Shattila Ekadashi Vrat Significance: हिंदू धर्म में जगत के पालनहार माने जाने वाले भगवान श्री विष्णु की पूजा के लिए एकादशी व्रत को अत्यधिक पुण्यदायी माना गया है. इस व्रत का महत्व तब और भी ज्यादा बढ़ जाता है, जब यह माघ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी तिथि पर पड़ता है. हिंदू धर्म में षटतिला एकादशी पर्व पर भगवान वैकुंठ की पूजा की जाती है. हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन तिल का 6 प्रकार से प्रयोग किया जाता है, इसलिए इसे षटतिला एकादशी कहते हैं. आइए भगवान श्री विष्णु की महिमा का गुणगान करने वाली षटतिला एकादशी व्रत की पावन कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं।.
षटतिला एकादशी व्रत की पूजा विधि (Shattila Ekadashi Vrat Ki Puja Vidhi)
षटतिला एकादशी व्रत की पूजा के लिए साधक को प्रात:काल सबसे पहले तिल का उबटन लगाना चाहिए. इसके बाद तिल मिश्रित जल में थोड़ा सा गंगा जल मिलाकर स्नान करना चाहिए. यदि संभव हो तो विशेष रूप से गंगा स्नान कर इस पर्व का पुण्यफल प्राप्त करना चाहिए. हिंदू मान्यता के अनुसार षटतिला एकादशी व्रत वाले दिन भगवान श्री विष्णु की विधि-विधान से पूजा करते हुए तिल से बनी वस्तुओं का भोग तुलसी दल के साथ लगाना चाहिए. इसके बाद उसे ब्राह्मणों को खिलाकर स्वयं भी ग्रहण करना चाहिए. षटतिला एकादशी व्रत में तिल के दान का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है, इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार तिल का विशेष्ज्ञ रूप से दान करें.
षटतिला एकादशी व्रत की कथा (Shattila Ekadashi Vrat Ki Katha)
हिंदू मान्यता के अनुसार एक समय काशी नगरी में एक आदमी बहुत ही गरीबी में जीवन जिया करता था. वह जंगल से लकड़ी काटकर अपना गुजारा किया था, लेकिन जब कभी भी उसकी लकड़ी न बिकने के कारण कमाई नहीं होती तो वह अपने बच्चों के साथ भूखा ही सो जाया करता था. एक दिन जब वह लकड़ी काटकर शहर की ओर जा रहा था तो एक सेठ ने उसकी सारी लकड़ियों को खरीद लिया. जब वह उन लकड़ियों को उस सेठ घर पहुंचाने के लिए पहुंचा तो उसने पाया कि वहां किसी चीज की तैयारी चल रही है. सेठ जी से पूंछने पर उसे पता चला कि वह अगले दिन षटतिला एकादशी व्रत की तैयारी कर रहे हैं. तब लकड़हारे ने सेठ जी से पूछा कि इसे करने से क्या फायदा है.
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तब सेठ ने बताया कि इसके पुण्यफल से धन-दौलत बढ़ती है और व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी हो जाती है. उस सेठ से व्रत की विधि जानने के बाद उस लकड़हारे ने अपनी पत्नी के साथ षटतिला एकादशी का व्रत विधि-विधान से किया और तिल का दान किया. उस गरीब लकड़हारे ने एकादशी व्रत का एक साल तक व्रत किया. जिसके पुण्यफल से वह काशी नगरी का सबसे धनी सेठ बन गया. हे एकादशी माता, जिस प्रकार तुमने उस लकड़हारे की कामना पूरा करते हुए उसे धन दौलत आदि दिया, वैसे ही सभी को देना.
षटतिला एकादशी की व्रत की दूसरी कथा (Shattila Ekadashi Vrat Second Story)
हिंदू मान्यता के अनुसार एक ब्राह्मणी खूब पूजा-पाठ किया करती थी, लेकिन वह धर्म-कर्म करने के बाद कभी दान नहीं दिया करती थी. उसने अपने जीवन में कभी किसी को दान नहीं दिया. मान्यता है कि भगवान विष्णु उसकी पूजा से तो खूब प्रसन्न थे लेकिन उनके मन में चिंता थी कि ब्राह्मणी पूजा के पुण्यफल से वैकुंठ लोक तो प्राप्त कर लेगी लेकिन अन्न दान के बगैर वहां वह भोजन कैसे प्राप्त करेगी. यही सोचकर एक दिन वह उसके पास भिक्षा मांगने पहुंच गये. जब उन्होंने ब्राह्मणी से भिक्षा मांगी तो उसने अन्न न देकर एक ढेला दे दिया.
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मान्यता है कि कुछ समय बाद जब ब्राह्मणी का शरीर पूरा हो गया तो उसे वैकुंठ लोक प्राप्त हुआ लेकिन वहां उसे खाने को कुछ न मिला तो वही दुखी होकर श्री हरि के पास और इसका कारण पूछा. तब भगवान विष्णु ने न सिर्फ उसकी गलती बल्कि उसे सुधारने का उपाय बताते हुए कहा कि तुम बैकुंठ लोक में देवियों से पूंछकर षटतिला एकादशी का व्रत करो और पूजा के बाद इस तिल का विशेष रूप से दान करो. इससे तुम्हारे जीवन के पाप और दोष दूर हो जाएंगे और मनोकामनाएं पूर्ण होंगी. मान्यता है कि ब्राह्मणी ने ऐसा ही किया और उसकी सभी समस्याएं दूर हो गईं तथा वह श्री हरि की कृपा पात्र बनीं.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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