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This Article is From Sep 08, 2016

डायबिटीज़, अस्थमा और उच्च रक्तचाप वाले मरीज भी कर सकते हैं नेत्रदान

डायबिटीज़, अस्थमा और उच्च रक्तचाप वाले मरीज भी कर सकते हैं नेत्रदान
नई दिल्ली: देश में इस समय लाखों लोग नेत्रदान के जरिए आंखों की रोशनी पाने का इंतजार कर रहे हैं लेकिन कई प्रकार की भ्रांतियों के चलते आज भी लोग उतनी संख्या में नेत्रदान के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। सच्चाई यह है कि डायबिटीज़, अस्थमा और ब्लड प्रेशर के मरीज भी आसानी से नेत्रदान कर सकते हैं। डाक्टरों का कहना है कि लोग सांस्कृतिक रीति रिवाजों और परंपराओं के चलते नेत्रदान करना ज़रूरी नहीं समझते। इसका परिणाम आज यह हुआ है कि लाखों लोग विभिन्न अस्पतालों में नेत्रदान के इंतजार में हैं।

सर गंगाराम अस्पताल की नेत्र चिकित्सक डा. इकेडा लाल कहती हैं कि “एक बात तो लोगों को स्पष्ट रूप से बताई जानी ज़रूरी है कि अगर वह डायबिटीज़, अस्थमा और ब्लड प्रेशर यानी उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, तो भी वे नेत्रदान कर सकते हैं”। इसके अलावा रेटिना की बीमारी या ऑप्टिक नर्व की समस्या से पीड़ित लोग भी अपना नेत्रदान कर सकते हैं। केवल उसी व्यक्ति की आंखों को नेत्रदान के तहत इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जिसकी मौत किसी अज्ञात कारण से हुई हो या फिर वह एड्स, हेपेटाइटिस या सेप्टिसिमिया के चलते मरा हो। हमारे देश में एक लाख 20 हज़ार लोग ऐसे हैं, जो कॉर्निया की बीमारी के चलते अपनी आंखों की रोशनी गंवा बैठे हैं। साथ ही 60 लाख 80 हजार लोग ऐसे हैं, जिनकी दृश्यता 6:6 से भी कम है। भारत में 25 अगस्त से 8 सितंबर तक ‘नेत्रदान पखवाड़ा’ मनाया जा रहा है।

डॉक्टर का कहना है कि “मृत्यु के तुरंत बाद अगर मृतक के परिवार वाले नेत्रदान का फैसला लेते हैं, तो मृतक की आंखों को किसी साफ नम कपड़े से ढक देना चाहिए। साथ ही शव को सीधे पंखे के नीचे नहीं रखना चाहिए, क्योंकि हवा से आंखों के टिश्यू सूख जाते हैं। इसके बाद जितना जल्दी संभव हो सके, पास के नेत्रदान केंद्र को फोन कर देना चाहिए। उन्होंने अव्यवस्था को दूर करने का प्रयास करते हुए बताया कि नेत्रदान से शव का चेहरा यथावत रहता है और इससे अंतिम संस्कार में भी कोई देरी नहीं होती, क्योंकि मृत्यु के छह घंटे के भीतर कॉर्निया को निकालने की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

आंख की सबसे उपरी पारदर्शी परत जिसे कार्निया कहा जाता है उसका मरीज में प्रतिरोपण किया जाता है तथा आंख के बाकी हिस्से का इस्तेमाल चिकित्सा शोध के लिए किया जाता है। नेत्रदान से कॉर्निया के चलते अंधता झेलने वाले लोगों को रौशनी प्रदान की जा सकती है। इकेदा बताती हैं कि मोतियाबिंद और ग्लूकोमा के बाद कार्निया से जुड़ी अंधता नेत्रहीनता का दुनिया में सबसे बड़ा कारण है।

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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