाने होंगे और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना होगा। फुटबॉल सिर्फ फ्लडलाइट में होने वाली चीजों से कहीं ज्यादा है. इससे आगे जो काम होता है, वह ज्यादा जरूरी है. जापान इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। भारत की वर्ल्ड कप की उम्मीदों के पीछे एक साफ लंबे समय का विजन होना चाहिए."
उन्होंने कहा, "केप वर्डे यह साबित करता है कि किसी देश का आकार जरूरी नहीं है, अंतर कम हो रहा है. या तो आप उस अंतर के साथ आगे बढ़ रहे हैं, या आप पीछे रह गए हैं. अगर भारत विश्व कप में खेलना चाहता है, तो उसके पास मकसद और इसे पाने का निरंतर प्रयास होना चाहिए."
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