The difference between saying, showing and doing: मौजूदा दौर में हर तरफ दर्शन की बजाय प्रदर्शन पर जोर दिखता है, लेकिन समाज को केवल झूठे आडंबर, दिखावे और बाहरी चमक-दमक से कभी स्थायी रूप से प्रभावित नहीं किया जा सकता. इतिहास साक्षी है कि जो प्रभाव केवल प्रदर्शन पर आधारित होता है, वह क्षणिक होता है, जबकि त्याग, समर्पण, सेवा, सद्भाव, सहयोग और दया जैसे सद्गुणों से युक्त जीवन दीर्घकाल तक समाज को दिशा देता है. जिन व्यक्तियों के जीवन में ये गुण स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते हैं, वे स्वयं तो महान बनते ही हैं, साथ ही समाज के लिए आदर्श और प्रेरणास्रोत भी बन जाते हैं.
वास्तविक प्रभाव का आधार
आज का युग प्रचार और प्रदर्शन का युग कहा जाता है. व्यक्ति अपने आचरण से अधिक अपने शब्दों और छवि पर ध्यान देता है. किंतु समाज की चेतना बहुत सूक्ष्म होती है; वह बाहरी आवरण के पीछे छिपे सत्य को देर-सबेर पहचान ही लेती है. किसी विचारक ने ठीक ही कहा था-
'आप जो करते हैं, वह कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है, बजाय इसके कि आप क्या कहते हैं.'
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जीवन से जुड़ा यह सुंदर वाक्य पूर्ण से स्पष्ट करता है कि समाज पर वास्तविक प्रभाव आपकी कथनी से नहीं बल्कि करनी से पड़ता है.
भगवद्गीता भी इसी सत्य को गहराई से दुनिया के सामने प्रस्तुत करती है. श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-
'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः.
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते.'(गीता 3.21)
अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, सामान्य जन उसी का अनुसरण करते हैं. वह जो प्रमाण प्रस्तुत करता है, समाज उसी मार्ग पर चल पड़ता है. यह श्लोक स्पष्ट करता है कि समाज को उपदेशों से नहीं, बल्कि आदर्श आचरण से दिशा मिलती है.
जीवंत उदाहरण बने
त्याग और समर्पण व्यक्ति के अहंकार को गलाकर उसे व्यापक दृष्टि प्रदान करते हैं. जो व्यक्ति केवल अपने सुख-सुविधा के बारे में सोचता है, वह समाज से कट जाता है; जबकि जो दूसरों के लिए जीता है, वही समाज के हृदय में स्थान बनाता है. हम सब महान कार्य नहीं कर सकते, लेकिन छोटे कार्यों को महान प्रेम से कर सकते हैं.
समाज को जिन महापुरुषों ने नयी दिशा दी उनका संपूर्ण जीवन सेवा, करुणा और त्याग का जीवंत उदाहरण था, जिसने बिना किसी आडंबर के पूरी दुनिया को प्रभावित किया.
सेवा बोझ नहीं बल्कि साधना है
गीता कर्मयोग का संदेश देती है, जिसमें निष्काम सेवा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है-
'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.' (गीता 2.47)
अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता किए बिना. यही भाव जब जीवन में उतरता है, तो सेवा बोझ नहीं, साधना बन जाती है. ऐसे व्यक्ति का जीवन स्वतः ही सरल, सादा और सहज हो जाता है.
सादगी से आता है अपनत्व
सादगी और सरलता महान व्यक्तित्व की पहचान होती है. आडंबर जहां दूरी पैदा करता है, वहीं सादगी अपनत्व जगाती है. संत विनोबा भावे ने कहा था-
'सादगी बाहरी नहीं, भीतरी होती है; वह मन की निर्मलता का परिणाम है.'
जब मन निर्मल होता है, तब व्यवहार में सहजता और करुणा स्वतः प्रकट होती है.
छोटी सोच से बाहर निकलें
दया, सद्भाव और सहयोग समाज की आत्मा हैं. इनके बिना समाज केवल व्यक्तियों का समूह बनकर रह जाता है. स्वामी विवेकानंद का यह कथन अत्यंत सारगर्भित है-
'जब तक आप दूसरों के दुख को अपना दुख नहीं समझते, तब तक आप सच्चे अर्थों में मनुष्य नहीं हैं.'
यह भाव व्यक्ति को संकीर्णता से निकालकर मानवता के व्यापक धरातल पर स्थापित करता है.
जीवन बने मूल्यों का दर्पण
अंत में यही कहा जा सकता है कि समाज को बदलने के लिए झूठे आडंबर रचने की आवश्यकता नहीं है. आवश्यकता है अपने जीवन को मूल्यों का दर्पण बनाने की. त्याग, समर्पण, सेवा, सद्भाव, सहयोग और दया से युक्त सादा, सरल और सहज जीवन ही समाज को सच्ची प्रेरणा देता है. ऐसे व्यक्तित्व समय के साथ और भी अधिक प्रासंगिक होते जाते हैं और पीढ़ियों तक समाज को प्रकाश दिखाते रहते हैं.
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