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सीमेंट नहीं, गुड़ और गोंद से हो रही है लखनऊ के शाही किचन की मरम्मत, 200 साल से हजारों लोगों के लिए बनता है खाना

Lucknow Royal Kitchen: साल 1837 में अवध के शासक मोहम्मद अली शाह ने छोटा इमामबाड़ा बनवाया था. इसी परिसर के अंदर एक विशाल रसोई बनाई गई थी. उस दौर में यहां नवाबों के लिए तो खाना बनता ही था, साथ ही आम जनता के लिए भी बड़े स्तर पर लंगर का इंतजाम होता था.

सीमेंट नहीं, गुड़ और गोंद से हो रही है लखनऊ के शाही किचन की मरम्मत, 200 साल से हजारों लोगों के लिए बनता है खाना
Old Royal Kitchen: 200 साल से हजारों लोगों के लिए बन रहा खाना.

जब भी खाने की बात आती है तो लखनऊ का जिक्र सबसे पहले होता है. आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ अपनी तहजीब और खान-पान के लिए दुनिया भर में मशहूर है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यहां एक ऐसा 'शाही किचन' है, जहां पिछले करीब 200 सालों से एक बार भी चूल्हा ठंडा नहीं पड़ा? जी हां, लखनऊ के ऐतिहासिक 'छोटा इमामबाड़ा' परिसर में स्थित यह शाही रसोई आज भी हजारों लोगों का पेट भर रही है. इस ऐतिहासिक विरासत को उसका पुराना गौरव वापस दिलाने के लिए इसकी मरम्मत का काम जोरों पर चल रहा है.

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किसने और कब बनवाया था-

​लखनऊ कभी अवध के नवाबों की रियासत हुआ करती थी. साल 1837 में अवध के शासक मोहम्मद अली शाह ने छोटा इमामबाड़ा बनवाया था. इसी परिसर के अंदर एक विशाल रसोई बनाई गई थी. उस दौर में यहां नवाबों के लिए तो खाना बनता ही था, साथ ही आम जनता के लिए भी बड़े स्तर पर लंगर का इंतजाम होता था. आज भले ही नवाबों का दौर खत्म हो गया है, लेकिन इस किचन की रौनक कम नहीं हुई. आज भी रमजान और मुहर्रम जैसे पाक महीनों में यहां हजारों लोगों के लिए खाना तैयार किया जाता है. खास बात यह है कि इस रसोई को चलाने के लिए पैसा आज भी नवाबों के जमाने की एक खास व्यवस्था से आता है. 

खाने में क्या होता है- 

आलू की सब्जी, दाल, खमीरी रोटी, और बखरखानी (मीठी रोटी) खासतौर पर शामिल हैं.

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कहां से आता है इस रसोई को चलाने का खर्च-

​इतिहासकारों की मानें तो साल 1839 में मोहम्मद अली शाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को 36 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि दी थी. शर्त यह थी कि इस पैसे का रखरखाव अंग्रेज करेंगे और इससे मिलने वाले ब्याज से इन स्मारकों की देखभाल और शाही रसोई का खर्च चलाया जाएगा.

​1947 में आजादी के बाद यह पैसा एक लोकल बैंक में ट्रांसफर कर दिया गया. आज 'हुसैनाबाद ट्रस्ट' इस पैसे और इसके ब्याज का प्रबंधन करता है, जिससे आज भी यहां गरीबों और जरूरतमंदों को खाना खिलाया जाता है.

किसने उठाई इसकी मरम्मत की जिम्मेदारी-

​वक्त की मार और देखरेख की कमी की वजह से इस ऐतिहासिक इमारत की हालत खराब होने लगी थी. दीवारों का प्लास्टर गिर रहा था और फर्श भी धंसने लगा था. स्थानीय लोगों की चिंता को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इसकी मरम्मत का जिम्मा उठाया.

​अक्टूबर में शुरू हुआ यह काम अब अपने आखिरी चरण में है. ASI के अधिकारी आफताब हुसैन बताते हैं कि उनका लक्ष्य इस बिल्डिंग को बिल्कुल वैसा ही लुक देना है, जैसा यह 200 साल पहले थी. हाल ही में इंस्टाग्राम पर knocksenselucknow द्वारा शेयर पोस्ट के अनुसार.

​सीमेंट नहीं, गुड़ और गोंद से हो रही है मरम्मत-

​इस बिल्डिंग की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां आधुनिक सीमेंट का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं हो रहा है. पुराने जमाने की मजबूती वापस लाने के लिए 'मुगलई तकनीक' अपनाई जा रही है. 

पुराना मसाला- मरम्मत के लिए चूने (लाइम) को एक महीने तक भिगोकर रखा जाता है.

​खास मिश्रण- इसमें बेल का गूदा, उड़द की दाल, प्राकृतिक गोंद, गुड़ और ईंटों का चूरा मिलाया जाता है.

​लखौरी ईंटें- अवध की पहचान मानी जाने वाली पतली 'लखौरी ईंटों' का ही इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि इतिहास की खुशबू बरकरार रहे.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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